उम्मीद पर दुनिया क़ायम है

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'समानुभूति की तुला'

‘समानुभूति की तुला’; तस्वीर: सचिन जैन।

“उम्मीद पर दुनिया क़ायम है” – अम्मा ने मेरे कान में कहा और मुझे कुछ घसीटती, कुछ खींचती, माइक के सामने खड़ा कर, अपनी जगह पर जा कर बैठ गईं।  मुझे एक वाद-विवाद के कार्यक्रम में एक छोटा सा भाषण देना था।   मैं डरा हुआ था।  तब तक स्टेज पर कभी न गया था।  मैं पूरे नौ वर्ष का था।   विषय था – ‘अगर आज गांधी जी ज़िंदा होते तो’ भाषण तो ख़ैर अम्मा ने लिख दिया था, और मुझे रटाने की कोशिश भी की थी, लेकिन उस ज़बान का मैं क्या करता जिसने स्टेज पर पहुँच, चलना बंद कर दिया था?   एक शब्द भी याद नहीं आ रहा था।  अंत में, मैंने अपनी वह कापी खोली जिसमें भाषण लिखा हुआ था और किसी राजधानी एक्सप्रेस की तरह उन ढेर सारे शब्दों से पीछा छुड़ा, पसीने पसीने, अपनी सीट पर वापस आ कर बैठ गया।

अम्मा चुप रहीं।  दो – तीन दिन तक इधर-उधर की बातें करती रहीं।  चौथे दिन बुला कर अपने पास बिठाया और पूछा, “क्यों बेटा, उस दिन क्या हो गया था ?”  मैं चुप रहा।  वे फिर बोलीं, “कामयाबी की उम्मीद छोड़ दी थी न, इसलिए”। अगली बार जब मैं माइक के सामने गया तो उम्मीद नहीं छोड़ी। और न सिर्फ़ भाषण देना सीख गया बल्कि अब तो  लोग मुझे माइक देते डरते हैं,  कि साले के हाथ में माइक दो, तो न ख़ुद  छोड़ता है, न श्रोता छोड़ने देते हैं।  वह दिन और आज का दिन – फ़र्क़ सिर्फ़ उम्मीद का है।  और हिम्मत का – वह दूसरी चीज़ जिसका नाम अम्मा ने उस दिन नहीं लिया था ।

तो उच्चतम न्यायालय ने हमारे प्रेम की अभिव्यक्ति पर अंकुश लगा दिया है।  और फिर दोबारा गुहार करने पर भी संसद का रास्ता दिखाना ही सही क़रार दिया है।  तो अब हम क्या करें?   वही  दो बातें। उम्मीद रखें, हिम्मत रखें।  तो उम्मीद तो रख लें और हिम्मत भी जुटा लें। लेकिन अब करें तो क्या करें? प्रदर्शन करें? विरोध जताएं? हाँ वह तो करना ही पड़ेगा।  राजनैतिक दलों के आगे नाक रगड़ें?  शायद वह भी करना पड़ेगा।  लेकिन क्या उस से कोई असर होगा?  हाँ शायद कुछ, थोड़ा बहुत। लेकिन क्या इतना होगा कि हमें आज़ादी मिल सके?  भारत तो आज़ाद हो गया है, लेकिन हम अभी भी हथकड़ियों-बेड़ियों में जकड़े पड़े हुए हैं। ऐसा क्यों ?

ऐसा इस लिए कि हमारे समाज में केवल रुतबे की पूछ होती है। अगर हमारा दर्जा बुलंद है तो हमें सब करने की आज़ादी है। अगर नहीं तो हम को तो सांस भी अपने ऊपर वालों की मर्ज़ी से पूछ कर लेनी पड़ती है! और रुतबा मिलता है केवल ताक़तवर को।  ताक़त जो तलवार की हो सकती है, धन की हो सकती है, ज्ञान की हो सकती है। यानी राजपूत की, वैश्य की, या ब्राह्मण की। बाक़ी को क्या मिलता है? बाबाजी का ठुल्ला? हाँ, अगर चौथी ताक़त, यानी राजनितिक ताक़त हो तो बात बन सकती है। और राजनैतिक ताक़त किसी के आगे नाक रगड़ने से नहीं मिलती। मिलती है तो केवल एकजुट होने से। शायद अपने लिए ख़ुद अपना राजनैतिक दल बना कर, दूसरों को अपने साथ लेने से।

