पेहराव और पहचान

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पेहराव और पहचान

पेहराव और पहचान; तस्वीर: बृजेश सुकुमारन

मैं एक उभयलैंगिक (बाइसेक्शुअल) औरत हूँ। कुछ चीज़ों में मैं किसी भी दूसरी औरत की तरह हूँ। मुझे सजना-धजना, मेक-अप लगाना, हील्स पेहेनना अच्छा लगता है। लेकिन दूसरी तरफ मुझमे कुछ मर्दानी प्रवृत्तियाँ भी हैं। मेरे बाल वाकई छोटे हैं, लड़कों जैसे। कपड़ों में मुझे सबसे ज़यादा आराम जींस में महसूस होता है। हाँ, कभी कभार मैं उन्हें भी ‘अक्सेसराईज़’ करती हूँ। पैंट पहनने पर मेरी चाल ढीली, मर्दानी हो जाती है। लेकिन जब मैं औरत की तरह पेहराव करती हूँ तो मेरी लचक मदमाती है!

मेरी कहानी आपको शायद अजीब लगे। ज़्यादातर लोगों को अपनी सच्ची यौनिकता बचपन या जवानी में मालूम होती है। लेकिन मैं मिडल-एज में अपनी असली आइडेंटिटी से परिचित हुई। चुटकी में मैंने वह स्वीकार भी करी। हाल ही में मैंने एक क्वीयर पार्टी में शिरकत की। एक दोस्त मुझे डांस फलोर पर ले गया। अंदर जाने पर मैं थोड़ी सहम गयी। फलोर पे सारे लड़के थे, नाचते हुए, लड़कियों जैसे हाव-भाव करते हुए। इसे देखने की मुझे आदत थी, पर एक साथ इतने सारे!

मेरी प्रॉब्लम उनके औरताना अदाओं से नहीं, बल्कि इस बात से थी की वे मुझे अपने साथ नाचने पर मजबूर कर रहे थे, और मैं झटक-मटककर नाच नहीं सकती। अब मेरा शरीर इतना लचीला नहीं रहा! मैं वह लय खो गयी हूँ, जो मेरे सख्त अवयवों को लचकाए। मैं भोंडेपन के साथ हिलने लगी फ्लोर पे, और अपने आप को बेमौक़ा महसूस करने लगी।

मेरे दोस्त ने ताड़ लिया। उसने अपने दोस्त से दरख्वास्त की, कि मुझे मौजूद औरतों से मिलवाये। उसके दोस्त ने मुझे नाचने वालों कि खचाखच भीड़ से निकालकर हॉल के आगे के हिस्से में लाया, जहां साड़ी लडकियां एक तंग गाँठ कि तरह इकठ्ठा होकर म्यूजिक सिस्टम से उछलती आइटम सॉन्ग की बीट पर नाच रही थी। मैंने एक बड़ी, चैन की साँस ली! वो लडकियां मर्दाने हावभावों के साथ नाच रही थी. मैंने अपने आप को फिरसे सहज महसूस किया और एन्जॉय करने लगी।

नाचने लगी और आजु-बाजू वालों पर ग़ौर करने लगी। ज़्यादातर औरतें लड़कों के कपड़ों में थी। जींस, शर्ट जो दिखा रहे थे की वे कितनी समरस थी वे अपने व्यक्तिमत्त्व के मर्दाने पहलु के साथ। इनमें से किसी को भी मैं ड्रेस में कल्पना नहीं कर सकती थी। मुझे तो लगने लगा की सबसे ज़यादा औरताना लिबास तो मैंने ही पहना है! हाँ मेरे बाल छोटे और मर्दाने हैं, जिससे मेरी गर्दन साफ़ दिखाई देती है। मैंने एल लेस-वाली काली शर्ट और जंग के रंग के ‘कॉर्ड्स’ पहने थे। इनके साथ मेरे कन्धों को छूती लंबी लटकती कान की बालियाँ, काली लंबी हील वाली सैंडल और सुनहरी-जंग के रंग की लिपस्टिक।

काफी लड़कों ने चमकीले रंग के शर्ट पहने थे, और कुछ ने मेक उप। कुछ ने साड़ियों और स्कर्टों में क्रॉस-ड्रेस किया था। इस सब ने मुझे सोचने पर मजबूर किया, की हमारी लैंगिकता, अवचेतन रूप से किस हद तक हमारी पहचान बन जाती है। जो हम करते हैं, क्या सोचते हैं, और समाज में किस तरह रोज़मर्रा रहते हैं। अब जब मैं सोचने लगी हूँ, निष्कर्ष यह है की मेरा व्यक्तिमत्त्व मेरी लैंगिकता का प्रतिबिम्ब है।

क्या हमारा काम भी हमारे अंदर के स्त्री और पुरुष तत्त्वों का आइना है? मिसाल के तौर पर, जो अपने स्त्री तत्त्व के क़रीब हैं, शायद वे सर्जन वाले या रचनात्मक (क्रिएटिव) व्यवसाय चुनेंगे। मतलब अगर वे चुन पाये और माँ-बाप या हालत उनके लिए नहीं चुनें। जो अपने पुरुष तत्त्व से ज़यादा जुड़े हैं, वे खतरों और चुनौतियों वाले काम ढूँढ़ते हैं।

समलैंगिकता की तरह उभयलैंगिकता भी एक वर्ग नहीं है जो समाज की कठोर विभक्ति के साथ पाया जाये जहां सिर्फ एक ही तरह के लोग हों। जैसे समलिंगिकता में व्यक्ति के अलग अलग झुकाव, और इच्छाओं के लिए जगह है, वैसे ही उभयलैंगिकता में भी है। एक तरफ पूरी तरह ‘स्ट्रेट’ लगने वाले गे हैं, तो दूसरी तरफ हिंदुस्तानी फिल्मों में व्यंग्य चित्र बने बहुत ही लड़कियों जैसे गे हैं। बैइसेक्शुअलिटी भी एक स्पेक्ट्रम है, कोई बंद कमरा नहीं। कुछ उभयलैंगिकों का विषमलैंगिकता की तरफ, तो कुछ का समलैंगिकता की तरफ झुकाव है। इस विस्तार पर एक उभयलैंगिक जहां भी हो, इसका मतलब ये नहीं कि वह अपने लैंगिकता के बारे में भ्रमित या परेशां है। या कि वह गे होना स्वीकार नहीं करना चाहता है. इसका मतलब इतना ही है कि उसका दावा – कि वो एक उभयलैंगिक है – ये सच है।

लैंगिकता या जेंडर जो भी है,आखिर में यह सबसे ज़रूरी है कि हम एक दूसरे को आदर करें, उनका स्वीकार करें और उन्हें प्रेम करें बिना किसी शर्त के। एक दूसरे के अंदर कि दिव्यता पर यक़ीन करें दूसरों से जो अपेक्षा हो, उनके साथ वाही बर्ताव करें!

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