क्वीयर आज़ादी मुंबई, २०१४। तस्वीर: सचिन जैन।

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नक़ाब – एक कविता

By अक्षत शर्मा

May 01, 2014

नक़ाब

चेहरों पर तुमने ओढ़े देखे होंगे नक़ाबउनके

पर सच मानो तो हक़ीक़त में

ये नक़ाबउन्हें तुम्हारी ही देन है।

वो ओढ़े रखना चाहते हैं ये नकाब

सिर्फ इसलिए कि समाज का वो क्रूर चेहरा न दिखे,

जो छीने बैठा है उनसे उनके हक़-हुक़ूक़।

ये नक़ाबउन्हें देन है समाज की ‘नैतिकता’ की !

पर नहीं, ये नक़ाबहर बार देखा नहीं मिलेगा तुम्हें,

फैंक देंगे उसे और

मिलाएंगे वो तुम्हारी आँखों से आँख और

मांगेंगे अपना हक़।

देंगे तुम्हें वो तर्क और तथ्य,

पूछेंगे सवाल, पर

उत्तर में मिलेगा उन्हें मौन।

लेकिन सुनो !

वो नक़ाबइसलिए पहने हैं अभी

ताकि तुम्हारी शर्म बची रहे।