अभी कुछ दिन पहले श्री केजरीवाल ने यही कुछ किया था। उन से पहले बदरुद्दीन अजमल ने। कांशीराम ने। ममतादी ने। एन टी आर ने। पेरियार ने। ह्यूम ने। और अगर राजनैतिक दल न बनाना हो, तो किसी दल को अपना बना लेना भी काफ़ी होता है। जैसे किया गांधी जी ने, मायावती जी ने, मुलायम जी ने, एम जी आर ने। क्या यह आसान होगा?  बिल्कुल नहीं।  क्या यह नामुमकिन होगा?  यक़ीनन नहीं।  हमारे कुछ भाई-बहन सरकार भले ही न बना सके हों, पर निर्वाचित तो हो चुके हैं। कुछ नाम याद आते हैं: शबनम मौसी, कमला बुआ, कमला जान, आशा देवी, मीना बाई, हीरा बाई, गुल्शन, सोनिया अजमेरी, और इन सबको वोट दिए आम आदमी ने। क्यों? क्योंकि आम आदमी भ्रष्टाचार से बहुत दुखी हो चुका है और हम स्वाभाविक तौर पर  भ्रष्टाचारी नहीं हैं।

ऐसा कैसे?  सचमुच में ऐसा हो या न हो, जनसाधारण की यह धारणा तो ज़रूर है कि लोग सब कुछ करते हैं अपने बच्चों के लिए – भ्रष्टाचार भी। उनके लिए नहीं तो किस के लिए?  हमारा समाज न व्यक्ति को सम्मान देता है न अभिव्यक्ति को। केवल समाजी धारणाओं का आदर करता है। अगर ऐसा न होता तो हमारे प्यारे उच्चतम न्यायालय ने जो जूता हमारे दिलो जिगर पर मारा है, वह न मारा होता । और वे श्री मोदी, जिनके चाहने वाले हमारे दरमियान भी कम नहीं, उन्होंने ही सोनियाजी और राहुलजी की तरह दो शब्द तो मुख से उगल ही दिए होते!

देखिए…   लोग कहते हैं कि हर व्यक्ति की यह ज़िम्मेदारी है कि वह समाज चलाने के लिए बच्चे पैदा करे और इसीलिए यह सब दाढ़ीवाले और गेरुए-झण्डे वाले हम से ख़ार खाते हैं । क्योंकि हम व्यक्तिविशेष के प्रेम को समाज से और बच्चे पैदा करने की ज़िम्मेदारी से ऊपर मानते हैं। अगर ‘व्यक्ति’ का हमारा समाज आदर करता होता तो व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति से इतना न डरता। तो वही समाज जो हमारे व्यक्तिगत कारणों से हम से द्वेष रखता है, वही इस बात को मानने पर मजबूर होगा कि हमारे बच्चे तो केवल जनसाधारण हैं। और यूं भी नेताओं को तो हमारा समाज माई-बाप ही मानता है ।

तो अगर हम एक ‘अवसर-समानतावादी’ पार्टी बना लें, जिसका नाम, मसलन, ‘तुला पार्टी’ हो – तो वह पार्टी भारत को क्या दे सकती है ? वह सब  जो सारे राजनैतिक दल कहते  हैं, पर सत्ता हथियाने के बाद सारे वादे भूल कर अपने ही बच्चों के भरण-पोषण में व्यस्त हो जाते हैं ! तुला पार्टी होगी सबको बराबरी से अवसर देने वाली, भ्रष्टाचार रहित और राजवंश व भाई-भतीजावाद रहित। ‘आप’ व ‘भाजपा’ दोनों से बेहतर हम यह काम कर सकते हैं। क्यों? क्योंकि हम बच्चे पैदा नहीं करते – प्रेम पैदा करते हैं, समानुभूति पैदा करते हैं, करुणा पैदा करते हैं। तो जो कुछ भी श्री केजरीवाल कहें औरे श्री मोदी कहें, हमारी पार्टी में न तो भ्रष्टाचार हो सकता है और न शहज़ादों का राज ।

ऐसा समाज  कहता है, मैं नहीं। तो अगर समाज की धारणाओं के चलते हम पर भारतीय दण्ड संहिता धारा ३७७ लागू है, तो उन्ही धारणाओं का इस्तेमाल कर हम, और कुछ नहीं तो बड़े राजनितिक दलों को चुनावी हार का दुःस्वप्न दिखा कर डरा तो ज़रूर सकते हैं। और उन्हें, हम को भी, इंसान मानने पर मजबूर कर सकते हैं। 

तो क्या कहते हो भाइयों-बहनों-त्रिबंधुओं? अगर आज गांधी जी ज़िंदा होते तो क्या कहते? शायद यही कि उम्मीद रखो, हिम्मत रखो!  प्रदर्शन केवल न करो, कुछ काम का काम करो! पुरुष-सत्ता के प्रताड़ितों को साथ लो – हरिहरजनों को प्यार का अधिकार दो !