कहानी: चड्डी में हाथ

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2008 था ; दस साल पहले किसी ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया था, जयपुर के मेरे इंजीनियरिंग हॉस्टल के मेरे कमरे में; रात के दस-ग्यारह बजे, बहुत सारी भुला दी गयी बातों; जो अक्सर इन हॉस्टल में होती है; के किसी छोर पर या बीच में, मेरे रूमपार्ट्नर के उन पाँच-छह दोस्तों (जिनके नाम मैं जनता नहीं था पर जो मेरे दोस्त बनने वाले थे पर जिनके नाम मुझे आज फिर याद नहीं आते) में से एक ने, उस उमस भरी शाम को बताया था की “हमारे स्कूल हॉस्टल में एक चूतिया था; जो चड्डी में हाथ डाले रखता था।

और भी कई गैर ज़रूरी बातें बताई गई तुम्हारे बारे में जैसे लोग किस तरह बर्ताव करते थे; हँसते थे; तुम्हे हाथ धोने के लिए बोला जाता था; तुम पीटे थे क्योंकि तुमने किसी के खाने को छुआ था; तुम नहाने जाते थे, हॉस्टल के गलियारों से गुज़रते हुए, गाना गाते हुए, एक हाथ में बाल्टी लिए हुए, एक हाथ चड्डी में डाले हुए।

वो बात हुई, और भी कई बातें हुई, वो रात गुज़र गयी और भी कई रातें गुज़र गयी। हॉस्टल छूट गया; वो सभी लोग छूट गए, धुँधलाते गए फिर मिट गए, नए लोग मिले, नयी बातें की। छूटने का और मिलने का ये सिलसिला ज़िन्दगी में कभी थमा नहीं पर मेरी ज़िन्दगी में कुछ था जो कभी मिटा नहीं, गहराता गया; उन अँधेरी रातों में भी नहीं जब आँखें अँधेरा ही टटोल पाती थी, “तुम्हारा चड्डी में हाथ”।

कई बार तलब सी उठती है; उन पुरानी डायरियों को उठाऊँ जो आखरी दिन लिए गए उन फ़ोन नम्बरों से भरी है जो इन सालो में बदले जा चुके हैं और जिन्हे बदले जाने से पहले या बाद में ढूँढ़ा नहीं गया है। उन नामो और नम्बरो के बीच में उस एक को ढुंढु जिसने तुम्हें गाना गाते हुए सुना है; उस हॉस्टल के गलियारों में, एक हाथ में बाल्टी लिए हुए और एक हाथ चड्डी में डाले हुए | उससे पूछूँ तुम्हारा नाम, सरनेम, तुम्हारी चड्डी के रंग, तुम्हारा रंग, तुम्हारी बाल्टियों का रंग, तुम्हारी आँखों के बारे में, तुम्हारे हाथों के बारे में की तुम्हारे हाथों की कभी गंध ली हो तो, ज़रा सा चखा हो तो; तुम्हारा शहर, तुम्हारी गली सब कुछ पूछ डालूँ।

तुम्हें ढूँढ़ते हुए आऊँ तुम्हारे शहर तक, तुम्हारी गली तक, तुम्हारे घर तक, उस बिस्तर तक जिस पर तुम पड़े हो , चड्डी में हाथ डाले हुए।

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