गुवाहाटी, तेरी प्राईड-रंजित माटी!

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गुवाहाटी प्राइड परेड २०१४

गुवाहाटी प्राइड परेड २०१४; तस्वीर: लेस्ली एस्टीव्ज़।

९ फरवरी २०१४ को असम राज्य के गुवाहाटी शहर में पहली बार प्राईड परेड हुआ। सुबह ११ बजे चली मार्च दिघलिपुखुड़ी से शुरू होकर आर.बी.आई, ओल्ड एस.पी ऑफिस लेन, कॉटन कॉलेज, लतहील फील्ड, आम्बरी लांब मार्ग होकर टी. सी. छात्रा विद्यालय पॉइंट, गुवाहाटी क्लब तक चली और दोपहर १:३० को समाप्त हुई। लगभग १०० लोग इसमें शरीक हुए। यह मार्च इसलिए ऐतिहासिक है, कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों कि यह पहली प्राईड थी। आइये जानते हैं इससे जुड़े लोगों के अनुभव, उनकी ज़बानी।

एक आयोजिका बितोपी दत्ता कहती हैं: “भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में और गुवाहाटी में एल.जी.बी.टी.आई.क्यू. अधिकारों के प्रश्न पर प्रायः मीडिया में ख़ामोशी थी। इसका मतलब यह नहीं कि यहाँ लैंगिक अल्पसंख्यक नहीं है। बल्कि आवाज़ उठाने में कठिनाइयाँ काफी सारी हैं। बुद्धिजीवी संगठन, तरुण कार्यकर्ता, सामाजिक सेवा संस्थाओं में निजी तौर पर चर्चा चलती आयी है, पर सार्वजनिक तौर पर कम। आवाज़ उठाने की मनीषा को ११ दिसंबर २०१३ के उच्चतम न्यायलय के फैसले के बाद बढ़ावा मिला। १५ दिसंबर २०१३ को “जागतिक कोप दिवस” पर दीगर शहरों के साथ गुवाहाटी वाले भी एकजुटता के साथ शामिल हुए। तभी प्राईड आयोजित करने का सपना देखा और साकार किया।”

आयोजिका मीनाक्षी बुजरबरुआ का मानना हैं, कि पूर्वोत्तर राज्य और ज़यादा देर तक चुप रहकर लैंगिकता अल्पसंखयकों को हाशिये पर खड़ा करके उनके साथ भेदभाव नहीं कर सकते। “यहाँ की संस्कृतियों में चुनौतियां समझना, और प्रगितिशील नजरिया अपनाने का वक़्त आ गया है। सबसे मुश्किल काम था समर्थन जुटाना। हम यंग पेशेवर स्वयंसेवक हैं। बहुत कम लोगों ने हौसला-अफ़ज़ाई की, और पैसे भी नहीं थे। पर जब राष्ट्रीय स्तर पर जाने जानेवाले कार्यकर्ताओं ने देश के विभिन्न शहरों में अपील की, तो लोगों ने इस मार्च की ऐतिहासिकता समझी और मदद अणि शुरू हो गयी।”

संघटनात्मक संरचना से जुड़े मुद्दों के आलावा सुरक्षा की दृष्टि से रूढ़िवादी ताक़तों से धमकियाँ मिली। आयोजिका अंकिता गुप्ता बताती हैं, “कुछ ताक़तवर लोगों ने इवेंट को होने से रोकने के लिए बदनाम करने या गलतफहमियों द्वारा बहकाने की कोशिशें की। बजट बहुत कम था और अविश्वास के माहौल में कुछ प्रादेशिक एजेंसियों को शक था की कोई गड़बड़ तो नहीं हो रही, इसलिए कुछ फंडिंग नकारा भी गया। एक बार तो स्थानीय रूढ़िवादी संगठन के कुछ गुंडों ने एक गैर-सरकारी संगठन को बंद कराने की कोशिश की। गैर-सरकारी संगठन के यहाँ हम सपोर्ट माँगने गए थे। इसलिए रूढ़िवादी संस्था को ग़लतफ़हमी हुई कि वे आयोजकों में शामिल थे!”

