काव्यात्मक प्रतिवाद

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समानता का प्रस्ताव ३७७ में बदलाव.

समानता का प्रस्ताव ३७७ में बदलाव (तस्वीर: बृजेश सुकुमारन)

 

जो बात उड़ चली वह फिरसे दफ़न नहीं होती

 

रविवार, १५ दिसंबर २०१३ को भारत और विश्व के विभिन्न शहरों में “जागतिक कोप दिवस” (“ग्लोबल डे ऑफ़ रेज”) मनाया गया। ११ दिसंबर २०१३ को आए उच्चतम न्यायलय के समलैंगिकता के पुनरपराधिकरण के निर्णय के ख़िलाफ़, धारा ३७७ को २००९ में हटाये जाने के बाद पुनः लागू करने के विरोध में ऐसा ही एक मंच दिल्ली के जंतर मंतर में आयोजित किया गया। उस कार्यक्रम के दौरान उपस्थित समुदाय के उद्रेक की भावना को कटाक्षपूर्ण और हास्यकर शैली में व्यक्त करते हुए कवी श्री अखिल कत्याल ने अपनी कुछ पंक्तियाँ पढ़ीं। आप वीडियो में देख ही सकते हैं के जंतर मंतर का माहौल कितना उत्साहपूर्ण और जोशीला था। ये कविताएँ इस बात कि अलामत हैं के साहित्य, हँसी और व्यंग्य, विद्रोह और प्रतिवाद का साधन कैसे बन सकते हैं।

पेश हैं उन कविताओं में से ४ कविताएं, और कवि के उनके बारे में कुछ विचार।

१) “हार्लेम” – लैंग्स्टन ह्यूज़ की अंग्रेजी कविता का हिंदी अनुवाद

एक अधूरे सपने का क्या होता है?
क्या वह सूख जाता है धुप में किशमिश की तरह
या किसी खुले घाव की तरह पस से भरा पकता है?
क्या वह सड़े हुए माँस सा बदबदाता है?
या पपड़ी बन जाता है पुरानी चाशनी की तरह
शायद, चुपचाप, किसी भारी बोझ की तरह
वह सिर्फ लटकता है, या बम सा फटता है?

अखिल: पहली बार यह कविता जब मैंने मास्टर्स में पढ़ी थी, तो चिंगारी की तरह लगी। दिमाग में कहीं गहरी छाप छोड़ गयी. इससे ज़यादा उपयुक्त कविता इस अवसर के लिए कोई और हो ही नहीं सकती थी। यह संघर्ष करते रहने कि सलाह देने , कभी न हार मानने और सदा प्रेरित रहने की कविता है। लैंग्स्टन ह्यूज़ की ‘हार्लेम’ का यह सरल और दृढ़ भाव दिल्ली के जंतर मंतर में रोज दुहराया जाता है – कभी नारीवादी नारों में, कभी जातीय भेदभाव के खिलाफ, कभी एल,जी.बी.टी.आई. लोगों के अधिकारों के लिए. इस कविता का अनुवाद उस अवसर के सन्दर्भ में अनिवार्य था!

२) “दुनिया में बहुत हैं हया समझानेवाले”

दुनिया में बहुत हैं हया समझानेवाले
जान लें कि हम बेहया यहाँ और भी हैं।
जो ढकेले हैं हमें तमीज की और
जान लें कि हम बदतमीज़ यहाँ और भी हैं।

मेरी लल्ला, ज़रा आकर समझाओ इनको
जो दुहाई देते हैं सबकुछ ढांप रखने की
जो बेढंगे कहते हैं हमें, अपना वाक् सुनाओ उनको,
कि तुम जैसे नंगे, यहाँ और भी हैं।

