अलविदा – एक कहानी (भाग १/२)

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अलविदा - एक कहानी। तस्वीर: बृजेश सुकुमारन।

अलविदा – एक कहानी। तस्वीर: बृजेश सुकुमारन।

प्रस्तुत है कपिल कुमार की कहानी अलविदा का पहला भाग:

बोर्ड की परीक्षा थी। प्री-बोर्ड के बाद ही मैंने स्कूल जाना छोड़ दिया था। बैचैन दिन थे। हलके सर्द खुश्क दिन। मैं सारा दिन किताब लिए छत पर पड़ा रहता था। रमणा जब तब अपनी छत से देख जाती थी, अम्मा खाना दे जाती थी, पापा घुड़किया दे जाते थे, नींद झपकियाँ दे जाती थी। घरवाले कहते थे कभी तो जा अटेंडेंस शार्ट हो जाएगी।

आखिर एक सुबह में सायकिल लेकर चला ही गया, आज अम्मा सुबह से बहुत खुश थी, आलू के पराठे बनाये थे। स्कूल के मोड़ से ही धड़कन बढ़ने लगी थी। मैं लेट नहीं था,लाइन लगना शुरू ही हुआ था। पर मेरी क्लास की लाइन नहीं थी, कही भी नहीं, मैं ढूँढता रहा।

लीला मेम अपना पतला-सा मुँह पूरा खोलते हुए बोली थी, “कहाँ थे तुम? पिछले हफ्ते तुम्हारी आख़री क्लास थी।”

मुझे पता भी नहीं चला मेरा स्कूल कब ख़त्म हो गया। किसी दिन आख़री घंटी बजी होगी, वो एक साथ मिलकर चिल्लाये होंगे , उन क्लासों के बीच से गुजरे होंगे, किसी योद्धा की तरह जिसने सब कुछ फतह कर लिया हो और अब कुछ बचा ना हो। उन पुराने टीचर्स से मिले होंगे जिन्हे वे थोड़ा-थोड़ा भूल चुके थे और अब जिन्हें वे हमेशा के लिए भूल जाने वाले थे। पर मुझे पता ही नहीं चला; ये सब कब हुआ? हुआ भी या नहीं…।

मैं तेज़ कदमो के साथ लौट रहा था। अपने पतले-से मुँह पर मोटा-सा चश्मा सँभालते हुए लीला मेम ने कहा था “आना अगले हफ्ते ,फेयरवेल पर।”

मुझे कभी अलविदा कहना नहीं आया। मैंने पलट कर भी नहीं देखा।

स्कूल के आख़री कुछ महीने बचे थे  प्री-बोर्ड एग्जाम होने को थे। रमणा और वरुण मुझसे दूर रहने लगे थे, या मैं ही था जो हर किसी से कटा-कटा रहने लगा था। वे दोनों बहुत अजीब हो गए थे।

रमणा अब सजी-सजी रहती थी, ज्यादा ही हँसती थी। पर मुझे तिरछी निगाहों से देखती थी। इतने सालों से उस पर मेरा ही हक़ था, पर अब नहीं। पिछले हफ्ते ही उसने अपना पहला लव लेटर लिखा, जिसका जवाब मुझसे अब तक देते नहीं बना, न मैं कभी दे पाया। और वरुण .. वरुण और मैं अब बात नहीं करते। एक दूसरे की तरफ देखते भी नहीं।

प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन था। मैं वहाँ ऊँघ रहा था। और कोई वक़्त होता तो मैं उन दोनो के साथ किसी ख़ाली क्लास में गप्पे लड़ा रहा होता। पर तभी मुझे महसूस हुई उन दोनों की मौजूदगी… मुझे पसीना आने लगा। बेबात की घबराहट थी। मैं बाहर निकल आया। मैं दौड़ने लगा उन खाली कमरो के बीच से। धक से दरवाज़ा खोला, वे सकपका गए। वे कहकहे लगा रहे थे, अब वे चुप थे, पर रमणा के होठों पर हलकी-सी हँसी अब भी बची थी। लगता था वह मेरे लिए या वो मुझ पर ही हँस रही थी। वो कहकहे मुझ पर ही थे।

“तड़ाक !!!”

