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‘आधा इश्क़’ – एक कहानी (भाग १०/१०)

"आधा इश्क़": भाग १०/१०; तस्वीर: निखिल लोंढे, सौजन्य: QGraphy

"आधा इश्क़": भाग १०/१०; तस्वीर: निखिल लोंढे, सौजन्य: QGraphy

शृंखलाबद्धकहानी ‘आधा इश्क’ की पहली नौ किश्तें यहाँ पढ़ें:

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प्रस्तुत है इस कथा का दसवां और आखरी भाग:

नीरज की डायरी:

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“सन्दीप, अब जब मम्मी ने बताया कि तुम उन्हें मिले थे, तो अचानक सारी पुरानी यादें ताज़ा हो गई। मुझे नहीं पता तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो। पर हाँ, मुझे पता है कि एक दिन तुम मुझसे मिलने ज़रूर आओगे। इसलिए यह सबकुछ लिख रहा हूँ।

मैंने तुम्हें इन तीन सालों में बहुत ज़्यादा मिस किया है। हमेशा लगा, तुमसे बात करूँ। पर फिर सोचा, शायद मेरे वापस आने से पुराने ज़ख्म दुबारा न कुरेदे जाएँ। और ऊपर से यह मेरी बीमारी। लेकिन खुश खबर भी है… तुझे पता है अब मेरी दो-दो माएं हैं? एक को मैं माँ बुलाता हूँ, और दूसरी को मम्मी।

तुम हमेशा मुझसे पूछते थे न, कि मुझे गेंदे के फूल इतने पसंद क्यूँ हैं? शायद तुम्हें याद नहीं, पर कॉलेज के पहले दिन तुमने जिस औरत की बस स्टॉप पर मदद की थी, वह मेरी माँ थी। पहला दिन होने की वजह से मुझे बस स्टॉप पर छोड़ने आई थी। शायद अब तुम कभी नहीं पूछोगे कि मुझे गेंदे के फूल क्यों पसंद हैं। उस दिन मैंने तुम्हें अपने ही क्लास में देखा तो बहुत खुश हो गया। सदैव इंतज़ार करता रहा, कि तुम अपनी तरफ से आकर मुझसे बात करो, मुझसे दोस्ती करो। शुक्र है वैसे ही हुआ। और इस दौरान जाने कब मुझे तुमसे प्यार हो गया।

मुझे इस बात का, तुमसे प्यार होने का, अफ़सोस नहीं है। विशवास करो, इसकी वजह यह है कि मैंने अपने प्यार को अपनी कमजोरी नहीं, अपनी ताक़त बनाई। शायद इसी शक्ति के बल-बूते मैं अपनी बीमारी से पिछले तीन सालों में झूँझ पाया।

संदीप, मुझे तुम्हें एक ज़रूरी बात बतानी है। रिज़ल्ट के दिन मैं कोलेज आया था। मैंने तुम्हें ढूँढा पर तुम नहीं दिखे। पूनम वहीँ थी। पर मैंने उससे तुम्हारा अता-पता पूछना ठीक नहीं समझा। मैंने तुम्हें मोबाइल से फोन करने की भी सोची लेकिन मेरा बैलेंस ख़त्म हो चूका था। इसलिए मैं रिचार्ज कराने पास ही की दुकान पर स्कूटी पर गया, तो वह बंद थी, अतः गोदाम वाली दुकान की तरफ रुख किया।

लेकिन वह भी बंद थी। उस सुनसान गली में जाकर मुझे कुछ अजीब-सी हरकत सुनाई दी। गोदाम की उस गली में आगे कुछ पुरानी दुकानें थी। आगे जाकर एक टूटी हुई बंद खिडकी से झांककर देखा। बंद कमरे में कुछ लड़के हमारे ही कोलेज की एक लड़की पर ज़बरदस्ती कर रहे थे। ज़ाहिर था कि उन्होंने उसे ज़बरदस्ती उठा लिया था। कुछ लोगों ने देखा भी, पर किसी ने कुछ नहीं किया। मुझसे देखा नहीं गया। मैं उस तरफ चला गया और बंद कमरे का दरवाज़ा धक्का देकर खोला। मैं उन लड़कों को पहचानता था।

