संपादकीय १० (३१ अक्तूबर, २०१४)

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इस अंक का विषय है 'स्वीकृति'। तस्वीर: बृजेश सुकुमारन।

इस अंक का विषय है ‘स्वीकृति’। तस्वीर: बृजेश सुकुमारन।

इस अंक का विषय है ‘स्वीकृति’।

‘एक अनुकरणीय आदर्श’ में लेते हैं २ दिन पहले हुए विश्व-प्रसिद्द ‘ऍपल’ कंपनी के सी.ई.ओ. श्री टिम कुक के बतौर समलैंगिक प्रकटीकरण का जायज़ा। किसी अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी के लीडर का “मैं समलैंगिक हूँ” यह बात खुलेआम कहना, यह भारतीय समलैंगिकों के लिए महत्त्वपूर्ण क्यों है? टिम कुक ने न सिर्फ अपने आप को स्वीकार किया, बल्कि ‘ऍपल’ में ऐसा माहौल लाया जिसमें संरचना, अभिनवता और वैविध्य को प्राधान्य मिले। शायद अपनी निजी ज़िन्दगी की गोपनीयता की बलि चढ़कर उन्होंने अनगिनत युवा समलैंगिकों के लिए एक आदर्श पेश किया, जिससे उन्हें हौसला मिले कि समलैंगिक होकर भी वे दुनिया में, अपने व्यावसायिक जीवन में कामयाबी पा सकते हैं।

पिछले हफ्ते ही ‘सत्यमेव जयते’ पर एल.जी.बी.टी. समाज के समर्थन की, और इस विषय पर चर्चा की धूम मची हुई थी। भारत में एल.जी.बी.टी. समानाधिकार इस विषय पर संवेदनशीलता के साथ जागरूकता लायी। धनञ्जय चौहान बताते हैं कार्यक्रम में शरीक होने का अनुभव, और विशेषतः बाद आई प्रतिक्रिया के बारे में। ‘समलैंगिकों का स्वीकारा: सत्यमेव जयते के द्वारा’ में।

हरवन्त कौर की कविता ‘समंदर और नदी’ में भी हम आपसी स्वीकृति का उदाहरण देखते हैं। समंदर स्वीकार करता है नदी के बदले हुए रास्तों को, कभी-कभार साथ ओढ़कर लाइ तबाही के सामान का। नदी स्वीकार करती है समुद्र के द्वारा उसके बदले गए रूपों का, समुन्दर से टकराव और आखिर अपना वजूद गँवाने का। क्या हमारे आपसी रिश्ते भी ऐसे होते हैं, कभी नदी, कभी समंदर?

‘फ़रिश्ते कगार पर’ – एक तस्वीरी मज़मून’ में छायाचित्रकार अभिजीत अलका अनिल प्रस्तुत करते हैं दो स्त्रियों के बीच के प्यार की कहानी को। बहुत सारे लोगों को क्लोसेट में छुपकर इसलिए रहना पड़ता है कि उन्हें डर होता है लोग उन्हें मानसिक तौर पर बीमार न करार करें। समाज का समलैंगिक पर स्ट्रेट (विषमलैंगिक) होने और अपने रहन-सहन द्वारा अपने आप को यूँ प्रस्तुत करने का दबाव बना रहता है। फिर भी वे अपने प्रेम को साकार करते हैं और इस आशा को धरकर जीते हैं, के एक नया सूर्योदय आए और रात को, अदृश्यता को मिटा दे।

‘मेरी कहानी मेरी ज़बानी’ में इस बार मिलिए कराची, पाकिस्तान में पले-बड़े पारसी समलैंगिक नाट्य-कलाकार, ज़वारे टेंगरा से। ७ भागों के इस आत्मकथन की पहली कड़ी में ज़वारे अपने बचपन के बारे में बताते हैं, उस लम्हे तक जब उन्होंने पहली बार बड़े परदे पर परवीन बाबी को देखा, और उनपर जादू-सा चढ़ गया। १९७०, ८० और ९० के दशकों में कराची में गे होना कैसा था? वहां का समुदाय, उनके अनुभव कैसे थे? पढ़िए अगले ६ भागों में।

साथ ही पढ़ें हादी हुसैन की श्रृंखलाबद्ध कहानी ‘ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कथा’ की पाँचवी और आखरी किश्त।

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आपका विनम्र,
सचिन जैन
संपादक, गेलेक्सी हिंदी
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