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शाम को ड्यूटी ख़तम होने के बाद मैं पॉल के वार्ड में गया। वो अभी भी सो रहा था। दवाई का असर था। मैं उसके पास बैठा था। तभी उस वार्ड के कम्पाउंडर ने मुझे आकर कहा: “भैया, आज डॉक्टर इस के लिए शॉक थेरपी लिख कर गए हैं। कल इसे शॉक देने के लिए दुसरे हॉस्पिटल शिफ्ट करना पड़ेगा। मेरे पाँव तले ज़मीं खिसक गयी। मुझे मालूम था कि शॉक थेरेपी कोई वाज़े इलाज नहीं है। दुनिया में कुछ ही ऐसे देश हैं जो इसे मान्यता आज भी देते हैं। पश्चिम के देशों में यह पूरी तरह से निषेध है, और वहाँ के डॉक्टर्स का मानना है कि इससे दिमाग को फायदा कम नुकसान ज्यादा होता है। लेकिन फलस्वरूप मरीज़ शांत हो जाता है। वो उग्र नहीं हो पता। मैं नहीं चाहता था कि पॉल के दिमाग को और ज्यादा नुकसान पहुँचे। न जाने क्यों, मैं उसे मानसिक तौर पर रोगी मानने को तयार ही नहीं था। मुझे लगता था कि अगर उसकी अच्छी तरह से देखभाल की जाये, और उसे इस माहौल से निकाल कर किसी अन्य वातावरण में कुछ दिनों तक रखा जाये, तो वो ठीक हो सकता है।

'पॉल एक गाथा' (६/८) | तस्वीर: कार्तिक शर्मा | सौजन्य: क्यूग्राफी |

‘पॉल एक गाथा’ (६/८) | तस्वीर: कार्तिक शर्मा | सौजन्य: क्यूग्राफी |

लेकिन मेरी सुनेगा कौन? डॉक्टर तो शॉक थेरपी पहले ही लिख चुके हैं। अगर उसका माहोल बदलना भी हो तो उसे कहाँ ले जाया जा सकता था? इसी उधेड़बुन में उस वार्ड के कम्पाउंडर को पॉल का ख्याल रखने की सलाह देते हुए मैं हॉस्पिटल के बाहर आ ही रहा था… तभी मेरे दिमाग़ में एक विचार आया और मैं वापस हॉस्पिटल में घुस गया। हॉस्पिटल सुपरिन्टेन्डेन्ट को १५ दिनों की छुट्टी की अर्जी दे दी। घर पहुँचकर माँ को मैंने आज जो कुछ हुआ, सब कुछ बतया। माँ से कहा, “अगर कल वो उसे शॉक दिलवाने ले गए तो पॉल शायद फिर कभी भी ठीक नहीं हो पायेगा।” माँ ने बोला, “बेटा, तू इसमें क्या कर सकता है? अब वो जाने और उसका भाग्य। तू उसके लिए जो कर सकता था वो तूने कर लिया। अब सिर्फ देवी माँ उसकी रक्षा कर सकती हैं।”

'पॉल एक गाथा' (६/८) | तस्वीर: चैतन्य चापेकर | सौजन्य: क्यूग्राफी |

‘पॉल एक गाथा’ (६/८) | तस्वीर: चैतन्य चापेकर | सौजन्य: क्यूग्राफी |

मैंने माँ से कहा, “माँ, अगर मैं उसे कुछ दिनों के लिए हॉस्पिटल और जेल से बाहर कहीं ले जा सकूँ तो मुझे लगता है कि वो ठीक हो जायेगा। अगर तू अनुमति दे तो मैं उसे हमारे गाँववाले घर ले जाकर कुछ दिन रखूँ? माँ, उसका माहौल बदलेगा तो वो जरुर ठीक हो जायेगा। तब तक शायद उसके घरवालों से भी संपर्क हो जाये, और वे भी आ जाएँ। उन्हें देख कर उसमे भी आत्मविश्वास पुनः जगेगा।” “पर तू उसे निकालेगा कैसे?”, माँ ने पूछा। मैंने कहा, “माँ वो तू मुझ पर छोड़ दे। बस तू अगले १५ दिनों तक किसी को भी यह नहीं बताना कि मैं गाँव में हूँ। किसी को भी नहीं। और हाँ, थोडा-सा खाना और मेरे कपडे पैक कर दे। मैं कल पॉल को लेकर गाँव चला जाऊँगा।” माँ को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्यों किसी अनजाने के लिए यह सब कर रहा हूँ। लेकिन उसने बिना कुछ पूछे बोला, “तुझे यदि लगता है कि ऐसा करने से  वो ठीक हो जायेगा तो ठीक है… मैं तेरे कपडे पैक कर देती हूँ। वैसे तो गाँव में दादा ( मेरे ताऊजी ) तो हैं। किसी भी तरह की तकलीफ नहीं होगी। लेकिन रोज फ़ोन करते रहना। मुझे तेरी चिंता रहेगी।”

