चुनाव की सरगर्मी

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चुनाव की सरगर्मी।

चुनाव की सरगर्मी। तस्वीर: बृजेश सुकुमारन।

आने वाले कुछ महीनों में तस्वीर साफ़ हो जाएगी कि देश में किसकी सरकार बनने वाली है।  असल में २०१४ का ये चुनाव अपने में ख़ास है। लोगों में जोश है। वे बदलाव देखना चाहते हैं।
साथ ही देश का एक बड़ा तबका फासिस्ट ताकतों को सत्ता से दूर रखने की पुरज़ोर कोशिश में लगा है। ये वो तबका है जिसका मानना है कि ऐसी ताकतें सत्ता में आने पर दमनकारी नीतियों की शुरुआत करेगी। कई पार्टियों ने अपने अपने चुनावी लोकलुभावन वादों का घोषणापत्र सामने रख दिया है।

ट्विटर से लेकर फेसबुक तक चुनावी बुखार से लोग तप रहे हैं। अमूमन चुनावों के मौसम में सरकार बनाने को लेकर हर कोई दल अल्पसंख्यकों का वोट हासिल करने की जुगत में लग जाता है। लेकिन हाल के समय में एक नया वर्ग सामने उभरकर आया है जिसका बड़ा हिस्सा ये तय कर चुका है कि वो अपना वोट किसे नहीं देने जा रहा और ये सोच अकारण नहीं है। यकीनन ऐसा तबका भी होगा जो अपने मत को ज़ाया होता नहीं देखना चाहता। वो चाहता है कि केंद्र में एक स्थिर सरकार हो।

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वहीँ, अल्पसंख्यकों का एक तबका समलैंगिकों का है। वे इन चुनावों की अहमियत जानते हैं। वे जानते हैं कि बीते कुछ समय में समलैगिकता के मुद्दे पर किस पार्टी ने अपना रुख कैसा रखा और किसने उन्हें शिव शिव कह कर उनकी खिल्ली उडानी चाही। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री पद के तौर पर उभरे बी.जे.पी. के  उम्मीदवार ने इस विषय पर अपनी चुप्पी तक तोड़ना ज़रूरी नहीं समझा। समलैंगिक समुदाय के कई सदस्यों ने ‘नो मोदी’ कहा।

बेशक समलैंगिक समुदाय इन चुनावों में बड़ा परिवर्तन न ला पाए पर उनकी आवाज़ हाल के दौर में कई दल सुन भी रहे हैं और ऐसा पहली बार बड़े स्तर पर हो रहा है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, और कॉंग्रेस ने अपने अपने घोषणा पत्रों में समलैगिकता को अपराध मुक्त करने की बात कही है। वहीँ आम आदमी पार्टी ने भी इस मुद्दे पर अपना रुख साफ़ किया।
दूसरी ओर समलैंगिकों का एक वर्ग इस बात पर भी हैरानगी जता रहा है कि कॉंग्रेस सरकार चाहती तो चुनावों से पहले ही अध्यादेश के ज़रिये इस विषय पर कुछ सही निर्णय ले सकती थी। उधर स्वयंसेवी संस्था नाज़ फ़ाउंडेशन और समलैगिक अधिकार कार्यकर्ता अंजली गोपालन ने भी पार्टियों की इस पहल का स्वागत किया।

हाल में बनी आम आदमी पार्टी ने यौनिक अल्पसंख्यकों के मुद्दे और मुश्किलों को समझने के लिए दिल्ली में एक आयोजन किया जिसमें फिल्म निर्देशक ओनिर भी शामिल हुए। ‘आप’ पहली ऐसी पार्टी रही जिसने चुनावों से पहले ऐसी किसी पहल की शुरुआत की। दूसरी तरफ़ हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के एक चुनावी प्रचार को लेकर समलैगिक समुदाय ने हैरानी जताई है। असल में भाजपा के प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का विज्ञापन एक समलैंगिक डेटिंग साइट पर देखा गया जहाँ वो उनकी पार्टी को वोट देने की बात कहते हैं। विज्ञापन पर समलैगिक अधिकार कार्यकर्ता अशोक राव कवी  कहते हैं कि “ये पार्टी की दोहरी नीति दर्शाता है, वो हमारा वोट तो चाहते हैं लेकिन हमारे अस्तित्व को नहीं’’। उल्लेखनीय है कि समलैगिकता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भारतीय जनता पार्टी ने स्वागत किया था जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए समलैंगिक संबंधों को एक बार फिर अपराधिक श्रेणी रखा गया। क्या समलैंगिक इस बात की उम्मीद कर सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने पर वो समलैंगिकता को अपराध मुक्त कराने को लेकर कोई कदम उठाना चाहेगी?

अक्षत शर्मा

अक्षत शर्मा दिल्ली में मास कम्युनिकेशन के छात्र हैं। उन्हें संगीत और नयी चीज़ें सीखना पसंद है।