wp

“समलैंगिक पुरुषों के आपसी रिश्ते, समस्त जीवन-काल के दौरान” यह पीटर रॉबिंसन द्वारा लिखी गई किताब  २०१३ में प्रकाशित हुई। मुंबई सहित दुनिया के ९ बड़े शहरों के ९७ गे पुरुषों से मुलाक़ात के ज़रिए जानी गई उनकी जीवन कहानियों का यह विश्लेषण है। परंपरागत विषमलैंगिक आदर्शों का अनुकरण करके, ज़रूरत और परिस्थिति के अनुसार आज समलैंगिक पितृत्व, दोस्ती और शादी के सपनों को साकार कर रहा है। रॉबिंसन की पहली किताब “समलैंगिक पुरुषों की बदलती दुनिया” को २०१० में ऑस्ट्रेलियाई मनोवैज्ञानिक संघ द्वारा ‘रविन कोनेली प्राईज़’ से पुरस्कृत किया गया था। ऑस्ट्रेलिया के स्विनबर्न प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के अध्यापक होने के ज़रिए उन्होंने जरण, लैंगिकता और सामाजिक न्याय पर अनुसंधान किया है।

समलैंगिक पुरुषों के आपसी रिश्ते; तस्वीर सौजन्य: carlastacruz.com

‘समलैंगिक पुरुषों के आपसी रिश्ते’; तस्वीर सौजन्य: carlastacruz.com

दक्षिण अफ्रीका के न्यायाधीश कर्बी अपनी प्रस्तावना में यौनिकता अनुसंधान और न्यायिक सुधार के गहरे ताल्लुक़ को अधोरेखित करते है। किनसे के २ रिपोर्ट, ‘मानवीय नर में यौन व्यवहार’ (१९४८) और ‘मानवीय स्त्री में यौन व्यवहार’ (१९५३) की बदौलत ही लैंगिकता अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न करनेवाले कानून इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में १९६७ और १९७४ में बदले गए। हालांकि ७०० करोड़ मानवों में इंटरव्यू किये  गए ९७ समलैंगिकों की संख्या गौण है; अनुभवजन्य सिद्धांत पर मपनी इस संशोधन की खासियत यह है कि उनके अनुभवों और मतों के बारे में गहरी प्रत्यक्ष जानकारी मिलती है। इस दृष्टि से यह प्रकल्प भारत के कुछ प्रकट और ख्यातिप्राप्त एल-जी.बी.टी लोगों की मुलाक़ातों की श्रृंखला ‘प्रोजेक्ट बोलो’ (२०११) जैसा है, फ़र्क़ यह है के इस किताब में मिलनेवाले लोग अदृश्यता पसंद करते हैं, और बहुतांश लोग उनके मुल्कों के गे संघर्षों में उस हद तक शायद सक्रीय नहीं हैं।

यह रिसर्च एल.जी.बी.टी. के ‘जी’ को उजागर करता है। अलबत्ता, अन्य अनुसंधानों में हम एल.बी.टी. लोगों से वाक़िफ़ होते हैं। उदाहरणार्थ ‘ब्रेकिंग द बाइनरी’ (‘द्विआधारी जिन्सी व्यवस्था को तोड़ते हुए’) यह क्वीयर नारीवादी संगठन ‘लेबिया’ द्वारा किए गए २०१३ के अध्ययन में भारत में जन्म से स्त्री निर्धारित क्वियर लोगों की अनेक जेंडर पहचानों में जी गई वास्तविकताओं और मुद्दों के बारे में दास्तानें बयाँ हैं।

किताब के कुछ महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष: समलैंगिक समुदाय में  बहुत विविधता है। आधे से ज़्यादा समलैंगिक पुरुष गे कम्युनिटी का आधार लेकर गहरी परस्पर दोस्तियाँ बनाते हैं, और परिपूर्ण, सक्रीय ‘सिंगल’ (अविवाहित, या गे रिश्ते से स्वतन्त्र) रहकर ज़िन्दगी बिताते हैं।