दबाव और धमकियों के बावजूद प्राईड का आयोजन करने से आत्मविश्वास बढ़ा, और मालूम हुआ कि विरोधकोंसे समर्थकों की ताक़त ज़यादा है। मिली दत्ता के अनुसार, “इसके आयोजन में औरतों ने नेतृत्व किया। देखनेवालों, असम पुलिस और प्रशासन से ख़ूब समर्थन मिला। हर उम्र, लैंगिकता के लोगों ने हिस्सा लिया। आशा है इसकी वजह से अब पूर्वोत्तर राज्यों में पब्लिक स्तर पर एल.जी.बी.टी.आई.क्यू. अधिकारों के बारे में बहस होगी। प्रादेशिक मीडिया ने टीवी अखबारों इत्यादि द्वारा सही जानकारी फैलायी जिसके लिए हम उनके ऋणी हैं।”

मार्च के पहले जोश था लेकिन लोगों की प्रतिक्रिया का डर भी। दबाव-धमकियों से थोड़े कम लोग आये। लेकिन ९ फरवरी के दिन कोई डर नहीं था, बल्कि एक ऊर्जा, एक निर्धार था आगे बढ़ने का। बितोपी: “मैं तो कहती हूँ कि लोगों ने दबाव के होते हुए कहा आप आगे बढ़ो, हम आपके साथ हैं। जितना आपको डराया-धमकाया जायेगा, उतना हम आपका और समर्थन करेंगे। यह अनुभव अविस्मरणीय था!”

‘आमना’ नामक संस्था की मणिपुर से ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता संता खुराई कहती हैं, “भारत में बड़े शहरों में आंदोलन ताक़तवर है। लेकिन ये राष्ट्रिय समस्या है और हर प्रांत में इसके सन्दर्भ में जुटाव (मोबिलाइज़ेशन) होना चाहिए। एक भी राज्य बाहर नहीं रहना चाहिए। कोई वंशवाद या रेसिज़म भी नहीं होना चाहिए।”

गुवाहाटी प्राईड के आयोजक राष्ट्रिय क्वीयर आंदोलन और मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और कोल्कता जैसे बड़े शहरों के कार्यकर्ताओं को सन्देश देना चाहते हैं। संजीब चक्रबर्ती, क्षेत्रीय कार्यक्रम अधिकारी, उत्तर पूर्वी क्षेत्री कार्यालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, कहते हैं, “एल.जी.बी.टी.आई.क्यू विषयों पर काम करने के पूर्वोत्तर राज्यों में विभिन्न पहलू हैं। पूर्वोत्तर एक सजातीय इकाई (‘होमोजीनियस एनटीटी’) नहीं है, जैसे दर्शाया जाता है। इस विस्तारित परिदृश्य में आपको विभिन्न उप-संस्कृतियां मिलेंगी। वैविध्य है भाषाओँ, धर्मों (कुछ राज्यों में ऑर्थोडॉक्स चर्च हैं), लोगों (जाती, जनताति की जटिलताएँ), और परंपरागत मानसिकता में। अभिजात वर्ग के बुद्धिजीवियों में भी ज़बरदस्त होमोफोबिया है! बहुत कम संस्थाएँ इन विषयों पर काम कर रहीं हैं। फंडिंग नहीं है, और चूँकि हम तरुण सामाजिक कार्यकर्ता हैं, और खासकर औरतें हैं, हमें आसानी से धमकियों का शिकार बनाया जाता है, जोखिम उठाने पड़ते हैं।”

मीनाक्षी कहती हैं, “राष्ट्रिय ग्रुपों से हमारी दरख्वास्त है, कि अपने पंखों का विस्तार बढ़ाये, और भविष्य में और बड़े अभियानों के बारे में सोचना चाहिए। यहाँ के कार्यकर्ताओं में कम करने का बहुत सारा उत्साह और जोश है। ऐसा ज़रूरी नहीं कि बदलाव सिर्फ संस्थाओं का ज़िम्मा हो, आम लोगों में कुछ करने का सहस जगे। इस पर्यायी मार्ग को धारणीय (सस्टेनेबल) बनाने के लिए राष्ट्रिय और प्रादेशिक एल.जी.बी.टी.आई.क्यू. आंदोलनों की मदद ज़रूरी होगी।”

मणिपुर की संता खुराई कहती हैं, “कितना अच्छा होगा अगर पूर्वोत्तर राज्यों की आठ बहनें एक साथ इस राष्ट्रीय धारा ३७७ की समस्या पर एक साथ मिलकर काम करें! जब हैम मार्च कर रहे थे, असमिया गानों को सुनकर मेरे एक सह प्रदर्शनकारी की आँखों में आंसूं आ गए। हम सब बहुत आज़ाद महसूस कर रहे थे। लोग ३७७ के खिलाफ नारे लगा रहे थे। काश वहाँ और ट्रांस औरतें भी होतीं।”

