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'संगिनी' - एक कहानी (भाग १/५) | छाया: अविजित चक्रवर्ती | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी |

‘संगिनी’ (श्रृंखलाबद्ध कहानी भाग १/५)

जब से मनीषा की शादी तय हुई तभी से उसकी बेचैनी सातवें आसमान पर थी। उसने सपने में भी शादी के बारे में नहीं सोचा था। वो तो शादी करना ही नहीं चाहती थी। उसने सीधे अपनी माँ से जाकर बात करने का मन बनाया। शर्म तो आती थी लेकिन शर्म करते रहने से उसकी जिंदगी खत... Read More...
'दो पहलू' - एक कविता | तस्वीर: अभिषेक गौर | सौजन्य: क्यूग्राफी |

“दो पहलू” – एक कविता

एक रात एक सपना आता है, जिसके दो पहेलू होते हैं। एक में तो हम सोते हैं, दूसरे में अन्दर से रोते हैं। एक पहेलू में होती खुशियाँ सारी , जहाँ ख़्वाबों की होती परियाँ सारी। इस मन में न कोई इख्तियार, एक पल लगता, कहीं हुई हार। सुई की नोंक पर रखीं चाह... Read More...
'उन्होंने कुछ नहीं कहा' - एक कविता | तस्वीर: सेंतिल वासन | सौजन्य: क्यूग्राफी |

“उन्होंने कुछ नहीं कहा” – स्वगत कथन

प्रस्तुत है इस स्वगत-कथन की उत्तर-कृति: वह चुपचाप होने वाली बातें जो होकर रह गयी हैं: वक़्त के तले में अब भी चिपकी हुई हैं। वो कुछ न कह सके हम कुछ न कह सके; कभी हिम्मत न थी: कभी कहने को मौका न था; कभी कहने को कुछ बचा न था। १ वह पूरे रस्ते चिपककर बै... Read More...
'अर्धनारीश्वर' - एक कविता | चित्रकार: उदित नारायण मेष |

‘अर्धनारीश्वर’ – एक कविता

पहनो जो तुम पहनना चाहते हो करो जो तुम्हारा दिल कहे ज़माने की बंदिशों को परवरदिगार न समझ अनासिर बुत न समझ मुझे मैं भी उतना ही खुदा हूँ जितना है तू  घुंगरू तो मुझसे पूछते नहीं, "आखिर तेरी ज़ात क्या है?" न जाने किसने देख ली क्रूरता में मर्दानगी... Read More...
'दुविधा' एक कविता | छाया: कार्तिक शर्मा | सौजन्य: क्यूग्राफी |

दुविधा (एक कविता)

जलते कोयले पर जमी राख की परत को मिली है तुम्हारे स्पर्श से हवा अब इस सुलगी आग का क्या करूँ मैं? छोड़ दूँ गर इसे अपने नतीजे पे तो प्रश्न अस्तित्त्व का है बुझा भी दूँ किसी की मदद से तो सवाल है नीती-अनीती का… इस दुविधा में मुझे फँसाकर यूँ मुँ... Read More...
क्रॉसड्रेसर - एक कविता | तस्वीर: वेंकट रामदास | सौजन्य: क्यूग्राफी |

क्रॉसड्रेसर – एक कविता

 कुछ काम मैंने औरतों की तरह किए कुछ नहीं, कई और फिर धीरे-धीरे, सारे   सबसे आखिर में जब मैं लिखने बैठा मैंने कमर सीधी खड़ी करके पंजों और ऐड़ियों को सीध में रखकर बैठना सीखा इससे कूल्हों को जगह मिली और पेट को आराम उसने बाहर... Read More...
धनञ्जय चौहान

‘फीस में बढौतरी न मिटा पाई पढने की जिज्ञासा’

