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कहानी की पहली कड़ी यहाँ पढ़ें।

सोचती थी कि भगवान ने उसका मन ऐसा क्यों बनाया जो लड़की होकर भी एक लड़की को चाहने का मन करता है। क्यों ऐसी भावनायें उसके अन्दर भर दीं जिससे उसका मन प्रकृति के खिलाफ हो उठा। सवाल पर सवाल और दुखी मन। मन की मरती इच्छा और समाज का बनाया बन्धन। समझ नहीं आता था कि क्या करें और क्या न करे? सबकी सुने या मन की करे।

लेकिन मन की भी करे तो कौन ऐसी लड़की होगी जो उसे लड़की होते अपने जीवन साथी के रूप जीवन-भर के लिए अपना लेगी? और ऐसी लड़की मिल भी गई तो क्या समाज और घर के लोग उसे ऐसा करने देंगे? चलो वह अपनी मर्जी से ऐसा कर भी लेगी तो क्या ऐसी कोई लड़की और भी जो उसकी तरह होगी? जो ऐसा ही महसूस करती हो। जिसका मन भी उसी तरह से सोचता जैसे मेरा सोचता है।

लेकिन यह सब सोच बेकार थी, क्योंकि मनीषा ने स्कूल से लेकर कॉलेज और आज तक किसी ऐसी लड़की को अपने आसपास नहीं पाया था जो उसकी तरह हो। हाँ ऐसे हजारों लड़के देखे थे जो उसपर अपनी जान तक न्यौछावर करने को तैयार थे। लेकिन मनीषा को उनसे कोई सरोकार न था। लड़कों के साथ जीवन बिताना उसे घिन भरा लगता था।

माँ से उस दिन के बाद मनीषा की कभी ठीक से बात नहीं हुई थी। हालांकि माँ को अपने आप पर उस थप्पड मारने का अफसोस था जो उसने मनीषा को मारा। दिन गुजरे और वह दिन भी आ गया जिस दिन मनीषा की शादी होनी थी। मनीषा न चाहते हुए भी इस ग़ैर-ज़रूरी बन्धन में बंध गई। उसका पति सुन्दर था लेकिन उसके लिए किसी काम का नहीं था।

शादी हो मनीषा अपने ससुराल आ गई। लेकिन यह सब उसे किसी अजीब और मनहूस जगह से कम नहीं लग रही थी। महिलाएं आ-आ कर उसे देखकर वाह-वाह कर रही थीं, उसकी सुन्दरता की तारीफें कर रहीं थीं। महिलाओं की तारीफें उसे खुश तो कर देतीं थीं लेकिन जब ध्यान आता कि उसकी शादी एक मर्द से हुई है तो मन मुरझा जाता था।

शाम होते-होते सारा कुछ शांत हो गया। ससुराल के लोगों ने मनीषा को खाना दिया था लेकिन उसने उस खाने को हाथ तक न लगाया। सब लोग सोचते थे कि आज नयी जगह आ बहू को भूख न लगती होगी, इसलिए वह खाना नहीं खा रही है। लेकिन कोई नहीं जानता था कि दो दिन से भूखी मनीषा खाना क्यों नहीं खा रही है।

रात हुई तो मनीषा का पति उसके पास आ पहुँचा। अब तो मनीषा उसकी बीवी थी, उस पर उसका अधिकार था। आखिर वह उसे व्याह कर लाया था। उसके आते ही मनीषा का दिल धड़क उठा। उसे पता था कि अब वह मनीषा के साथ क्या करेगा? मनीषा के पति का नाम श्याम था। वह दिखने में मनीषा की तरह ही ख़ूबसूरत था। चेहरा देखकर मनीषा को लगा कि वह स्वभाव का नरम होगा।

श्याम ने मुसकुराकर मनीषा को देखा, मनीषा सिटपिटाई-सी मुसकुरा दी। श्याम मनीषा के पास आकर बैठ गया और उसका हाथ अपने हाथ में ले चूम लिया। मनीषा ने आँखें बन्द कर अपना मुँह दूसरी तरफ मोड़ लिया। उससे यह सब सहन ही नहीं हो रहा था। श्याम मनीषा के हाथ से आगे बढ़ा तो मनीषा अपना हाथ छुड़ाकर दूर खिसक गई।

