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वो सात दिन…
न जाने क्या हुआ था उसे 
मुझसे बात ही नहीं कि उसने 
मैंने फोन भी किया और मैसेज भी
पर कोई जवाब नही दिया उसने
यहाँ मेरी बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी
और अपना कोई हाल नहीं दिया उसने।

मैंने बहुत कोशिश की खुद को समझाने की
पर क्या करूँ दिल ही तो है 
कितने सवाल खड़े कर दिए उसने
ये सच था या साजिश थी उसकी
ये समझने का मौका ही नहीं दिया उसने।

कुछ तो बात थी उसमें ज़रूर
जो मेरा चैन छीन लिया था उसने…
बीच मझधार में यूँ अकेला छोड़कर मुझे
अच्छा तो नहीं किया था उसने।

जब भी मिलेगा तो पूछूँगा ज़रूर 
आखिर ऐसा क्यों किया उसने?
आखिर ऐसा क्यों किया उसने??

ऐसा सोचते सोचते सात दिन बीत चुके थे
आठवें दिन जब उसकी मौत की खबर आई
एक अजीब सा सन्नाटा और गहरी चुप्पी सी छा गयी थी
अब कैसे पूछूँगा उससे कि
आखिर ऐसा क्यों किया उसने?
आखिर ऐसा क्यों किया उसने?