Syeed Hamza

'जीने दो आज़ाद' - कविता | छाया: चैतन्य चापेकर | सौजन्य: क्यूग्राफी

‘जीने दो आजाद’ (कविता)

ढाला गया हूँ उसी सेजिस मिट्टी से वजूद है तुम्हारालाल खून हमाराऔर लाल ही तुम्हारा चाहता हूँ प्यार पानातुम भी तो चाहते होहै जीने की ख्वाहिशदोनों में यकसाँफिर क... Read More...