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यह एक वास्विक घटनाओ से प्रेरित परन्तु काल्पनिक कहानी है। तस्वीरें केवल प्रस्तुतीकरण हेतु हैं और उनमें दर्शाए गए लोगों का कथा से कोई संबंध नहीं है। प्रस्तुत है कथा का पहला भाग:

रोज की तरह आज भी सुबह-सुबह अस्पताल पहुँचकर कपडे बदले और यूनिफार्म पहन कर अपने ड्यूटी चार्ट को देखा तो आज मेरी ड्यूटी वार्ड नंबर ४ में लगी थी। वैसे तो हर वार्ड एक जैसा ही था। पर वार्ड ४ मुझे बिलकुल पसंद नहीं था। वहाँ मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगो को रखा जाता था, और कई बार उन लोगो को सम्भालना बहुत मुश्किल हो जाता था। खासकर मुझे क्योंकि कम्पाउंडर का काम ही मरीजों को सम्भालना था।

खैर मैं वार्ड ४ पहुंचा। आज काफी शांति थी। मैंने पहुँचते ही अपने से पहले वाले कम्पाउंडर जिसका नाम हरीश था, उससे चार्ज लिया। जैसे ही मरीजों की सूचि देखी तो मालूम हुआ कि आज केवल ६ ही मरीज थे। मैंने सोचा, पहले एक राउंड ले लेता हूँ और जो भी इंजेक्शन या दवाई देनी है देकर फिर आराम से आकर नाश्ता करता हूँ, सो मैंने ट्रे लेकर लिस्ट में लिखी दवाई निकाली और पहले मरीज के पास फिर दूसरे और तीसरे बेड से होता हुआ चौथे बेड पर पहुंचा। तो देखा कोई फिरंगी है।

वैसे तो हमारे हॉस्पिटल में कभी-कभी फिरंगी मरीज भी आते हैं। लेकिन ज्यादातर ड्रग ओवरडोज़ के ही केस होते हैं। जैसा कि आप सब को भी मालूम है, पुष्कर जैसे पर्यटन स्थल पर ड्रग्स बहुत आसानी से मिल जाती हैं। ये फिरंगी कभी-कभी ओवरडोज़ भी कर लेते हैं। उन्हें या तो होटल वाले या टैक्सी वाले हॉस्पिटल छोड़ जाते हैं।

पॉल एक गाथा (१/८) | तस्वीर: शुभंकर मण्डल | सौजन्य: क्यूग्राफी |

पॉल एक गाथा (१/८) | तस्वीर: शुभंकर मण्डल | सौजन्य: क्यूग्राफी |

मैं चौथे बेड पर पहुँचा और मरीज की हिस्ट्री (जो कि उसके बेड के पास पड़ी रहती है) देखने लगा। पता चला यह कोई २५ साल का ‘पॉल’ है जो किसी मानसिक रोग से ग्रस्त है।  इसी वजह से बोलता भी नहीं है। उसे जेल से यहाँ लाया गया था। वैसे तो जेल से आये कैदी के साथ कोई न कोई पुलिस वाला जरूर होता है। पर इसके साथ कोई नहीं था।

वह पिछले ५ दिनों से यहाँ था। मैं जब यह सब पढ़ ही रहा था तो उसने अपनी आँखे खोली। वह मुझे देखने लगा। हम दोनों की आँखे मिली तो उसके चहरे पर कोई भाव नहीं आये। मैं उसे देख कर मुस्करया तो उसने भी मुस्करा कर उसका जवाब दिया। दिखने में तो वह बहुत ही प्यारा था। नीली-नीली आँखे और उन आँखों मे एक खालीपन जरूर था। उसे एक गोली और एक इंजेक्शन देना था, सो मैंने उसे सहारा देकर उठा कर बैठा दिया। उससे अंग्रेज़ी में ‘हाउ आर यू?’ पूछा।

उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह केवल मुझे देखता ही रहा। न जाने क्यों मुझे उससे हमदर्दी का अहसास होने लगा। मैंने उसे गोली देने के लिए पानी की बोतल उठाई। तब ध्यान आया कि इसने कुछ खाया है कि नहीं। क्योंकि यह गोली १००० मिलिग्राम की थी और अगर उसने कुछ नहीं खाया होगा तो ऎसी गोली उसके लिए ठीक नहीं होगी। मैंने हिस्ट्री उठाई और देखा तो इस संदर्भ मे कुछ नहीं लिखा था। मैंने आस-पास नज़र दौड़ाई और देखा कि उसके पास टेबल पर कुछ खाने को बिस्कुट या कोई फ्रूट है कि नहीं। लेकिन वहाँ कुछ नहीं था।