'अकेले हैं, तो क्या ग़म है?' तस्वीर सौजन्य: springer.com

‘अकेले हैं, तो क्या ग़म है?’ तस्वीर सौजन्य: springer.com

अकेले रहने में कोई ग़म नहीं  है, और घनिष्ठ  दोस्ती और दोस्तों की मौजूदगी को वे बनाए रखते हैं। बहुत से पुरुषों के आपसी रिश्ते शादी-जैसे थे, जो पहले कुछ सालों के पश्चात कामुकता-भरे नहीं हैं। शादी के बारे में दो मत हैं। कुछ शादी को उस पुरुष-प्रधान संस्कृति का हिस्सा समझते हैं जिससे वे छुटकारा पाना चाहते हैं, तो कुछ शादी के वही हक़ पाना चाहते हैं जो विषमलैंगिकों को उपलब्ध हैं। अपनी ज़रूरत के अनुसार वे रिश्तों के ढांचों में तब्दीलियां लाते हैं, ‘प्रेम’ इस शब्द की जगह मित्रता, साझेदारी, साथ जैसे शब्द भी रिश्ते  का वर्णन करने में इस्तेमाल किए जाते हैं।

बतौर पिता अनेकों ने कहानियां बयाँ की। गे पुरुष स्वार्थी हैं और अच्छे  पिता नहीं  बन सकते, इस धारणा को उन गे पिताओं ने नष्ट किया है,जिन्होंने स्ट्रेट या गे शादी के ज़रिए बच्चों की परवरिश की है। हालांकि एच.आई.वी.-एड्स की महामारी से बहुतांश गे पुरुष गुज़र चुके थे, तरुण पीढ़ी में कई लोग सुरक्षित संभोग संदेशों को अनदेखा करके सामरिक जोखिम लेने को तैयार थे।

बेशक, समलैंगिक और एलजीबीटी लोगों के जीवन-अनुभवों के सागर में यह अनुसंधान मात्र एक बूँद है। मगर रसायनशास्त्र में जैसे एक बूँद के गुणों और रासायनिक संरचना का विश्लेषण करके समुद्र के पानी के स्वास्थ्य के बारे में बाह्य गणन किया जाता है, वैसे ही कुछ इस किताब में बयान अनुभवों से होता है। यह बात और है कि हम नहीं जानते कि इन गे पुरुषों ने किस हद तक सत्य बताया है, और किस हद तक संशोधक के अकथित पूर्वाग्रहों की पुष्टी की है। यह संशोधन और भी संपन्न होता, अगर इसमें ज़्यादा लोग होते, सिर्फ अंग्रेजी भाषिक या मात्र ब्रिटिश साम्राज्य के पूर्व घटक के शहरी नहीं होते। मुलाक़ातें भी विभिन्न कालखंडों में ऑस्ट्रेलिया (२००१-२००३), अंतर्राष्ट्रीय (२००९-२०११) में ली गयी हैं।

इस दौरान, और खासकर इसके बाद बहुत से प्रचंड बदलाव आए हैं: उदाहरणार्थ भारत में ही समलैंगिकता का २००९ में निरपराधिकरण और २०१३ में पुनरपराधिकरण। पश्चिमी सभ्यताओं के बाहर सिर्फ २ शहर हैं, मुंबई और हॉन्गकॉन्ग, जो भारत और चीन के सबसे ‘वेस्टर्न’ शहर हैं। मुमकिन है कि लेखक की अंग्रेज़ी में संभाषण करने की मजबूरी का इस वास्तविकता से सम्बन्ध है। एल.जी.बी.टी.समुदाय का और व्यापक चित्र दिखाई देता अगर औरतों, ट्रांसजेंडरों, उभयलैंगिकों, और शहरों से बाहर गावों में असलीयतों का सामना करनेवालों का समावेश होता। यद्यपि इस पुस्तक का प्रभाव ज़्यादा न हो, दुनिया भर में समलैंगिकों के प्रति होनेवाले द्वेषबाव को काम करने, गे-विरोधी कानूनों में तबदीली लाने, और ऐसे लोगों पर लगे कलंकों को धोने में रति-मात्र क्यों न हो, इससे मदद ज़रूर होगी। लेखक पीटर रॉबिंसन चाहते हैं, कि गे  लोगों के खिलाफ होनेवाले भेदभाव का अंत वे अपनी ज़िन्दगी के दौरान देख पाएं। सामाजिक असामंजस्य के बावजूद गे पुरुष अपनी ज़िंदगियाँ कैसे जीते हैं, और बहुसंख्य तौर-तरीकों को  अपनाकर, नकारकर या बदलकर वे  अपने रिश्ते किस प्रकार बनाते है, यह उजागर करना इस पुस्तक का सबसे बड़ा योगदान है।