वरुण वहीं खड़ा रहा, न उसने पहले कुछ कहा, न बाद में। रमणा के गाल लाल हो गए थे, सूज से गए थे, बाल बिखर गए थे। आँखे भर आईं थी पर वो रोई नहीं थीं। सब कुछ हवा हो गया। इतने दिनों मेरा गुस्सा, मेरी जलन सब का कोई मतलब नहीं रहा। मैं पागलो की तरह वहीं जड़ सा रहा।

“क्या हुआ ? किसने मारा?” टीचर बार-बार उससे पूछ रही थी।

वह चुप थी। वह मेरी ओर नहीं दूसरी और देख रही थी, उसकी आँखे भर आईं थीं।

बड़े दिन बाद मैं घर लौटा था।

मोहल्ले के लड़के उसकी छत पर शामियाना लगा रहे थे। मैं भी वहीं था, अच्छे पडोसी की तरह मदद करने के लिए, पर मैं बस ऊँघ रहा था।

क्या उसे वह दोपहर याद होगी? फिर वही बात मेरे दिमाग़ से गुज़री। बिलकुल उसे याद होगा। हर एक पल याद होगा … पर क्या उन पलों को वह अभी याद कर रही होगी ? उस रोज इसी छत की कोठारी में मुझसे वो लिपटी पड़ी थी। वह हमेशा से मेरे पास थी; पर उतने पास वह न कभी थी, न फिर कभी हो पायी।

लोग शामियाना लगाते रहे, दरिया बिछाते रहे, भागते रहे, दौड़ते रहे और मैं बस ऊँघता रहा।

बारात आई; बारात जैसी बारात थी; वही बाजा, वही गाना, वही भीड़, कुछ अलग नहीं था, रत्ती भर भी नहीं।

वहीं रस्में,वही रिवाज़। थक गया था; झपकियाँ आ रही थी। उस पंडाल में मैं उसके आने का इंतज़ार कर रहा था। मैं देखना चाहता था उसे किसी और के लिए सजा हुआ। पर आँखे कब बंद हुई पता ही नहीं चला।

अब जब होश आया तो मैं उस सर्दी की ओस में भीग चूका था। आधी खुली और आधी बंद आँखों से मैंने उसके आख़री फेरे देखे। जिसे कभी मैंने अपना माना नहीं, फिर भी जो मेरी ही थी, अब तक। आँखे गीली हो रही थी – शायद ओस ही थी। आँखे टकराई थी और उसके होठों पर वैसी ही हँसी थी, या वह मेरा सपना था। सब कुछ रुक रहा था, पर इस शहनाई का स्वर नहीं। मेरी जिंदगी का एक दौर खत्म हुआ। शायद यही वह पल है जिससे पहले मैं कुछ और था, और उस पल के बाद कुछ और – या शायद कुछ भी नहीं!

दिन उगने लगा। बारात जाने की तैयारी कर रही थी। लोग सब कुछ समेट रहे थे, चाय दे रहे थे, कम्बल ला रहे थे, भाग रहे थे दौड़ रहे थे, मैं बस ऊँघ रहा था । वही रसगुल्ले का थाल पड़ा था। रात भर बाहर पड़े-पड़े वो जम चुके थे। मैंने मुँह में डाला भर था।

“जा अंदर रसगुल्ले दे आ।”

 सहेलियों और भाभियों से घिरी वह खाना खा रही थी। थाली पकवानों से लदी पड़ी थी । वरुण की माँ ने ताना मारा “निगोड़ी, दो बात कर ले; खाना तो खिला ही देगा वह।”

“अरे चाची कहाँ खाने देगा वह, मेरा तो खाया-पिया निकाल देगा वह सांड।”

छन्न से हँस रही थी वह। उस महँगी साड़ी और उन भारी गहनो से घिरी वह अब भी झल्ली ही थी।

 “ढंग से रहियो।” रसगुल्ले रखते हुए मैंने कह भर दिया।

उसने मेरी तरफ देखा नहीं … वह दूसरी तरफ ही देखती रही। उसकी आँखे भरने लगी थी। मैं पागल-सा वही खड़ा रहा; आँसू झरने लगे।

क्या रिश्ता है रमणा और वरुण से वर्णनकर्ता का? जानिए कपिल कुमार की कहानी ‘अलविदा’ के शेष भाग में!