‘आख़री बार’ – एक कहानी

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आख़री बार - एक कहानी। तस्वीर: सचिन जैन।

‘आख़री बार’ – एक कहानी। तस्वीर: सचिन जैन।

वे आख़री बार मिल रहे थे। वे चुप थे।

वैसे भी उन्होंने कभी ज्यादा बातें नहीं की थी। वरुण यह मानता था कि जिनके साथ आप बात करते हैं उनके साथ आप कुछ और नहीं कर सकते।

वे दोनों दो साल से एक ही ऑफिस में थे। वरुण ट्रेनी था जो ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला कर बात करता था। राघव उस ऑफिस का बरगद था, हमेशा से वहीँ और हमेशा वही, बूढ़ा बरगद, वरुण का मुछो वाला बरगद। महीनो तक दोनों एक दूसरे का नाम तक नहीं जानते थे, हालांकि वे अब भी नाम के सिवा कुछ खास नहीं जानते थे।

वे बस यूँ ही लेटे पड़े थे उस दोपहर में; रात उनके नसीब में नहीं थी। हिलते हुए पर्दो से गर्म भारी हवा के साथ कुछ और भी बह कर आ रहा था।

वरुण ने बहुत पहले कभी पूछा था “क्या कोई प्रॉब्लम आती है? तुम्हारी बीवी के साथ…”
“नहीं। मतलब… क़्यो?”

वरुण ने एक मर्तबा पूछा था “अब तक कितने?”
राघव ने कभी पूछा था “…लड़की से। …?”
वरुण ने पूछा था  “कभी ग्रुप में…?”
वरुण ने कभी बताया था “एक दिन में पाँच बार।”
राघव ने मुँह खोल कर कहा था “मैं भी पहले बहुत किया करता था पर एक दिन में पांच बार??”
राघव ने पूछा था “पहली बार कैसे?”
वरुण ने लिजलिजी-सी रूम पार्टनर वाली कहानी सुनाई थी और “पहली बार” को दारु, बारिश और ठण्ड के माथे मड़ दिया था।
और ऐसी ही कई बातें जो होनी थी; वो कब की हो चुकी हैं और जो नहीं हुई हैं, उनका वक़्त गुजर चूका है।
अब ख़ामोशी है।

राघव वरुण के नरम से बालो में उंगलियाँ फिरा रहा था। उसने खुद कभी इतने लम्बे बाल नहीं रखे थे न कभी अपने बेटे शरद को रखने दिए थे। राघव न जाने क्या सोचना चाहता है पर हर बार यही सोच पाता है कि यह शरद से भी छोटा है। पर उसे याद नहीं पड़ता था कि शरद कभी इतना मासूम हो, नासमझ हो। राघव को कई बार लगता था कि कभी वह वरुण को बिठाकर समझाए, दो बाते कहे, उसकी उलझी हुई जिंदगी की दो-चार गाठें सुलझाये। पर वह हमेशा गहरी सास ले कर रह ही जाता था।

राघव को हमेशा की तरह जुखाम लगा था। वह उसके होठों से होठों को सटाना चाहता था। पर उसकी नाक बज रही थी। वे दोनों अपनी हँसी नहीं रोक पाये। वरुण राघव के हिलते हुए, बालों से भरे बड़े-से पेट को देखता रहा । बालो से भरा बड़ा-सा पेट जिस पर आज तक कोई प्रेम भरी कविता नहीं रची नहीं गयी, न कभी लिखी जानी है। पर वारुण के लिए अगर प्रेम का मतलब कुछ है और कहीं है, तो यह वह है और वहीं है।

बालो से भरा उसका बड़ा-सा पेट, उसकी सूअर के बालो जैसी मूछें, उसके पके सफ़ेद बाल, यहाँ-वहाँ मुँह निकालकर झाँकता हुआ उसका गंजापन, उसके चेहरे पर उतरी लकीरें, उसका जुखाम, बजती हुई नाक, भारी-सी आवाज़, उसका फैला पड़ा भीड़ में अकेलापन, उसकी कभी न जाने वाली थकान, उसकी सब कुछ पाने की चाहत और न पा सकने की कसमसाहट, उसकी आँखों की उदासी… वरुण को उसकी हर बात से प्रेम जैसा ही कुछ था।

घड़ी की सुईयाँ खिसकती रहीं, बिना रुके।

दोनों अपने कपडे पहन रहे थे।
“कब है?” राघव
“सात तारीख को … यह लास्ट है।” वरुण
“मैंने भी कभी सोचा था… “ये लास्ट है “। तीस साल पहले। ….पर लास्ट नहीं आता …कभी  नहीं आता।”
दोनों एक दूसरे की और आँख के कोने से देख रहे थे। उस डूबते सूरज की बुझी-सी रौशनी में शायद वे एक-दूसरे में, एक-दूसरे को ढूँढ रहे थे, एक अपना आने वाला कल, एक अपना बीता हुआ।

कपिल कुमार (Kapil Kumar)

कपिल कुमार शौकिया तौर पर लिखते हैं।

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