“अरे राजू, अमर, दीपक, इतना अच्छा मक्खन अकेले-अकेले ही खाओगे क्या? थोडा-सा हमें भी चटाओ। आज तक हमने कभी खाया ही नहीं। मैंने जान-बूझकर उन्ही की तरह सड़क-छाप होने का आभास दिलाया।

“अरे नीरज तुझे भी दिलचस्पी है क्या? चलो भी ठीक है। आज इसकी नथनी हमारा वर्जिन बाबु उतारेगा। कहकर उन्होंने लड़की को मेरे पास धकेल दिया। मैंने चुपके से उसके हाथ में स्कूटी की चाबी दे दी। वह समझ गई। खड़े होकर उन्मत्त होने का स्वांग रचाने लगी। जैसे ही मौक़ा मिला, मैंने उसे दरवाज़े की तरफ धक्का दिया। वह उसे खोलकर भाग गई, और मैंने दरवाज़ा जंग खाई हुई, जर्जरित कुण्डी लगाकर अन्दर से बंद कर लिया। बाहर से उस लड़की के स्कूटी स्टार्ट करने और चले जाने की आवाज़ आई। वह स्कूटी मम्मी ने मुझे तोहफे में दी थी। लड़कों ने दरवाज़े की तरफ छलांग लगाईं लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। लड़की स्कूटी पर सवार गली से निकलती हुई बच गई। टूटी खिड़की से अपने टूटे अरमानों को वे देखने लगे। मैं डर गया। थोड़ी आशा हुई, शायद लड़की पुलिस को लेकर वापस आएगी, और मेरा एहसान चुकाएगी। लेकिन वह वापस नहीं आई।

और यहाँ हवस से पागल ३ लड़के मेरी दगाबाजी कि वजह से भड़क गए थे। “साले बहनचोद, हीरो बन रहा है बड़ा? लड़की को भगा दिया, अब यह इतना खडा हुआ है अब इसका क्या करेंगे?

दूसरे ने बोला: “यह है न! लड़की गई तो क्या हुआ? लड़का है यहाँ, कवला माल। हमें क्या, सॉकेट में प्लग डालने से मतलब है। और चूस भी तो लेगा यह अच्छे से!” उसके बाद क्या। २ घंटों तक वह सब चलता रहा। उन तीनों के सामने मेरी कुछ नहीं चली। तीनों ने एक के बाद एक मेरे मुंह में लंड डाला, और फिर मेरी गांड मारी, जबकि दो मेरे हाथ पैर पकडे हुए थे। और उनमें से शायद किसी एक को एड्स था। जिसका संक्रमण मुझे हुआ। और आज मैं यहाँ पर पडा हुआ हूँ।

इस सब के बावजूद, मुझे अच्छा इस बात से लग रहा है, कि मेरी ज़िंदगी ज़ाया नहीं हुई। आज वह लड़की कहीं बहुत खुश होगी। और शायद मुझे याद कर रही होगी। आशा है संदीप, मेरी तमाम गलतियों के लिए तुम मुझे माफ़ करोगे।

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संदीप की आँखों से पानी बहना नहीं रुक रहा था। उसने हमेशा नीरज को बुरा ही बोला। पर अज, वह नीरज सबसे ज्यादा आदर के लायक निकला। संदीप बस एक बात की वजह से अपराधी महसूस कर रहा था। अगर वह एक दिन पहले अस्पताल आता तो नीरज से माफी मांग पाता। उसने ज़िंदगी का इतना बड़ा मौक़ा खो दिया, सिर्फ अपनी गलतफहमियों कि वजह से। उसे सारी ज़िंदगी इसी अफ़सोस के साथ जीना पड़ेगा। और यही उसकी सजा बन गई थी: नीरज का उसके प्रति सच्चा प्रेम, जो आधा इश्क को रूप में एक क्रूर विडम्बना बनकर उसे जीवन भर सताते रहता।

“दीदी, उन्होंने तो आने से इनकार कर दिया है। अब दाह-संस्कार की विधियां कौन करेगा? मेरे बेटे की आत्मा को शान्ति तो मिलेगी न?” नीरज की माँ उसकी सगी मम्मी से बात कर रही थी।

