'जीने दो आज़ाद' - कविता | छाया: चैतन्य चापेकर | सौजन्य: क्यूग्राफी

Hindi

‘जीने दो आजाद’ (कविता)

By सईद हमज़ा (Syeed Hamza)

April 02, 2017

ढाला गया हूँ उसी सेजिस मिट्टी से वजूद है तुम्हारालाल खून हमाराऔर लाल ही तुम्हारा

चाहता हूँ प्यार पानातुम भी तो चाहते होहै जीने की ख्वाहिशदोनों में यकसाँफिर क्यों अंधेरा ?फिर क्यों अंधेरा ? सदियां गुजर चुकी हैं तारीकियों में रहकर अब न पंख मेरे काटो न ही बेड़ियों में बाँधो

आने दो मुझको भी रौशनी में जीने दो आजाद अपनी जिंदगी में और मेरे भी जीवन में कर दो उजाला कर दो उजाला