'पॉल एक गाथा' (७/८) | तस्वीर: फेबियन हार्टवेल | तस्वीर केवल प्रस्तुतीकरण हेतु'पॉल एक गाथा' (७/८) | तस्वीर: फेबियन हार्टवेल | तस्वीर केवल प्रस्तुतीकरण हेतु|

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“पॉल – एक गाथा” – श्रृंखलाबद्ध कहानी (भाग ७/८)

By Mahesh Nebhwani

May 21, 2017

यह एक वास्विक घटनाओ से प्रेरित परन्तु काल्पनिक कहानी है। तस्वीरें केवल प्रस्तुतीकरण हेतु हैं और उनमें दर्शाए गए लोगों का कथा से कोई संबंध नहीं है। इस कहानी की पिछली कड़ियाँ यहाँ पढ़ें:

भाग १ |भाग २ |भाग ३ |भाग ४ |भाग ५ |भाग ६ |

प्रस्तुत है कहानी कि सातवी कड़ी:

गाँव पहुँचते ही मैंने राहत की साँस ली। अब मैं अपने और पॉल को सुरक्षित महसूस कर रहा था। घर पहुँचा तो दादा (ताऊ जी) को हमारा इंतजार करते हुए पाया। मैंने उन्हें देखते ही झुककर उनके पाँव छुए। तभी पॉल ने भी इसका अनुसरण करते हुए दादा के पाँव छुए। मैं तो आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगा। एक फिरिंगी का इस तरह बड़ो का आदर करते हुए मैंने पहली बार देखा था। शायद उसने यह सब भारत में रहते हुए सीख लिया होगा। दादा को ममी ने फ़ोन करके पहले ही सब बता दिया था। दादा ने पूछा, “अब कैसा है?” तब मैंने पूरी बात दादा को बताई। दादा ने कहा, “तुम चिंता नहीं करो। गाँव में तुम दोनों को कोई हाथ भी नहीं लगा सकता।“ और उन्होंने छोटू को आवाज़ दी। छोटू कोई १२ साल का लड़का है। उसके माँ-बाप के मरने के बाद वो दादा के साथ ही रहता है। दादा ही उसकी पढ़ाई-लिखाई और अन्य बातों का ख्याल रखते हैं। दादा की वैसे तो खुद की कोई औलाद नहीं है। लेकिन वो छोटू को ही अपना बेटा मानते हैं।

छोटू ने आते ही मेरे पांव छुए और पूछा, “भइया कैसे हो?” मैंने भी कहा, “ठीक है छोटू। और तुम बताओ, कैसा चल रहा है? पढ़ाई कैसी चल रही है? उसने ठेड राजस्थानी लहजे में उत्तर दिया, “सब बढ़िया चाल रहो है भाई सा।” फिर उसने पॉल की तरफ देखते हुए पूछा, “आ सा कोण से?” मैंने उसे बताया, “इनका नाम पॉल है और अभी कुछ दिनों तक ये यंही गाँव में अपने साथ रहेगा।” दादा ने छोटू को लस्सी लाने के लिए कहा। हमें अपने कमरे की तरफ ले जाते हुए बोला, “ छोरा अठे कोई चिंता करवा की जरूरत न है। तू छोखो करियो कि इ छोरा ने अठे लेर आ गयो। थे दोनों अठे आराम हु रहो और इ छोरा के घर खबर बिजवा दे। सुब ठीक हो जावेगो।” फिर थोड़ी देर इधर-उधर की बात करते रहे। पॉल सिर्फ सब देखे जा रहा था। उसके चहरे पर कोई भाव नहीं थे। मुझे मालूम नहीं था कि वो यह सब समझ रहा है या नहीं। लेकिन उसके चहरे को देखने से लगता था कि वो अपने आप को सुरक्षित महसूस कर रहा हो।

शाम को हम लोग (मैं, पॉल और छोटू) गाँव के तलाब पर गए। और वहाँ घूम ही रहे थे कि अचानक पॉल ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे पानी की तरफ खींचने लगा। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने पानी की तरफ इशारा किया। और भागते हुए तलाब में छलांग लगा दी। मैं अवाक्-सा खड़ा देखता रहा था। अचानक ही मेरे दिमाग में ख्याल आया कि वो कंही फिर से आत्महत्या की कोशिश तो नहीं कर रहा है? यह सोचते है मैंने भी पानी में छलांग लगा दी। लेकिन पानी में जाते ही मैंने देखा कि वो तो तैरकर तालाब के दूसरी तरफ जा रहा है। मैं भी उसके पीछे-पीछे तैरने लगा। वो दूसरी तरफ किनारे के पास पहुँचकर मुझ पर पानी उछालने लगा, जैसे कि मस्ती करना चाहता हो। वो मुझ पर पानी उछालते हुए हँस रहा था। इतने में छोटू भी हमारे पीछे-पीछे तैरकर दूसरे किनारे तक आ चुका था। वो भी हमारे साथ मस्ती में शामिल हो गया। हम तीनो एक दुसरे पर पानी उछालते हुए हँस-खेल रहे थे।

