Picture Credit: Raj Pandey / QGraphy

Hindi

कविता : बंदिशें

By अनामिका बर्मन (Anamika Burman)

January 22, 2020

ये किस तरह की बंदिशों में कैद हूँ मैं?क्यों इस तरह घुट-घुट के जीने को मजबूर हूँ मैं?अपनी पहचान से दूर रहता हूँ मैं । इस कदर जीने को मजबूर रहता हूँ मैं । काश होता इतना आसान खुद की पहचान बताना कि ना पड़ता मुझे खुद को यूँ छुपाना । बहुत तड़पता हूँ, छटपटाता हूँ मैं । कोई मुझे जैसा हूँ वैसा ही अपना बना ले बस,इतना ही तो चाहता हूँ मैं ।

कशमकश से भरी ज़िदगी से थक गया हूँ मैं । ना चाह कर भी खामोश सा हो गया हूँ मैं । अपनों में अपनों को खोजता हूँ मैं । हर किसी की आँखों में अपनी एक जगह ढूँढ़ता हूँ मैं । ये किस तरह की बंदिशों में कैद हूँ मैं?क्यों इस तरह घुट-घुट के जीने को मजबूर हूँ मैं?