३७७ भारत छोडो! तस्वीर: बृजेश सुकुमारन

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क्या बात कुफ्र की की है हमने?

By अक्षत शर्मा

January 01, 2014

सुप्रीम कोर्ट से आये इस फैसले पर आवाजें भी उठनी शुरू हो चुकीं हैं

वो सुबह अपने आप में कई मायने में ख़ास थी। तारीख के हिसाब से भी ,और इस मायने में भी कि देश के कुछ नागरिक (सुप्रीम कोर्ट की नज़र में ‘ए मिनीस्क्यूल माईनोरिटी’) अगली सुबह का शिद्दत से इन्तेज़ार कर रहे थे। उस सुबह का इंतज़ार, जो ना जाने कितनी रातों के बाद उन्हें नसीब हुई। जो उनके आने वाले समय और सपनों में रौशनी भरने की संभावना रखती थी। इंतज़ार था कि कब घड़ी की सुइयां साढ़े दस बजने का इशारा करे और देश की सुप्रीम कोर्ट उनके ‘अस्तित्व का फैसला’ सुना दे। कहना ना होगा कि ये फैसला उनका भविष्य तय करने की कुव्वत रखता था।

जब देश के लाखों लोगों और परिवारों ने फैसला सुना तो कईयों को एक पल को यकीन नहीं हुआ। अब अचानक उनके बच्चे अपराधी बनाये जा सकते हैं।असल में समलैंगिक और समलैंगिकता से जुड़े मसलों से सिर्फ कुछ एक लोगों का ही नहीं, बल्कि बहुत सारे परिवारों का ताल्लुक़ है। समलैंगिक बच्चों के माता-पिता उन्हें देश छोड़ने को कह रहे हैं। ताकि वो लोग जो खुद को ‘बदल नही सकते’’ अपनी ज़िन्दगी उसी तरह जी सकें जैसे वो जीना चाहते हैं, और वही अधिकार हासिल कर पायें जो विषमलिंगी को उन देशों में प्राप्त हुए हैं। ऐसे अधिकार प्राप्त करें जिन्हें ‘तथाकथित अधिकार’ (‘सो-काल्ड राइट्स’) कह कर छीना नहीं जा सके। ये अलग बात है कि देश को छोड़ना इस समस्या का कोई समाधान नहीं। लेकिन सवाल ये है कि क्या यही बर्ताव हमारे इस लोकतंत्र का दंभ भरने वाले देश की पहचान बनेगा?

अगर समलैंगिकता पर सज़ा का प्रावधान बरकरार रहा और समाज ,परिवार उनपर शादी का दबाव बनाकर उन्हें शादी करने पर मजबूर करने लगे तो उन लड़कियों और लड़कों की ज़िंदगी का क्या होगा जो उनसे बियाहे जाएँगे? जवाब मुश्किल लग रहा हो तो हाल में आई फिल्म ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को याद कीजिये ,जिसका एक पहलु समलैंगिकता से जुडा था।

साल २००९,दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के बाद लैंगिक अल्पसंख्यकों के चेहरों पर खुशी की लहर उठी थी। ऐसी उम्मीद जताई जा रही थी कि बहुत बदलाव आएगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आँखें फिर नम हुईं। इसबार इसलिए कि अब वो तमाम लोग, एक बार फिर कानून की नज़रों में अपराधी और सजा के हक़दार बनाये गए हैं।मानव अधिकारों के प्रगति पथ पर यह फैसला एक रुकावट है। समलैंगिक कार्यकर्तागौतम भान कहते हैं कि उन्हें संविधान पर पूरा भरोसा है ,जो हमें समानता का अधिकार देता है ,हम अपने अधिकारों को लिए ज़रूर लड़ेंगे ,बेशक इसके लिए सड़कों पर उतरना पड़े. वहीँ वकील आनंद ग्रोवर के मुताबिक ये दिन एक काले दिन के तौर पर याद किया जाएगा। असल में IPC 377, इस कानून का दायरा काफ़ी बड़ा है, यूं तो ये सीधे तौर पर समलैंगिकों को अपना लक्ष्य नहीं बनाता, बल्कि उन क्रियाओं को अपराधी करार करता है जिन्हें ‘अप्राकृतिक’ समझा जाता है।