गुवाहाटी की सड़कों पर खुले आम अपनी कवियरियात व्यक्त करना कैसे लगा? मिली बताती हैं, “वो सुबह हमारे लिए गौरवपूर्ण और जस्बातों से भरी थी। हमें अपने निर्धार का तीव्रता से अहसास हुआ। चाहे कुछ भी हो, हम आगे बढ़ेंगे। लोग जिस तरह एकजुट हुए, और देखनेवालों ने हमदर्दी जतायी, मेरा दिल फूला नहीं समाया। जब हमने हाथों से बनाये कागज़ के दिलों को बाँटा, तो लोगों की मुस्कराहट ने हमें और भी निडर बनाया। कितना प्यार था उनमें! मैंने गुवाहाटी इसलिए चूड़ा की यहाँ मेरा अपना एलजीबीटी समुदाय नहीं था। मैंने कभी नहीं सोचा की एक दिन, मैं वापस आऊँगी और इंद्रधनुषी झंडा हाथ में पकडे अपने शहर की सड़कों पर चलूंगी। लेकिन ये सपना सच हुआ। मेरा जन्मस्थान अब मेरा अपना हुआ। मेरी आँखों में आंसूं आये।”

शिलोंग, मेघालय में ‘शमकामी’ संस्था की संस्थापक रबीना सुब्बा जो वकील हैं, कहती हैं, “मैं पिछले साल कोल्कता में प्राइड वाक में चली थी। बहुत अछा लगा था। मैं चाहती हूँ की ऐसा प्राइड मार्च मेरे राज्य में भी हो। लेकिन जानती हूँ की समुदाय के सदस्य डरे हुए हैं। अगर मुहल्लेवाले या आस-पास रहने वाले उन्हें मार्च में देख लें तो आगे चलकर मुसीबत पैदा हो सकती है।”

अब आगे क्या? संजीब चक्रबर्ती कहते हैं, “प्राईड तो महज़ पहला क़दम था, पूर्वोत्तर राज्यों के क्वीयर आंदोलन में. हम सुग्राहीकरण (सेंसिटाइज़ेशन) और जागरूकता निर्माण प्रोग्राम बनाकर आम आदमी तक पहुंचना चाहते हैं। कम आय वाले गुटों से उनकी कहानिया उनकी ज़बानी सुनकर उन्हें संगृहीत करना चाहते हैं। खासकर वो आवाज़ें जो पहले सुनी नहीं गयी हो। यह शहरों का ही मुद्दा नहीं है। और ग़ैर-क्वीयर लोगों और संघटनाओं से मैत्री बढ़ाना भी आवश्यक है जिससे दूरी घटे।”

मिली के अनुसार, “उम्मीद है अगले साल लोग अधिक और मुश्किलें कम होंगी! युवकों में लैंगिकता अल्पसंख्यकों के मसलों के लिए एक साथ लाना, उनमें नेतृत्व के गुणों को बढ़ावा देना, जिससे आगे चलकर एक मज़बूत सपोर्ट सिस्टम बने पूर्वोत्तर राज्यों में।”

मेघालय की रबीना सुब्बा कहती है, “पूर्वोत्तर राज्यों के एल.जी.बी.टी.आई क्यों आंदोलन के लिए गुवाहाटी एक केंद्रबिंदु बन सकता है। हम एक साथ प्रोग्राम रख सकते हैं। इससे एका बढ़ेगा और आंदोलन मज़बूत होगा। मैं गुवाहाटी प्राइड के आयोजकों को बधाई बात देती हूँ।”

असमिया गाने जैसे ‘तप्त तीखारे’ और ‘मोर मोरोमे मोरोम बिसारी जाई” सुनने में आये। आखिर में, असम की रूह भूपेन हज़ारिका का असमिया गीत, जो प्रदर्शनकारियों ने गाया:

“मानुहे मानुहोर बाबे, जोदीहे ओकोनू नभाबे
भाबीबो कुनेनु कुआ?
ओक्कोनो होहानीभूतिरे
भाबीबो कुनेनु कुआ?”

[मानव मानवता को न सोचे
तो कौन सोचेगा?
बिना सहिष्णुता के
होगी सबकी अवहेलना]