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Mumbai Pride

एलजीबीटी एक्टिविस्ट पंडित जी

ऐसा एलजीबीटी एक्टिविस्ट जो देशप्रेम के लिए एलजीबीटी लोगों की बलि भी देने को तैयार हो, तो एलजीबीटी समुदाय का उद्धार बिल्कुल तय है

कविता : बंदिशें

ये किस तरह की बंदिशों में कैद हूँ मैं? क्यों इस तरह घुट-घुट के जीने को मजबूर हूँ मैं?
आधा इश्क (८/१०) | तस्वीर: राज पाण्डेय | सौजन्य: QGraphy

कहानी : स्वीकार

सुरेश उसकी सच्चाई नहीं जानता था इसलिए गुरमीत को डर था कि कहीं वो उसे खो ना दे क्योंकि इससे पहले गुरमीत ने कभी खुद को इतना खुश और कम्फ़र्टेबल महसूस नहीं किया था
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गे होना या ना होना…

बाइनरी अंक से कंप्यूटर चल सकते हैं, इंसान नहीं। गे होने या न होने का सवाल न्याय से शुरू होकर लोकतांत्रिक मूल्यों तक पहुँचा है। ये ज़रूरी है क्योंकि इससे हम किसी भी लैंगिकता को सामान्य और आधुनिक परिप्रेक्ष का हिस्सा समझ कर अपनाएँगे।
Trans

उसने पूछा था…

ऐसा क्यों होता है हमारे समाज में? ऐसे बच्चे का इसके लिए क्या दोष है? उसे भी तो उसी ईश्वर ने बनाया है जिसने अन्य सभी को बनाया है, फिर वो इस उपेक्षा का शिकार क्यों? वो समस्या नहीं है किसी के लिए।

रविश के नाम ट्रांस* बिल के विरोध में खत

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ हिंसा करने वाले लोगों को सिसजेंडर लोगों के साथ हिंसा करने वाले लोगों से कम सज़ा देकर क्या साबित करना चाहते हैं? कि ट्रांसजेंडर समुदाय की जान का कोई मूल्य नहीं है?

कविता : नदी के किनारे

नदी के दो किनारे थे हम, एक दूसरे से बिल्कुल अलग। हमारा एक होना, लगभग नामुमकिन और हमारा एक होना, मतलब नदी का अंत।

अफ़ग़ानी होते हुए भी, खुद को भारतीय के रूप में स्वीकारना

द कारपेट वीवर पूरब भर के सभी LGBTQIA के लिए एक आवाज़ और एक पात्र बन गया जो समलैंगिकता को छुपाये हुए हैं, क्योंकि उन्हें जान का खतरा है या कारावास या अन्य प्रकार के उत्पीड़न का डर है।

कविता : वजूद

जब दुनिया ने मुझे मुझसे भरमाया. तब मैंने अपना 'वजूद' अपनाया।