जेंडर के ढाँचे से जूझता मेरा बचपन

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मैं बचपन से ही बहुत ही नटखट, चुलबुला और थोड़ा अलग बच्चा था| मेरी माँ फिल्मों और गानों की बहुत शौक़ीन थी| माँ के दुपट्टे की साड़ी पहनना, नाचना-गाना, मेरे बचपन के खेल थे| कभी मेरे दादा तो कभी कोई पड़ोस की दीदी इस खेल में मेरा पूरा साथ देतीं, जो भी फिल्मों-गानों में देखता, माँ का दुपट्टा पहन कर सब नक़ल करता |

पापा मुझे एक ताकतवर, मज़बूत और निडर लड़के के रूप में बड़ा होते देखना चाहते थे और मुझे यह भी नहीं पता था कि मैं कौन हूँ? माँ कहती हैं कि एकबार पड़ोस की कुछ औरतों ने मेरा निक्कर उतार के चेक भी किया कि मैं कौन हूँ? लड़का हूँ या लड़की?

मैं मर्दानगी के नियम या परिभाषा में कहीं भी फिट नहीं होता था या शायद मुझे एक लड़का होने का अभिनय करना ही नहीं आता था|

पाँच साल की उम्र की कुछ यादें हैं – पापा हमेशा मुझसे गुस्सा रहते| पता नहीं क्यों, बस बात-बात पर डांट देते, झिड़क देते| पर अब मैं समझने लगा था कि मेरा मम्मी के कपड़े पहनना और नाचना शायद कुछ ग़लत है| दोपहर को स्कूल छुट्टी के बाद जब पापा ऑफिस होते और माँ आराम करती तो मैं दुपट्टा लेकर नाचता-गाता और गुड़िया-गुड़िया का खेल खेलता| माँ सब जानती थी पर कभी कुछ ख़ास नहीं बोलती| बस पापा के सामने यह सब नहीं करने को कहती|

करीब सात साल की उम्र होगी मेरी, एक बार माँ पड़ोस में कहीं गयी हुई थी, पापा के ऑफिस से आने में समय था| मैंने माँ के दुपट्टे की साड़ी पहनी और शायद चाबी के छल्ले का मांग-टीका बनाया| तब शायद खिड़की से सब दिखता था, पता नहीं कब पापा आये होंगे और उन्होंने दरवाजा खटखटाया| मैं समझ गया कि पापा आ गए हैं और जल्दी-जल्दी साड़ी उतारने लगा| थोड़ी देर में सब ठीक कर मैंने दरवाजा खोला |

पापा ने पूछा – ‘क्या कर रहा था? तू लड़का है या लड़की?’ उस दिन की मार जैसे मेरी आत्मा को ज़ख़्मी कर गयी| उस वक़्त तो मुझे  पता ही नहीं था मैंने समाज का कौन सा नियम तोड़ा था?

पापा मुझसे चिढ़ने लगे| मेरी कोई भी बात उन्हें गुस्सा दिलाती| उन्होंने बहुत कोशिश की मुझे मर्द बनाने की पर मैं हमेशा उनकी उम्मीदों पर पानी फेर देता| एक बार कॉलोनी में कोई हाथी लेकर आया, मैंने हाथी पहली बार देखा, पापा ने मुझे उठाया और महावत को मुझे हाथी की सवारी कराने को कहा| हाथी पर चढ़ते ही में ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा, इतना रोने लगा की मेरी दादी ने कहा की इसे उतार दो नहीं तो इसे कुछ हो जायेगा| पापा को सच में एक डरपोक और नाज़ुक बच्चा मिला था, जो उनकी मर्दानगी पर एक धब्बा जैसा था| बहुत सालों तक पापा ने इस बात का गुस्सा लोगों के सामने मेरी खिल्ली उड़ा कर निकाला|

बड़े होते हुए, मेरा टीवी पर क्या देखना, मेरी पसंद, कपड़ों के रंग, हंसने का तरीका और चलने का ढंग सब पर ताने सुन – सुनकर मेरी हालत बहुत खराब थी और लड़की-लड़की के तंज बर्दाश्त के बाहर थे | ऐसा लगता मानो खुद के शरीर से तो रिश्ता था ही नहीं और आस-पास के लोगों से भी दूर-दूर तक जुड़ाव नहीं नज़र आता था|

इस पूरी प्रक्रिया ने मेरे शरीर के प्रति मुझे असहज बना दिया था|

दस साल के होते-होते समझ आया कैसे व्यवहार करना है| पर फिर भी कभी ज़रा-सा करैक्टर से फिसला और किसी ने लड़की बोलकर हसीं उड़ा दी| लड़की सुनते ही पूरे वजूद पर ही सवाल खड़े हो जाते|पापा से इतनी मार, बेइज़त्ती और नफरत झेलने के बाद अब इतना खौफ मेरे मन में बस गया था कि उनसे सिर्फ डरने और छुपाने के अलावा और कुछ नहीं बचा था| किशोरावस्था आते ही मेरे मन में लड़कों और मर्दों के लिए डर बैठ गया था| लड़को और मर्दों के समूह में मैं सहज नहीं होता| सोचता था सारे पुरुष हिंसक होते हैं और शायद मुझे मारें भी|

मेरा रोना-हंसना और नाचना-गाना बिलकुल बंद हो गया था| इस पूरी प्रक्रिया ने मेरे शरीर के प्रति मुझे असहज बना दिया था| लड़की-लड़की के कटाक्ष ने मुझसे मेरी रूह छीन ली थी| मैं अब समाज के लिए करीब लड़के जैसा ही था| समझ गया था कि पूरी उम्र अब लड़के होने एक्टिंग करनी होगी|

आज तीस साल बाद जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है, इस लड़की-लड़के के चक्कर ने मेरे पापा और मेरा रिश्ता खा लिया| पापा ने यही कोशिश की  कि मैं किसी भी तरह बस मर्द के खांचे में ढल जाऊं| उनसे आजतक बात नहीं होती और शायद इस जन्म में होगी भी नहीं| क्योंकि उनके मन मुताबिक ‘मैं मर्द नहीं हूँ|’

आज जब पितृसत्ता की गहराईयाँ समझता हूँ तो खुद को अपराधबोध से मुक्त पाता हूँ| पहले दूसरे लड़कों को देखकर खुद में कुछ कमी का अहसास होता था| अब अपने शरीर और रूह को जोड़ने की प्रक्रिया में हूँ| खुलकर हँसता-रोता हूँ और जो अच्छा लगता है सब करता हूँ| चाहे समाज उसे औरताना कहे या मर्दाना| अब मेरे लिए तो सब इंसाना है |


यह लेख शशांक ने लिखा है|

यह लेख सबसे पहले फेमिनिज्म इन इंडिया पे प्रकाशित हुआ था और इसे यहाँ उनकी आज्ञा से पुनः प्रकाशित किया गया है

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