श्याम ने आश्चर्य से उसे देखा, मनीषा सहमी-सी बैठी थी। फिर श्याम ने सोचा कि शायद पहली बार मिलने की वजह से मनीषा यह सब कर रही है। रात आगे बढ़ रही थी। श्याम बेड पर लेटता हुआ मनीषा से बोला, ‘‘लेट जाओ मनीषा।” मनीषा श्याम के पास लेटने में शरमा रही थी लेकिन कोई अन्य चारा न देख बेड के एक तरफ लेट गई।

धीरे-धीरे श्याम मनीषा की तरफ खिसका और उसे अपनी बाँहों में भर लिया। लेकिन मनीषा एकदम खुद को श्याम से छुडाकर उठकर दूर बैठ गई। श्याम का दिमाग झन्ना गया। उसे मनीषा का यह अजीब व्यवहार और उसकी आँखों में झलकता डर तरह-तरह की शंकायें पैदा करता था। उसने हारकर पूछ ही लिया, ‘‘मनीषा क्या बात है? तुम इस तरह से व्यवहार क्यों कर रही हो? कोई बात है तो मुझे बताओ।”

मनीषा सामने बैठे हैरान श्याम को क्या बताती? कैसे कहती कि उसे वह छूए तो बुरा लगता है? लेकिन न बताए तो श्याम फिर से उसके साथ ऐसा ही करने की कोशिश करेगा और मनीषा के फिर से इस तरह के व्यवहार के बाद यही सवाल पूछेगा। तब क्या होगा?

मनीषा ने थोड़ी हिम्मत की और बोली, ‘‘मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता।” श्याम मनीषा की बचकानी बात पर हँस पडा और बोला, ‘‘क्या मनीषा तुम भी बच्चों जैसी बातें करती हो? तुम मेरी बीवी हो और यह सब हम लोग कर सकते हैं। क्या बुरा लगता है तुम्हें इस सब में?

मनीषा जब भी किसी से अपने मन की बात कहती थी तो वह या तो हँसता था या उससे नाराज हो जाता था। मनीषा को अब इन सब बातों से चिढ़ हो गई थी। जब श्याम उसकी बात सुनकर हँसा तो उसमें झुंझलाहट पैदा हो गई, बोली, ‘‘मैं सच कह रही हूँ, मुझे कोई लड़का इस तरह छूता है तो मुझे बुरा लगता है, घिन आती है। लेकिन कोई लड़की मुझसे ऐसे करती है तो अच्छा लगता है।”

मनीषा की बात सुन श्याम के चेहरे से हँसी गायब हो गई। वह हैरत से मुँह फाड़कर मनीषा को देखता रह गया। मनीषा कोई बच्ची नहीं थी जिसकी बात श्याम को झूठी या मज़ाक लगती। ऊपर से उसकी गंभीरता भी श्याम को किसी और बात का संकेत दे रही थी। श्याम ने अपने में सोचा कि हो न हो मनीषा दिमागी तौर पर ठीक नहीं है। अगर ठीक होती तो इस तरह की अजीब-अजीब बातें नहीं करती।

उसने अगले ही दिन किसी अच्छे मनोरोग विशेषज्ञ के पास मनीषा को ले जाने का मन बना लिया था लेकिन आज रात क्या करें? श्याम ने मनीषा को देख प्यार से पूछा, ‘‘मनीषा मैं यहाँ सो तो सकता हूँ न? या तुम्हें बुरा लगे तो बता दो।” मनीषा ने सिर्फ कमरे में इधर-उधर देखा, मानो श्याम को बेड से अलग सोने का इशारा दे रही हो।

कथा की अगली किश्त पढ़ें भाग ३ में

Dharmendra Rajmangal

धर्मेन्द्र कहानियां लिखते हैं। अब तक उनकी १७० कहानियां और एक उपन्यास 'मंगल बाज़ार' प्रकाशित हुए हैं। कक्षा ६ से उन्होंने लिखने की शुरुआत की और आज तक लिखते आ रहे हैं। वे अलीगढ़ शहर में रहते हैं।