“उसकी आत्मा को शान्ति ज़रूर मिलेगी। मैं करूंगा सारी विधियां पूरी। और उसकी आखरी इच्छा भी। मैं दूँगा उसे अग्नि। एक जीवन साथी के तौर पर।” संदीप की बात सुनकर दोनों खुश हो गयीं।

संदीप ने एक आखरी बार नीरज को होठों पर चूमा। मन ही मन में उसे कहा, तुम्हारा इश्क भले ही एक तरफ़ा हो, वह आधा नहीं है। आज मैं उसे पूरा होने का दर्जा देता हूँ। संदीप ने आखरी बार नीरज को होठों पर चूमा। फिर उसके पार्थिव शरीर को अग्नि दे दी।

उसकी जलती चिता को देख, संदीप ने उसकी आत्मा को अनकहा सन्देश भेजा: “मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ नीरज। मेरी ज़िंदगी में तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता… कभी नहीं। मेरे जीवन में आने के लिए धन्यवाद। मेरा दोस्त बनने के लिए धन्यवाद। मुझे जीवन का असली मतलब समझाने के लिए। मुझे मेरा प्यार दिलाने के लिए। और सबसे बड़ा शुक्रिया, मुझे प्यार करने के लिए। शायद तुम्हारे जितना प्यार मुझे कोई और नहीं कर पाएगा।”

किसी की प्रगल्भ सच्चाई बिना जाने हम उसपर राय बना लेते हैं, उसे बुरा करार कर देते हैं। परन्तु हम गहराई में जाकर या उसकी बात को बिना पूर्वाग्रह सुनकर समझ जाएंगे कि वह पहले पहल बनाई गई राय कितनी गलत है। शायद इसी वजह से हमें कई बार किसी हादसे के पश्चात वर्षों तक अपराधी भावना के साथ जीना पड़ता है। यह भावना न हमें जीने देती हैं, न मरने।

संदीप, पूनम और प्रीती आज लैंगिकता अल्पसंख्यकों के अधिकारों के समर्थक हैं। आज नीरज उनके दिल में ज़िंदा है।

नीरज के आखरी शब्द:

जादू। प्यार जादू है, प्यार हर चीज़ को जिंदा-दिल बना देता है। सबसे बदसूरत झांझे को भी वह खूबसूरत तितली में परिवर्तित करता है। वह दुनिया को इस भाँती बदलता है, कि वह फिर कभी वह अंधकारमय नहीं लगती, न ही दुख- या दर्द-भरी। लेकिन प्यार इतना भी ताक़तवर नहीं है कि वह हमें मौत से बचाए। वह हमें ऐसा पिता नहीं दे सकता जो हमारे पास कभी था ही नहीं। जब आप दुनिया में पूरी तरह से स्वयं को अकेले पाते हो वह कुछ नहीं कर सकता। दरअसल, वासत्व मैं ऐसी कोई जादू नहीं है।

लेकिन ठीक उसी समय जब तुम्हें लगेगा, कि जादू नाम की कोई चीज़ नहीं है, कि जादू का अनुभव तुम्हें कभी नहीं होगा, यकायक कोई आ जाता है, और वह बेमिसाल होता है। वह हर चीज़, हर पल को बहतर बनाता है। उसकी वजह से तुम फिर मुस्काते हो। वह जादू तुम्हारे जीवन की किताब में स्वर्णिम अक्षरों से लिखना शुरू करती है। उसकी वजह से तुम्हें भरोसा हो जाता है ज़िंदगी पर, उस जादू की करामत पर। जिस जादू पर दिल ही दिल में तुम हमेशा विश्वास करते थे, करना चाहते थे। अपने आप को मनाना चाहते थे कि वह असली है, कि वह माया नहीं है। लेकिन फिर सबकुछ ख़त्म हो जाता है। जादू की स्याही फीकी पड़ जाती है, और फिर किस्मत के पन्नों पर दिखाई भी नहीं देती। भला तुमने अपने आप को एक खुबसूरत झूठ पर विश्वास रखने की अनुमति कैसे दी?

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