पंजाब विश्वविद्यालय का घटनाक्रम - मेरी नज़र में (अप्रैल २०१७ में लिखित) मैं धनञ्जय मंगलमुखी पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ की प्रथम ट्रांसजेंडर विद्यार्थी हूँ। मैं ४५ वर्ष तक अपनी असली पहचान के लिए संघर्ष करती रही। सारी दुनिया के लोग हैरान परेशान हैं क... Read More...
'ब्रेड-कटलेट-पोहा-ऑमलेट' - एक कहानी | तस्वीर: ग्लेन हेडन | सौजन्य: क्यूग्राफी |

“ब्रेड-कटलेट-पोहा-आमलेट” (कहानी)

मई - जुलाई २०१६, ग्राइंडर पर: 'जगह है':-“बॉडी नहीं प्लीज़” 'आर्य५२७':-“ठीक है” 'जगह है':-“नो किसिंग...नो टचिंग" 'आर्य५२७':-“ठीक है” 'जगह है':-“सिर्फ ब्लो जॉब ” 'आर्य५२७':-“ठीक है” 'जगह है':- “म्म्म...” 'जगह है':-“जब तुम ब्लो करोगे अगर मैं स्मो... Read More...
'तथाकथित से संवैधानिक तक' | तस्वीर: अमन अल्ताफ | सौजन्य: क्यूग्राफी |

संपादकीय: ‘तथाकथित’ से ‘संवैधानिक’ तक: व्यक्तिगतता की जीत ने जगाई लैंगिकता अल्पसंख्यकों में आशा की किरण

“निजिता या व्यक्तिगतता एक आतंरिक और मूलभूत अधिकार है”। भारतीय उच्चतम न्यायलय के ९ न्यायाधीशों के संविधान पीठ ने आज २४ अगस्त २०१७ को यह ऐतिहासिक फैसला दिया। संविधान के अनुच्छेद २१ के तहत हर भारतीय नागरिक का प्रदत्त जीवन और स्वातंत्र्य संरक्षित है। केव... Read More...
'सिसक' (एक कविता) | तस्वीर: हृषिकेश पेट्वे | सौजन्य: क्यूग्राफी |

सिसक – एक कविता

रोशनदानों की रोशनी सी पुलक-पुलक मैंने इबादत पढ़ी है जो परवरदिगार इसका तू और आयात तेरे अफ़साने। जावेदा-सी नहीं है ये शमा कोई, तेरी जुस्तजू में आफ़ताब-सा मेरा हिय सुलग उठा है। हिय मेरा जो पुलक-पुलक ये सुलगे, ये तो बस पाक होने का ज़रिया है। आसीबी आत... Read More...
'वापसी' (२/२) | तस्वीर: ग्लेन हेडन |

“वापसी” एक शृंखलाबद्ध कहानी (भाग २/२)

कहानी की पहली किश्त यहाँ पढ़ें। उसका घर, घर जैसा था। फिर बातें हुई, बहुत-सी बातें, कुछ जरुरी थी, कुछ ग़ैर-जरुरी, कुछ याद हैं, बहुत-सी नहीं भी। उन बातो का सार यही था कि उसका नाम मधेश है, जिसका मतलब होता है मच्छर या मक्खी या तितली या ऐसा ही कुछ, मुझे आज... Read More...
'वापसी' (१/२) | तस्वीर: क्लेस्टन डीकोस्टा | सौजन्य: क्यूग्राफी |

“वापसी” एक शृंखलाबद्ध कहानी (भाग १/२)

एक सपना हर रात आता है। अँधेरा-सा कॉरिडोर है। कोने पर लिफ्ट है। गरदन झुकाये मैं चला जा रहा हूँ। आवाज़ आती है।  "एक ही प्रेस करना, ज़ीरो नहीं।"  कोई चेहरा नहीं। बस आवाज़। अरसा गुज़र चूका है, पर कुछ है जो मेरे ज़हन से उतरा नहीं है। सपनों ने काफी तबाही मचायी ... Read More...