कहानी : करेला – दो युवाओं की प्रेम कहानी

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शरद को भरवां करेले पसंद थे। भरवां करेले देख कर संभव के टिफ़िन पर वो ऐसे टूट पड़ता मानो कि भिखारी को खज़ाना मिल गया हो। शरद और संभव एक ही कॉलेज में पड़ते थे और दोनों में गहरी दोस्ती थी।

अब आप ये सोच रहे होंगे, भला कॉलेज में टिफ़िन कौन ले जाता है? ये बात है उन दिनों की जब कॉलजों में कैंटीन नहीं हुआ करती थे और ना ही  कॉलेज के बाहर कोई रेस्टॉरेंट या कैफ़े। लोग खाना सिर्फ घर का बना हुआ ही खाते थे। संभव को करेले बिल्कुल भी पसंद नहीं थे फिर भी वो अपनी माँ से कहकर शरद के लिए बनवाता था। जानते हैं क्यों?? हाँ, आप सही सोच रहे हैं। ये कहानी भी किसी फिल्मी प्रेम कहानी से कम नहीं थी जिसकी शुरुआत दोस्ती से  होती है। पर इस कहानी में सिर्फ एक ही बात अलग थी कि शरद और संभव दोनों लड़के थे और एक दूसरे से बेहद  प्रेम करते थे। 

संभव मन ही मन शरद को चाहने लगा था, पर कहने से डरता था। ये दोस्ती का सिलसिला चल ही रहा था कि एक दिन अचानक शरद का एक्सीडेंट हो गया, उसके बाएँ पैर में फ्रैक्चर हो गया जिसकी वजह से वो 6 महीने तक कॉलेज नहीं आ सका। संभव हर रोज़ उससे मिलने जाता था, उसकी खूब सेवा करता था। कॉलेज में उसने शरद के लिए कई सारे नोट्स भी तैयार किये ताकि परीक्षा के समय शरद को दिक्कत ना हो। संभव का यह प्यार और समर्पण भाव देख कर शरद का दिल भी संभव के लिए धड़कने लगा था। पर शरद कैसे कहता? बहुत सारे सवाल थे उसके मन मे? उस ज़माने ना ही इंटरनेट था और ना ही कोई और साधन जो शरद को उसकी समलैंगिकता के बारे में समझने में सहायता कर पाते।परन्तु फिर भी शरद ने एक दिन हिम्मत करके पूरे फिल्मी अंदाज़ में हाथ में गुलाब का फूल लिए संभव को प्रोपोज़ किया। उस दिन संभव को ये समझ नहीं आया कि उसे खुश होना चाहिए या रोना चाहिए… वो खुश भी था और शरद को गले लगाकर रो भी रहा था। क्योंकि उसका सपना हक़ीक़त में तब्दील हो गया था। बड़ी मिश्रित भावनाएं थी उसके दिलो- दिमाग में।

खैर जो भी हुआ बहुत अच्छा हुआ।धीरे-धीरे सारे कॉलेज में उनके इस विचित्र प्रेम की चर्चायें होने लगी । हद तो तब हो गयी जब बात प्राध्यापकों तक पहुँच गई। दोनों के पिताजी को कॉलेज में बुलवाया गय और यहां से कहानी ने नया मोड़ ले लिया। दोनों के घर पे उनकी खूब पिटाई हुई… ज़ोरदार। उस ज़माने में प्रेम करना अर्थात खानदान की इज़्ज़त को मिट्टी में मिलाने के प्रतीक के रूप में देखा और समझा जाता था, फिर ये तो विचित्र प्रेम था, इसकी आवाज़ को कैसे ना दबाया जाता?

शरद के पिताजी सरकारी नौकर तो थे ही तो उन्होंने अपनी सिफ़ारिश से किसी दूसरे शहर में उसकी सरकारी नौकरी लगवा दी क्योंकि उस ज़माने में सरकारी नौकरी के लिए ग्रेजुएशन नहीं देखी जाती थी, सिफारिश से काम हो जाता था। फिर देखते ही देखते शरद के पिताजी ने एक सुंदर लड़की देख कर शरद की झट मँगनी और पट ब्याह करवा दिया और सब सामान्य हो गया, जैसे कि कुछ हुआ ही नही था।

यहाँ संभव इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाया… मन ही मन घुटता चला गया… और एक दिन शहर के बाहर वाली नदी में कूदकर अपनी जान ले ली।

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