‘हैलो ३७७’ – एक कविता

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हैलो ३७७

हैलो ३७७; छाया: बृजेश सुकुमारन

हैलो ३७७. आज मुझे तुमसे कुछ बातें कहनी हैं.

मुझे ये जो ज़रूरत महसूस होती है

अचानक बेबाक कहने की-

मुझे उससे प्यार है, मुझे प्यार है उससे

और यह भी

कि उसके पंखों की उड़ान

मेरी ही उड़ान है

वो बारिश भी उसी की है

जो मुझे ओस की तरह छू कर जाती है

और वापस आती है बादल बनकर

याद दिलाती है मुझको

जनवरी की सर्द शामों की

उसके कांपते होंठों का एहसास

जो मेरी पीठ पर चलते हैं

धीमे से

उस एहसास का क्या कहूँ?

तो क्यों ना

उसका हाथ पकड़ चलूँ

उसकी धड़कनों के तले

उसके जिस्म की राह पकड़

लोग कहते हैं

तुम्हें हमारा प्यार पसंद नहीं?

तुम जिन सख्त निगाहों से हमें देखते हो

जैसे हमें कैद कर देना चाहते हो

क्या तुम प्यार के रंगों को

कैद करना भी जानते हो?

या उस शब्द को

जिसे मैं रोज़ सुबह

अपने जिस्म पर महसूस करता हूँ?

क्या आजकल आकर्षण को भी कैद किया जाता है?

तुम जानते हो क्या?

वैसे मैं तुम्हारे बारे में इतना कुछ नहीं जानता।

ये तो मेरे दोस्त हैं

जो मुझे तुम्हारे बारे में बत्ताते हैं

काफी पढ़े लिखे हैं मेरे दोस्त

कुछ तो वकील भी हैं

उन्होंने कहा तुम १५० सालों से हमसे नफरत करते हो

काफी आश्चर्य हुआ था मुझे ये सुनकर

और हंसी भी आयी थी

१५० साल कि नफरत

प्यार को काबू करने में कम कैसे पड़ गयी?

तुम थक गए होगे है ना?

तुम्हें आज एक दोस्त चाहिए

मेरे जैसा

जो तुम्हें समझ सके

जो बाकी सबकी तरह

तुम्हारी काया को

इक कागज़ का बेकार टुकड़ा ना समझे

मेरे जैसा दोस्त

जो तुम्हें सही राह दिखाए

जो प्यार से कभी ना थके

जो तुम्हें बता सके

ये प्यार ही तो ज़िन्दगी है

मेरे दोस्त

इसमें थकते नहीं

इसमें सिर्फ चलते है

बहुत तेज़ बहुत दूर– नफरत से!

नफरत से बहुत दूर

और बहुत आगे

Shaleen Rakesh

Author and activist, Shaleen Rakesh has been at the forefront of India's gender and sexuality movement for over two decades. Primary petitioner to challenge Section 377 of the Indian Penal Code in 2001, he is presently Director at India HIV/AIDS Alliance in New Delhi, and Editor with independent publishing house OpenWord. His first collection of poems "The Lion and the Antler" (World View Publications, 2013) has received much acclaim .