होमोफोबिया और ट्रांस्फोबिया के विरुद्ध जागतिक दिवस

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जीने की राह, ‘जीना’ की

By अक्षत शर्मा

June 01, 2014

१७ मई को“होमोफोबिया और ट्रांसफोबिया के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय दिवस”मनाया जाता है। समाज और देश के अनुसार समलैंगिकों और ट्रांस जेंडरों के खिलाफ द्वेष के अलग अलग रूप होते हैं. कहीं खुले-आम मार-पीट, कहीं घरों में क़ैद, कभी जबरन शादियां, कभी धर्म के नाम पर भेदभाव। अतः इस दिन व्यक्ति और संस्थाएँ एकजुट होकर इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाती हैं। १७ मई २०१४ को भारत सहित विश्व के १२० देशों में इसके उपलक्ष्य में कार्यक्रम हुए। आज आपकी मुलाक़ात कराते हैं एक ऐसे व्यक्ति से जिन्होंने अपने यश की चरम सीमा पर अपने सच का सामना किया…

…और फिर ‘जीना’ ने अपनी शर्तों पर जीना सीख लिया और सब के लिए प्रेरणास्रोत बनीं।

कई बार दुनिया आपको उस रूप में देखना चाहती हैजो आप नहीं होते हैं, लेकिन भीतर से आप खुद को, अपने अस्तित्व को अच्छी तरह जानते/पहचानते हैंआप जानते हैं कि आप असल में क्या हैं और ये सवाल आपके अन्दर सुलगता और छटपटाता रहता है कि आप वापस अपने उसी अस्तित्व को कैसे पा सकते हैं (जिसे आप महसूस करते हैं)”-जीनाआज आपकी मुलक़ात जीना से करवाते हैं, जिसकी ख्वाहिश बचपन से खुद को संवारने, खूबसूरत दिखने और एक फैशन मॉडल बनने की थी। बतौर एक कामयाब मॉडल एक दिन वो उस मुकाम पर पहुंचने में कामयाब भी हो जाती है जहाँ वो हमेशा खुद को देखने के सपने बुना करती थी। आज जब वो अपनी तस्वीरें देखती है तो उसे ख़ुद पर गर्व महसूस होता है कि वो अपने सपनों को पूरा कर पायी। लेकिन जीना ने अपनी कामयाबी का ये लम्बा सफ़र काफी मुश्किलों को पार कर हासिल किया है जो कि उसके लिए कभी आसान नहीं रहा।

मुश्किलों का दौर :जीना आज जब पीछे मुड़कर देखती हैं तो खुद को कई खांचों में पाती है। ये वो दायरे हैं जिनमें हमारा धर्म, समाज, परिवार हमें बांध देता हैं। वो उन्हें उन्हीं खांचो से देखना चाहता है। जीना का एक सच उसके अतीत में बसता है। जिससे काफी वक़्त तक उसके पडोसी, उसके कुछ दोस्त, सहकर्मी परिचित नहीं थे। एक ऐसा अतीत जो उसके वर्तमान से बिलकुल जुदा है। असल में जन्म के समय जीना एक लड़का थी। फिलिपीन्स में बड़े होते हुए अक्सर खेल के दौरान वो अपने सर के आस पास कपड़ा बांध लिया करती थीं ऐसा करने पर जीना की मां उससे सवाल भी करती कि आखिर वो ऐसा क्यों कर रही है। माँ के सवाल पूछने पर उन्हें कहती कि ये उसके लम्बे बाल हैं और वो लड़की हैं।