फैसले पर दुःख

बहरहाल सुप्रीम कोर्ट से आये इस फैसले पर आवाजें भी उठनी शुरू हो चुकीं हैं, समलैंगिक समुदाय से लेकर राजनीती के गलियारों तक।यूपीए के कई मंत्रियों ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया दी, कोंग्रेस अध्यक्षासोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी समेत पी चिदम्बरम ने भी फैसले पर दुःख जताया है। वही, हाल में अपनी जगह बना चुकी आम आदमी पार्टी ने भी इस फैसले पर अपना बयान जारी कर फैसले पर खेद प्रकट किया है।

मिलिंद देवड़ाकहते हैं “मुझे इस फैसले से दुःख पहुंचा है, दुनिया के किसी भी कोने में, किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिये, कई देश समलैंगिकता को अपने यहाँ अपराधिक श्रेणी से हटा चुके हैं, संसद के पास ग़लत को सही करने के सही मौक़ा है’’। लेकिन सवाल जस का तस है, आखिर इसके बाद क्या? क्या सिर्फ अफ़सोस के इन बताशो को बाँट कर सरकार इन्हें चुप करना चाहती है? या कुछ ठोस कदम उठाये जायेंगे ?

देश ही नहीं विदेश में भी कई जगहों से इस फैसले का विरोध दर्ज हुआ है,प्रदर्शन और रैलियां निकाली गयी हैं। इस फैसले ने एकबार फिर हमे उन मुल्कों कि श्रेणी में रख छोड़ा है, जहाँ समलैंगिकता अपराध है।क्या पुलिस से हमें परेशानी होगी? यह डर फ़ैल रहा है। विख्यात लेखक विक्रम सेठ अपनी प्रतिक्रिया कुछ इस तरह देते हैं “कल तक मैं अपराधी नहीं था, लेकिन आज मैं अपराधी हूँ’’ ऐसी ही चिंता फिल्म निर्देशक ओनिर ने जताई , वो कहते हैं कि “कहीं ना कहीं मैं अब अपराधी हूँ’’।

ये भेदभाव क्यों ?

धारा ३७७ उन सब के लिए मायने रखता है, जो तथाकथित ‘अप्राकृतिक’ संबंध रखते हैं, भले ही वे बंद कमरों के अंदर क्यों न हो।

टीवी समेत सोशल नेटवर्किंग साईट इस विषय पर सरगर्म

मनीषा पाण्डे लिखती हैं “फरवरी, २०११ में फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल और चित्रा पालेकर के नेतृत्व में १९ माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वे लोग अपने लेस्बियन और गे (समलैंगिक) बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ रहे थे। उन्‍होंने कहा था, ”हमारे बच्चे अपराधी नहीं हैं। वे दुनिया के सबसे अच्छे बच्चे हैं।”

शुक्र है, इस फैसले के खिलाफ लोग बढ़ चढ कर ऑनलाइन पिटीशन का सहारा भी ले रहे हैं, मामले पर सरकार की तरफ से रिव्यू याचिका कोर्ट में दे दी गयी है।

जहाँ एक तरफ कई धार्मिक संस्थानों ने समलैंगिकता को ग़लत कहा है, वहीँ, कुछ लोगों ने दो वयस्कों के आपसी सहमति के रिश्तों में दखल-अंदाज़ी को गलत कहा है। हैरानी की बात है कि वाहनों पर लाल बत्ती के इस्तेमाल पर रोक लगाते हुए पंडित नेहरु को उद्धृत कर लिखा गया है कि भारत अपने नागरिकों के प्रति दोहरा रवैय्या नहीं अपना सकता। आखिर में गेंद संसद के पाले में भी जा सकती है, शंका है कि क्या देश की कुछ सांसद धार्मिक जस्बातों, वोटबैंक कि राजनीति को ध्यान में रखेंगे. या फिर साहस दिखाकर दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को बहाल कर अल्पसंख्यकों के अधिकारों की फिरसे रक्षा की जायेगी , और लैंगिक अल्पसंख्यकों को अपराधियों की श्रेणी से हटाया जायेगा।