"आधा इश्क": भाग ९/१०; तस्वीर सौजन्य: QGraphy

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‘आधा इश्क़’ – एक कहानी (भाग ९/१०)

By Ankush N

January 08, 2017

शृंखलाबद्धकहानी ‘आधा इश्क’ की पहली आठ किश्तें यहाँ पढ़ें:

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प्रस्तुत है इस कथा का नौवां भाग:

रिज़ल्ट का दिन:

“ओये, तेरे कित्ते आये?” राकेश ने मनोज से पूछा।

“यार फर्स्ट क्लास ही आया है बस। “

“यिपी! मेरा डिस्टिंक्शन आ गया।” प्रीती उछल रही थी।

“हाँ हाँ मोटी, चल जा, बड़ी आई टैलेंटेड बंदी”, अविनाश ने एंट्री ली।

“पर यह संदीप कहाँ है?” राकेश यहाँ-वहाँ देखने लगा।

“वह नीरज का इंतज़ार कर रहा है बाहर”, पूनम ने बताया।

“हे संदीप, चल ना, बहुत दिनों के बाद मिले हैं आज। थोड़ी ड्रिंक लेते हैं। चल ना!” मनोज संदीप से ज़बरदस्ती करने लगा।

“अरे नहीं, नीरज आता ही होगा। एक बार बस उससे बात हो जाए, फिर चलते है।” संदीप बैठ गया।

“अरे फिर ये लडकियां है न, वह बता देंगी नीरज को। वह आ जाएगा, और वैसे भी उसके पास मोबाइल है… चल अब।“ राकेश के कहने पर संदीप m गया और सब पीने चले गए। पूरा दिन बीत गया पर नीरज आया नहीं, ड्रिंक करके भी हो गया, और सब घर भी चले गए। नीरज का फोन भी बंद आ रहा था।

“देखा न, ये गेज़ पर भरोसा नहीं करना चाहिए कभी। चलो चलते हैं अब”। यह कहकर पूनम और संदीप भी चले गए।

आज की तारीख, तीन साल बाद:

“क्यों नहीं आया तू उस दिन नीरज, मुझे तुझे गले लगाकर सॉरी बोलना था। कहाँ है तू नीरज? किस हाल में है? तुम्हें बहुत मिस करते हैं, कम-से-कम गेट-टुगेदर पर तो आओ।” बोलते-बोलते संदीप सो गया। मेल-मिलाप के उस कार्यक्रम पर हर कोई मज़े ले रहा था, पर संदीप नीरज की प्रतीक्षा कर रहा था। वह उस दिन भी नहीं आया।

कुछ दिनों बाद:

संदीप अपने दफ्तर जा रहा था गाड़ी में । गाड़ी चलाते-चलाते फोन पर पूनम से बात कर रहा था। तभी उसकी गाड़ी के सामने एक औरत आ गई। उसने आपातकालीन ब्रेक लगाए।

“अरे बाप रे, आंटी आपको लगी तो नहीं न?” संदीप घबरा गया था।

“अरे नहीं बेटा, मुझे चोट नहीं आई। गलती तो मेरी थी। मैं ही बीच में आ गई थी। वह क्या है न, तुरंत अस्पताल जाना है।“ बूढी-बाढ़ी औरत थी, लगभग पचास-पचपन साल की।

“कहाँ जा रही हैं आप आंटी?”

“गोवर्धन अस्पताल”

“चलिए फिर मेरी गाड़ी में बैठिये। आपको छोड़ देता हूँ। उसी रास्ते से जा रहा हूँ।” संदीप ने उस औरत को गाड़ी में बिठाया और गाड़ी स्टार्ट की।

“तुम्हारा नाम क्या है बेटे? मुझे पता नहीं, कहीं तुम्हें देखा हुआ लग रहा है।“

“आंटी मेरा नाम संदीप है, संदीप कटारिया।”

“संदीप…। तुम नीरज वर्मा को जानते हो?” उस औरत के इस सवाल ने संदीप को ऊपर से नीचे तक हिला दिया।

“आप नीरज को कैसे जानती हैं? कहाँ है वह? प्लीज़, बताइए न! मेरा उससे मिलना बहुत ज़रूरी है। संदीप एकदम उत्साहित हो गया।

“मैं उसकी माँ हूँ, और अस्पताल में उसे देखने जा रही हूँ।” बात करते-करते गाडी अस्पताल पहुँच गई और संदीप ने रोक ली।

“धन्यवाद बेटा। तुम आओगे उसे मिलने?”