नई राह,नया हौसलाजीना ‘जेंडर प्राउड’ की संस्थापक हैं। उनका जन्म मनिला, फिलीपींस में हुआ। आठ साल की उम्र तक आते आते एक कार्यक्रम के दौरान जब वो अपने सामने से एक मॉडल को गुजरता देखती है तो उन्हें एहसास होता है कि वो उसी के जैसा तो बनना चाहती है। लेकिन समाज के लिए जीना अभी भी एक लड़का थीं। और उसकी खुद को एक लड़की के रूप में देखने की ख्वाहिशें अमान्य थी! लैगिकता को हमारे यहाँ आखिरी तथ्य/सच मान लेने की परम्परा है। जिसे आसानी से बदला नहीं जा सकता। जबकि असल में ये अपने में उतना ही जटिलता लिए है। जिसे सिर्फ काले और सफ़ेद के तौर पर देखा नहीं जा सकता। सन १९९९ आते-आते १५ साल की उम्र के होने तक यही सिलसिला जारी रहा। जीना को लड़कों की तरह ही रहना और कपड़े पहनने पड़ते। जबकि वो खुद को कभी लड़का मानती ही नहीं थी। इसबीच एक दिन जीना की मुलाक़ात ‘टी.एल.’ नाम की ब्यूटी पैजेंट मैनेजर से होती है। जो उन्हें एक ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने के लिए राज़ी करने में कामयाब हो जाती है। असल में यहीं से जीना अपने अस्तित्व को पहचाने और स्वीकारने लगीं थी। इस प्रतियोगिता में ४० से ज्यादा प्रतिभागियों के बीच जीना बेस्ट स्विमसूट और बेस्ट गाउन का खिताब अपने नाम कर पाने में सफल होती हैं। वाकई ये उसके खुशनुमां लम्हों में से एक रहा होगा। असल में जीना एक ट्रांसजेंडर थीं। १९ साल की उम्र में जीना ने अपनी सर्जरी करवा ली। आज वो उसी तरह दिखती हैं जैसे वो खुद को देखने की हसरत रखतीं थी।

जीना अपनी कामयाबी और पेशे की ख्याति के चलते लोगों तक अपने उस ‘सच’ को काफी लम्बे अरसे तक लोगों के सामने नहीं ला पायीं कि वो एक ट्रांसजेंडर है, इसलिए नहीं कि उन्हें अपने में कुछ खोट या ‘ग़लत’ नज़र आता था। बल्कि इसलिए कि समाज और उनके अपने जीना को उसी तौर पर सम्मान के साथ स्वीकार करने की हिम्मत दिखा पायेंगे या नहीं जिस रूप में वो खुद को स्वीकार कर चुकी थी।

माँ से मिला हौसला और साथजीना आज अपनी स्थितियों से खुश है। उसमें आज आत्मसम्मान भरा है। वो लोगों से नज़रे मिलाकर अपनी बात रखने में सक्षम है। वो अपने परिवार खासकर अपनी माँ से काफी जुड़ाव महसूस करती हैं, जीना की माँ ने उसकी यौनिकता को उसी तरह स्वीकार किया जैसा वो ख़ुद के लिए महसूस करती थीं। आज उसका भीतर उसके बाहरी रूप से मेल खा चुका था। सन २००१ आते-आते जीना सेनफ्रांसिस्को के लिए रवाना हो गयीं। उनके लिए वो उनकी ज़िन्दगी का एक यादगार लम्हा था जब वो अपने ड्राइविंग लाइसेंस पर अपना नाम और महिला का साइन ‘एफ़’ देख पाई थी। उनके लिए ये उनकी असल पहचान और उनकी अस्मिता का लम्हा था। जीना अपने आपको खुशकिस्मत मानती हैं कि उसे ऐसी माँ मिली जिन्होने उन्हे ख़ुशी से अपना लिया। जीना की ये सोच कई हद तक सही भी है क्योंकि आज भी कई ऐसे लोग हैं जो अपने बच्चों की यौनिकता को स्वीकार नहीं करना चाहते। नतीजतन ऐसे बच्चों में अवसाद की सम्भावना बढ़ जाती है।

आंकड़ों की बात करें तो विषमलिंगी के मुकाबले ट्रांसजेंडर और समलैगिकों की आत्महत्या की दर उनसे ९ गुना ज्यादा है। तस्वीर का दूसरा पहलु देखें तो हमें अपने देश का ही रुख कर लेना चाहिए आज भी ट्रांसजेंडर कई तरह की प्रताड़ना झेल रहे हैं। बहरहाल, हर साल २० नवम्बर को दुनिया के अलग अलग हिस्सों में उन ट्रांसजेंडर्स को याद किया जाता है जिन्होंने जीना जैसे कई लोगों के लिए आगे बढ़कर उन्हें सम्मान के साथ जीने के लिए प्रेरित किया और कभी-कभी अपनी जान भी दे दी।