'पॉल एक गाथा' (६/८) | तस्वीर: शुभंकर मण्डल | सौजन्य: क्यूग्राफी |

‘पॉल एक गाथा’ (६/८) | तस्वीर: शुभंकर मण्डल | सौजन्य: क्यूग्राफी |

अगले दिन तडके ही मैंने अपना बेग उठाया और हॉस्पिटल पहुँच गया। आज से मैंने छुट्टी ले रखी थी। मैं सीधा पॉल के वार्ड में पहुँचा। उसे नाश्ता खिलाने के बाद मैंने वार्ड के कम्पाउंडर से पुछा, “उसे कितने बजे शॉक के लिए ले जानेवाले हैं?” उसने कहा, “बस थोड़ी ही देर में एम्बुलेंस आने वाली है।” मैंने उसे कहा, “ठीक है। मेरी आज छुटटी है। मैं इसके साथ चला जाऊँगा।” इतना कहकर मैं नीचे आ गया, जहां एम्बुलेंस खड़ी होती है। उनको मैनेज करने वाले इंचार्ज से जाकर पूछा, “वो स्पेशल वार्ड वाले मरीज को ले जाने के लिए एम्बुलेंस आ गयी है क्या?” उसने बोला, “नहीं। थोड़ी देर लगेगी। उसका टायर पंचर हो गया है।” मैं भागकर  पॉल के वार्ड में पहुँचा। वार्ड कम्पाउंडर से कहा, “एम्बुलेंस आ गयी है। मैं मरीज को ले जाता हूँ। उसने कागजी कारवाही करते हुए मुझे डिस्चार्ज टिकेट देते हुए कहा, “इस पर एम्बुलेंस वाले और दूसरी हॉस्पिटल वालो से साईन जरुर ले लेना।”

'पॉल एक गाथा' (६/८) | तस्वीर: हृषिकेश पेटवे | सौजन्य: क्यूग्राफी |

‘पॉल एक गाथा’ (६/८) | तस्वीर: हृषिकेश पेटवे | सौजन्य: क्यूग्राफी |

मैंने हाँ में हाँ मिलाते हुए पॉल को व्हीलचेयर पर बिठाया। उसे नीचे पार्किंग में ले आया जहाँ मैंने अपनी स्कूटर पार्क की हुई थी। मैंने स्कूटर स्टार्ट की। पॉल को पीछे बिठाया और हॉस्पिटल से बहार निकल गया। मेरा दिल जोर-जोर से धडक रहा था। पॉल इस सब से अनजान मेरे पीछे बैठा था। उसने अपनी बाँहें मेरी कमर में डाल कर मुझे कस के पकड़ रखा था। मेरा गाँव अजमेर से कुछ ६० किलोमीटर दूर था। मैं स्कूटर बड़ी तेजी से चला रहा था। जल्द से जल्द हॉस्पिटल और अजमेर से दूर निकल जाना चाह रहा था। पॉल ने मुझे कस के पकड़ रखा था। शहर के बहार हाईवे पर आते ही मैंने चैन की साँस ली। करीबन २० किलोमीटर जाने के बाद स्कूटर एक ढाबे के पास लाकर खड़ी की। पॉल ने सुबह से कुछ नहीं खाया होगा यह सोच कर उसे लेकर अन्दर गया। मैंने बैठते ही २ आलू के पराठे वेटर को लाने के लिए कहा।

'पॉल एक गाथा' (६/८) | तस्वीर: मानसी सोहणी | सौजन्य: क्यूग्राफी |

‘पॉल एक गाथा’ (६/८) | तस्वीर: मानसी सोहणी | सौजन्य: क्यूग्राफी |

बैग से एक टी शर्ट और जींस निकाली। पॉल को बाथरूम में ले जा कर उसके कपडे चेंज करवा दिए। उसकी हॉस्पिटल वाली ड्रेस को वापिस बैग में रख दिया। बाहर आकर हम लोग नाश्ते के लिए इंतजार कर रहे थे। पॉल बिना कुछ कहे मुझे लगातार देखे जा रहा था। नाश्ता करने के बाद हम लोग ढाबे से बहार आ गए और मैंने सिगरेट जलाई। जैसे ही मैंने एक फूँक मारी, पॉल ने मेरे मुँह से सिगरेट निकालकर स्टाइल से एक पफ मारा, और जोर-जोर से हसने लगा। मैं भी उसे देखकर जोर-जोर से हँसने लगा। मैंने पहली बार उसे हँसते हुए देखा था। शायद वो इतने दिनों में पहली बार उन सब यातनाओ से दूर आया था। मुझे उसे हँसते देखकर बहुत अच्छा लग रहा था। सिगरेट ख़तम करके हम लोग फिर बाइक पर अपनी मंजिल की तरफ चल बढे।