थोड़ी देर बाद पॉल जब थक गया तो हम लोग पास में लगे आम के बाग़ में चले गए। छोटू जो कि पेड़ पर चढ़ने में माहिर था, ६-७ पके हुए आम तोड़ लाया। और हम तीनो बड़े मज़े लेकर आम खाने लगे। शाम ढलने लगी थी। हम घर लौट आये। दादा ने पहले ही दाल-बाटी-चूरमे का बन्दोबस्त कर रखा था। हम चारों ने मिल कर खाना खाया। थोड़ी देर से टी.वी देख रहे थे तभी मुझे लगा कि पॉल को नींद आ रही है। वो बार बार टी.वी. देखते हुए ऊँघने लगता था। सो दादा ने कहा, “तुम दोनों जाकर ऊपर वाले कमरे में सो जाओ। मैंने पलंग और पंखा लगवा दिया है।” सो पॉल और मैं ऊपर चले गए। बिस्तर पर लेटते ही पॉल तो ऐसे सो गया जैसे कई दिनों बाद सोया हो। और मैं उसे लगातार देखे जा रहा था। सोच रहा था कि आगे क्या होगा? सोचते-सोचते कब नींद आ गयी, मुझे भी नहीं पता चला।

सुबह जैसे ही आँख खुली, पहली नजर पास में लेटे पॉल पर गई। वो अभी भी सो रहा था। और उसने अपने एक हाथ से मुझे आलिंगन कर रखा था। सोए हुए वो बहुत मासूम लग रहा था। और फिर न जाने क्यों, मैंने आगे बढ़ते हुए उसके ललाट पर एक चुम्बन कर दिया। अपने आप को सँभालते हुए बिस्तर से उठा और नीचे चला गया। ताऊ जी छोटू को पढ़ा रहे थे। मुझे देखते ही पूछा, “रात को नीद आई न? चाय पियोगे? और पॉल (जिसे ताऊ जी अपने ही स्टाइल में ‘पुल’ कह रह थे) उठा कि नहीं?” नीचे चाय पीने के बाद, एक और प्याली चाय और कुछ बिस्कुट ऊपर अपने कमरे में लेकर गया। पॉल अभी भी सोया हुआ था। मैंने चाय टेबल पर रख दी और पॉल को उठाने के लिए जैसे ही पलंग पर झुका तो पॉल ने अपने दोनों हाथ मेरी तरफ ऐसे फेला दिए जैसे वो मुझे आलिंगन करने के लिए कह रहा हो। और मैंने भी उसे अपनी बाहों में भर लिया। कुछ देर तक हम एक दुसरे को आलिंगन करे पड़े रहे। मुझे बहुत अच्छा लगा था और शायद उसे भी। फिर वो उठ कर बैठ गया और उसने चाय और बिस्कुट लिए। घड़े में से गिलास में ठंडा पानी भरके पिया।

अभी मैं नहाने जा ही रहा था, तभी मेरे मोबाइल की घंटी बजी। मैंने फ़ोन रिसीव किया तो वो मेरा फेसबुकवाला दोस्त था जो कि पॉल के ही कोलेज में पढ़ता था। उसने किसी तरीके से कोलेज के रेकोर्ड से पॉल की फॅमिली, जो कि फ्रांस में रहती थी, उनका फ़ोन नं और ईमेल एड्रेस निकलवा लिए थे। मैंने जल्द से फ़ोन नं और ईमेल एड्रेस नोट किए और उसे थैंक्स बोला। उसने पॉल के बारे में पूछा तो मैंने उसे झूट बोला कि अभी भी वो हॉस्पिटल में ही है। मैं नहीं चाहता था कि अभी किसी को भी उसके बारे में पता चले। मैंने फ्रांस के दोस्त द्वारा दिए नं पर फ़ोन लगाया। दो तीन घंटियों के बाद किसी महिला ने उस तरफ से फ़ोन उठाया। मैंने उनसे बात करने की कोशिश की। लेकिन शयद उन्हें इंग्लिश नहीं आती थी। वो लगातार फ्रेंच में कुछ बोल रही थी जो मेरी समझ के बाहर था। मैंने फ़ोन रखते हुए सोचा, ये तो नयी मुसीबत आ खड़ी हो गयी है। अब कांटेक्ट क्रमांक तो था, पर भाषा के कारण मैं उन्हें पॉल की हालत के बारे में नहीं बता पा रहा था। सिवाय इसके, मैं किसी ऐसे दोस्त को भी नहीं जनता था जिसे फ्रेंच आती हो। अभी मैं इस बारे में सोच ही रहा था तभी फ़ोन की घंटी फिर से बजी। घर से फ़ोन था। उठाते ही मम्मी की घबराई हुई आवाज आई। उन्होंने बताया कि कुछ देर पहले दो पुलिसवाले घर पर आये थे। मेरे बारे में पूछ रहे थे। लेकिन मम्मी ने उन्हें झूठ बोल दिया कि मैं वैष्णो देवी गया हुआ हूँ।

कहानी की आठवी और आखरी कड़ी पढ़ें गेलेक्सी हिंदी में, अगले हफ्ते…

यह एक पूर्णतः काल्पनिक कहानी है। तस्वीरें केवल प्रस्तुतीकरण हेतु हैं और उनमें दर्शाए गए लोगों का कथा से कोई संबंध नहीं है।