अखिल: मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय  में दो साल साहित्य पढ़ाया है। पिछले कुछ सालों में एक तानाशाही वाईस चांसलर के चलते, विश्विद्यालय का माहौल बद से बदतर होता जा रहा था। कुछ लड़कियों को कॉलेज में क्या पहनना चाहिए, ये बताया जा रहा था, तो कहीं लड़कियों को अपने कॉलेज-हॉस्टल में शाम के किस पहर बंदी बन जाना चाहिए, इस पर चर्चा हो रही थी। उसी सन्दर्भ में यह कविता लिखी गयी। हया समझाने वाले अनेक रूप में आते हैं – कहीं आशाराम बापू बन कर, कहीं बाबा रामदेव बनकर, तो कहीं पितृसत्ता का सर्वोच्च माध्यम – परिवार – बनकर। इन सबसे बचना है, हम सबको उनसे ही बचाना है। कविता का सार यही है। नारीवाद और लैंगिकता अल्पसंख्यक लोगों के हकों की लड़ाई एक ही है। इनको कभी अलग नहीं किया जा सकता – बदतमीज़ हम दोनों ही हैं।

३) “मुझे बस…”

मुझे बस एक लोहे का टुकड़ा बना दे रब,
मैं उसकी बेल्ट का बकल बन जाऊँ
मुझे उसके कमरे का आइना बना दे रब
मैं रोज़ उसकी ही शकल बन जाऊँ

मुझे रुकने का इरादा बना दे ए ख़ुदा
जो मैं आऊं तो वह खुदा-हाफ़िज़ कह ना सके,
मुझे घुटनों की नर्मी बना दे ए खुदा
मैं गुदगुदाऊँ तो वह खुद में रह न सके।

मुझे मेरे यार का मोबाइल फ़ोन बना दे रब
मैं उसकी पैंट की जेब में बैठा गाता रहूँ
जो डाले कभी वह अपनी शर्ट की जेब में
मैं उसके दिल के क़रीब यूँ आता रहूँ।

अखिल:  जितनी परेशानी न्यायालयों में बैठे न्यायाधीशों को यौनिक सम्बंधों से है, उतनी ही परेशानी उनको प्यार से भी है. प्यार जो उनकी विषमलैंगिक, धार्मिक  और जातीय परिभाषाओं से परे है, जो पितृसत्ता के दायरे में नहीं आता. यह कविता मैंने कभी किसी के लिए लिखी थी – वो जानता है वो कौन है – और उस दिन इसको पढ़ने का निश्चय करना मेरे लिए बहुत आसान था. यह लड़ाई लम्बी है, कठिन है, अतः इसे हास्य के माध्यम से भी लड़ना पड़ेगा. हसी भी सामाजिक बदलाव लाने के लिए आखिर हमारा पास एक पैना हथियार है!

४) “उम्मीद का क्या है”

उम्मीद कभी कम नहीं होती
ज़रा से धक्के से लड़ाई खत्म नहीं होती।
सुना लें सुनानेवालें अपने न्यायालयों में आदेश
जो बात उड़ चली वह फिरसे दफ़न नहीं होती।

अखिल:  जिस दिन उच्चतम न्यायालय ने अपना आदेश सुनाया, उस सुबह नॉर्थ दिल्ली मैं एक दोस्त के घर में हम सब एकत्रित हुए थे। न्यूज़ चैनल से चिपके हुए थे। जब वह न्यूज़ आयी, तो थोड़ी देर एक दुसरे के चेहरे ताकते रहे। समझने की कोशिश मैं कि हाँ ये भी होना मुमकिन था। फिर एक दुसरे को आश्वासन दिया, चाय पी और मैं चल दिया उच्चतम न्यायालय की ओर. आई.टी.ओ. में ट्रैफिक जैम में फँसे  हुए ऑटो में बैठे हुए मैं मन ही मन ये चार पंक्तियाँ गा रहा था। इनसे अपने आप को हिम्मत दे रहा था। यही हिम्मत सबके साथ बाटने के लिए यह कविता उस दिन मंच पर पढ़ी।

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Sachin Jain

सचिन 'गेलेक्सी' के भूतपूर्व हिन्दी संपादक हैं।
Sachin is the former Hindi-language editor of Gaylaxy Magazine.
Sachin Jain