'एक अंतहीन विडम्बना': रेखाचित्र: सचिन जैन, तस्वीर: कविता गुजरिया।

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एक अंतहीन विडम्बना

By Dhananjay Chauhan

August 31, 2014

अगर हम गहन विचार करें तो हमें समलैंगिकता से ज्यादा आज की राजनीती ही अप्राकृतिक नज़र आएगी। जहाँ पर कोई किसी का सगा नहीं होता। कौन कब पासा बदल ले कोई नहीं जनता। कई जगह झूठ का मुखोटा ओढ़े लोग हैं। तो फिर हम समलैंगिकों को गलत क्यों कहा जाता है? हमें क्यों झूठा और मक्कार कहा जाता है? ताक़तवर लोग – खासकर राजनीति जैसे क्षेत्र में – द्वेष और स्वार्थ सी मन्मत्त होकर मासूम लोगों का खुले-आम खून करते हैं। विडम्बना यह है कि हम समलैंगिक लोग झूठ का मुखोटा ओढ़े हुए प्यार करते हैं।

जिस तरह से आज समाज में उग्रता फ़ैल रही है, मुझे नहीं लगता कि आने वाला समय नयी पीढ़ी, खासकर लैंगिकता अल्पसंख्यकों के लिए अच्छा होगा। आज ही मैं एक समाचार पत्र पढ़ रहा था। जिसमे लिखा था कि किस तरह से छात्र नेता देश की बड़ी राजनैतिक पार्टियों की शह पर विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के नाम पर उग्रता फैला रहे हैं। कुछ छात्र नेता पढ़ाई के नाम पर सिर्फ विश्वविद्यालयों में प्रवेश कर लेते हैं और वहां पर तालीम हासिल करने कि बजाय राजनीति करते दिखते हैं। क्या इसमें कोई आस्चर्य है कि नेताओं पर अपराधिक केस चल रहे हैं? लेकिन धारा ३७७ कि तहत गुनहगार और अपराधी बने हैं समलैंगिक! यह है विडंबना नंबर २।

कुछ नेता तो जेल के अंदर से चुनाव लड़ और प्रचार कर रहे हैं। ये देश का दुर्भाग्य है। जहाँ सरस्वती का बोलबाला होना चाहिए था वहां काले पैसों की पूजा की जाती है। पढ़ाई के नाम पर ब्यापार और राजनीती हो रही है। यह कहना गलत होगा कि सारे धनवान विद्यार्थी विश्वविद्यालय में सिर्फ अपनी धौंस-दबंगई जमाने ही आते हैं। कइयों को शिक्षा से कोई लेना देना नहीं होता। वो कई कई वर्षों तक एक ही कक्षा में रहते हैं। और विभाग बदल बदल कर दोबारा प्रवेश लेते रहते हैं ताकि वह वहां पर अपनी राजनीती करते रहें। इन्हीं विश्वविद्यालयों में छात्रों, और काफी बार ट्रांस, लेस्बियन और गे छात्रों को ‘रैगिंग’ के नाम पर ज़लील किया जाता है। ज्ञान की पिपासा होते हुए भी इस उत्पीड़न की वजह से उनिवर्सिटियों के दरवाज़े उनकी लिए बंद हो जाते हैं। इसका नकारात्मक असर उनकी ज़िन्दगी भर की कमाई पर होता है। यह तीसरी विडम्बना है। इसमें कुछ राजनितिक दलों और बड़े नेताओं का भी स्वार्थ होता है। इसका एक और नतीजा यह होता है कि हर विभाग में शोध के लिए विद्यार्थी ही नहीं आते। और सीट खाली की खाली रहती है।

इन विडम्बनाओं के नतीजे हम भुगत रहे हैं। जो विश्व-विद्यालयों का हाल है, वही छोटे स्टार पर विद्यालयों का, और बड़े पैमाने पर विश्व का भी है। सुना था पढ़ाई करने से बहुत ज्ञान मिलता है और एक अच्छी समझ का विकास होता है। लेकिन स्कूलों में भी असहिष्णुता की मात्र बढ़ रही है, छात्रों को मारकर उनका उत्पीड़न कर उन्हें आत्महत्या पर मजबूर करने के क़िस्से बहुत ज़्यादा होने लगे हैं। प्रेम और सौहार्द का पाठ पढ़ कर समानता और स्वातंत्र्य का माहोल दुनिया में बनाया जाता है। लेकिन ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा। वैश्विक स्तर पर भी अनेक देशों ने, जैसे रूस, युगांडा, नाईजीरिया में समलैंगिक अधिकारों को हाल ही में काम-ज़्यादा मात्रा में नकारा है या उन्हें अपराधी बनाकर उन्हें फिरसे अँधेरी खाई में धकेल दिया है।

उसी प्रकार, रूढ़िवादी लोग सोचते हैं कि समलैंगिकता एक मानसिक बीमारी है और इस से समाज को खतरा है। इस से समाज बिखर सकता है। परन्तु ऐसे कई उदाहरण हैं जिस में दुनिया को समलैंगिक लोगों ने बहुत कुछ दिया है जिसमे कला, संस्कृति, नृत्य, काव्य, दर्शन और नए ज़माने के तौर तरीकों से दुनिया को बहुत कुछ सिखाया है। दुनिया को पुनर्जागरण के लिए प्रेरित करने वालों में भी समलैंगिक प्रधान थे। हर समाज में कुछ अच्छे बुरे लोग भी होते हैं। वो यहाँ भी थे और रहेंगे लेकिन इसकी तुलना में देखा जाये तो बाकी लोग ज्यादा भयानक गलतियां करते हैं जैसे माज़ी और वर्त्तमान तानाशाह और विस्तारवादी नीतियों वाले नेता। एक और विडम्बना यह है कि कुछ धार्मिक गुरु जो समलैंगिकता का निषेध करते हैं, अपने भक्तों का लैंगिक शोषण करते हैं।

समलैंगिक अपने अधिकारों के लिए भारत में कई वर्षों से संघर्ष करते नजर आ रहे हैं लेकिन हमारे कुछ संकुचित मानसिकता वाले लोग नहीं जानते की समलैंगिकता से ज्यादा खतरा उन बलात्कारी लोगों से हैं जो हर दिन छोटी बच्चियों का बलात्कार के साथ साथ उनका खून कर रहे हैं। हम दुनिया को शांति का पाठ पड़ने वाले आज खुद ही अशांति फैला रहे हैं। हमारा देश मानव अधिकारों की दुहाई देता है लेकिन यहाँ मानव अधिकार हनन के कई केस दर्ज होते हैं और बहुत ज्यादा तो दर्ज भी नहीं किये जाते। मसलन समलैंगिकों के साथ होने वाले केस यह कह कर टाल दिए जाती हैं कि ये केस नहीं बनता। इनके केस को कोई जुर्म नहीं माना जाता जिस कारण समलैंगिक केस दर्ज करने ही नहीं जाते। उन्हें पता है कि थाने में उनके साथ और भी बुरा व्यव्हार होने वाला है। यह आखरी और सबसे बड़ी विडम्बना है, कि लैंगिकता अल्पसंख्यकों कि रक्षकों सी ही उन्हें काफी बार सबसे ज़्यादा डर लगता है!