पॉल एक गाथा (१/८) | तस्वीर: कार्तिक शर्मा | सौजन्य: क्यूग्राफी |

पॉल एक गाथा (१/८) | तस्वीर: कार्तिक शर्मा | सौजन्य: क्यूग्राफी |

तभी पास वाले मरीज के एक रिश्तेदार, जो की ३ नं वाले बेड के पास बैठा था, मैंने उससे पूछा: ‘इस ४ नं वाले मरीज के साथ कौन है?’। तो उसने कहा, ‘कोई नहीं। रात को एक पुलिस वाला आया था। बस उसके बाद से यह अकेला ही है।’ मैंने इशारा करके पॉल से पूछना चाहा कि उसने कुछ खाया है? लेकिन वो तो मुझे एक टक देखता ही जा रहा था। उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मैंने उससे फिर हाथ का इशारा करते हुए पूछा “डिड यू ईट एनीथिंग?”।

लेकिन वो था की बस एकटक मुझे देख रहा था। कोई जवाब नहीं। मैंने उसे दवाई और इंजेक्शन नहीं देने का फैसला करते हुय सोचा कि मैं दूसरे दोनों मरीजों को निपटाके मुझसे पहले ड्यूटी पर रहे हरीश से फ़ोन पर पूछ लूँगा कि इसने कुछ खाया है कि नहीं। फिर उसी अनुसार इसे दवाई दूँगा। मैंने दूसरे दोनों मरीजों को दवाई दी और अपनी टेबल पर आकर हरीश को फ़ोन लगया। लेकिन उसने फ़ोन नहीं उठाया। मैंने सोचा शायद वो अभी घर जाने के लिए बाइक पर होगा। मैं कुछ देर बाद फ़ोन कर के उससे पूछ लूँगा, और फिर मैंने अपना नाश्ते का टिफ़िन उठाया और खोलने लगा।

तभी हरीश का फ़ोन आ गया। मैंने फ़ोन पर उससे पूछा की ४ नं वाले मरीज ने कुछ खाया है या नहीं, क्योंकि उसकी दवाइयाँ बहुत ही हाई डोज़ हैं। उसने कहा, ‘नहीं उसने कुछ नहीं खाया है’। कल रात को पुलिस वाला उसे दो एप्पल दे कर गया था। लेकिन उसने नहीं खाए तो वो पुलिस वाला वो भी वापस ले कर चला गया था। “बेचारा” रात से ही भूखा होगा, मैंने  हरीश का फ़ोन काटते हुए सोचा, और अपना टिफ़िन ले कर उसके पास पहुंचा।

पॉल एक गाथा (१/८) | तस्वीर: एकलव्य | सौजन्य: क्यूग्राफी |

पॉल एक गाथा (१/८) | तस्वीर: एकलव्य | सौजन्य: क्यूग्राफी |

उसे सहारा देकर बेड पर बिठाया और टिफ़िन से सेन्डविच निकाल कर उसकी तरफ बढ़ाया। उसने हाथ बढ़ाकर वो लेना चाहा लेकिन शायद दवाइयों का असर था या कमजोरी, वह सेन्डविच पकड़ नहीं पा रहा था। मैंने सेन्डविच का एक टुकड़ा तोड़कर उसके मुंह में डाल दिया। वो धीरे-धीरे खाने लगा। और इस तरह धीरे-धीरे उसने दोनों सेन्डविच खा लिए। पानी भी पीया। लेकिन उसकी आँखे मुझे एकटक देखे जा रही थी। मुझे वह थोड़ा अजीब-सा लग रहा था। खैर, थोड़ी देर बाद उसे मैंने दवाई और इंजेक्शन दे दिया और वह सो गया। ११ बजने को आये थे और डॉक्टर के राउंड का टाइम हो रहा था। सो मैंने एक बार फिर से वार्ड का राउंड लगया और सब कुछ व्यवस्थित करने लगा।

पढ़ें कहानी ‘पॉल एक गाथा’ की अगली किश्त गेलेक्सी हिंदी में।