संदीप ने अस्पताल की तरफ देखा: “आंटी, यह तो एड्स के मरीजों का अस्पताल है न?”। संदीप चौंककर देखता रहा।

“हाँ बेटा। तुम जाओ अपने ऑफिस। मैं समझ सकती हूँ। मैं उसे नहीं बताउंगी कि तुम मिले थे। संदीप चला गया पर उसके दिमाग में वही सबकुछ घूम रहा था। नीरज को एड्स कैसे हुआ? क्या किया उसने? कहीं वह गलत…?

“क्या?! नीरज को एड्स? मुझे पता था ये गेज़ ऐसे ही होते हैं यार। किसी एक के नहीं होते। जो लड़का मिल जाए उसपर ट्राई मारेंगे। उसके साथ सेक्स करेंगे। फिल्मों में नहीं देखा क्या?” पूनम संदीप को समझा रही थी।

“एड्स एक बीमारी है। वह किसी को भी हो सकती है। उसका गे होने से क्या ताल्लुक है? और गे होना मतलब किसी से भी सेक्स करना होता है, यह तुम्हें किसने बताया? मेरा दिल नहीं मान रहा कि नीरज ऐसा होगा। वह ऐसा कर ही नहीं सकता यार!” संदीप अभी भी मान नहीं रहा था।” इसके बाद, संदीप रोज़ उसी अस्पताल के सामने से गुज़रता जहां नीरज एडमिट था। लेकिन कभी अन्दर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। पर एक दिन हिम्मत जुटाकर वह अन्दर चला ही गया।

“माफ़ कीजिए, क्या आप मुझे बता सकते हैं कि नीरज वर्मा कहाँ एडमिट है?” संदीप ने अस्पताल के रिसेप्शन पर पूछताछ की। रिसेप्शनिस्ट ने रजिस्टर में चेक किया और बताया:

“आई एम् सॉरी सर, नीरज आज ही एक्सपायर हो गए हैं।“

उस औरत की बात सुनते ही संदीप के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसके दिल की धडकनें अचानक तेज़ हो गईं। उस समय, क्या करूं, क्या नहीं, उसकी समझ में नहीं आ रहा था। उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। उसकी आँखों से पानी बहने लगा। वह मुड़कर बाहर निकलने ही वाला था कि उस औरत ने उसे फिरसे आवाज़ लगाई।

“सुनें, अगर आपको उसके परिवार वालों से मिलना हो तो यहाँ से दाहिने मुड़कर अन्दर जाइए। उनके घरवाले आए हैं शव को लेने।”

संदीप अन्दर जाने के लिए राईट मुड़ा। उसकी

आँखों से आंसू टपक रहे थे। हर क़दम के साथ उसे नीरज याद आ रहा था। उसका मुस्कुराता चहरा अब उसकी आँखों के सामने नाच रहा था। जैसे-जैसे वह नजदीक पहुँच रहा था, उसके दिल की धडकनें और तेज़ हो रहीं थीं।

पहुँचने पर उसने देखा, वहाँ कमरे में दो महिलाएं थी। “आंटी!”, संदीप ने अपनी आँखें पोछते हुए कहा।

“संदीप, नीरज सही कहता था कि तुम एक दिन उससे मिलने ज़रूर आओगे। देखो, रोना मत। उसने हमसे वादा लिया था, कि उसके जाने के बाद कोई नहीं रोएगा। सब उसे हंसकर बिदा करेंगे।”

“पर आंटी आप?”

“अरे, यह नीरज की सगी माँ है। और मैं? मुझे तो नीरज ने ‘गोद लिया था’। जानती हूँ, सुनने में अजीब लगता है। लेकिन यह सच है, मेरे अपने बच्चों ने जब मुझे घर से निकाल दिया, इसने पराया होते हुए भी मुझे एक बेटे जैसा प्यार दिया। हर कोई उसको धिक्कारने के लिए गे-गे का राग आलापते हैं। लेकिन अगर यही फ़र्क है स्ट्रेट और गे में, तो मैं चाहूंगी कि मुझे अगले जनम में गे बेटा ही हो!

नीरज की सगी माँ संदीप के पास आकर बोली, “संदीप, नीरज को जब इन्होने बताया कि तुम उन्हें रास्ते पर मिले थे, तब उसे यकीन हो गया था, कि तुम एक दिन ज़रूर उससे मिलने आओगे। इसलिए उसने तुम्हें यह डायरी देने को बोली थी।”

माँ ने संदीप को वह दैनिकी दे दी। संदीप की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी। इसलिए वह तभी कैंटीन में जाकर डायरी पढने लगा।

क्या राज़ छुपा होगा नीरज की डायरी में? पढ़ें, कहानी “आधा इश्क” की आखरी किश्त नंबर १० में!