wp

जब से मनीषा की शादी तय हुई तभी से उसकी बेचैनी सातवें आसमान पर थी। उसने सपने में भी शादी के बारे में नहीं सोचा था। वो तो शादी करना ही नहीं चाहती थी। उसने सीधे अपनी माँ से जाकर बात करने का मन बनाया। शर्म तो आती थी लेकिन शर्म करते रहने से उसकी जिंदगी खतरे में पड़ जानी थी।

मनीषा अपनी माँ के पास जाकर बैठ गयी और धीमे से बोली, ‘‘माँ मुझे ये शादी नहीं करनी, तुम पापा से मना कर दो।” उसकी माँ ने आँखें तरेर कर उसको देखा और बोली, ‘‘तो क्या घर में कँवारी बैठी रहेगी? कितनी बार मना करती रहूँगी उनसे तेरी शादी के लिये? तेरे साथ की एक भी लड़की ऐसी नहीं जिसकी शादी न हुई हो। एक तू ही अब तक घर में कँवारी बैठी है।”

 मनीषा की शादी पहले भी दो बार टाली जा चुकी थी। वो भी मनीषा के कहने पर ही। मनीषा करीबन पच्चीस साल की हो चुकी थी। जो यहाँ की लड़कियों के लिये शादी होकर बच्चे होने की उम्र होती थी। मनीषा माँ की बात सुन थोड़ी झुंझलायी और बोली, ‘‘माँ तुम हर बार दूसरी लड़कियों से मेरी तुलना क्यों करती रहती हो? बस तुम मना कर दो पापा से और मुझे कुछ नहीं पता।”

 मनीषा की माँ विफर पड़ी, बोली, ‘‘तो क्यों शादी नहीं करनी तुझे? कोई तो कारण होगा जिसकी वजह से तू शादी नहीं करना चाहती। अगर तेरे पापा ने पूछा  कि तू क्यों शादी नहीं  करना चाहती तो मैं क्या कहूँगी? ऐसा तो नहीं  तेरे मन में कोई और लड़का हो? अगर है तो अभी बता दे।”

 मनीषा अपनी झुंझलाहट को दबाते हुए बोली, ‘‘माँ ऐसा कुछ भी नहीं है, मैं किसी भी लड़के को नहीं  चाहती और न ही कभी चाहूँगी। आप कुछ भी कह दो पापा से लेकिन मैं ये शादी नहीं करना चाहती।” मनीषा की माँ का फिर से वही सवाल था, ‘‘लेकिन क्यों? तू…।”

 इतना सुनने से पहले ही मनीषा माँ के पास से पैर पटकती हुई अपने कमरे में जा चुकी थी। माँ हैरत से उसे जाते हुए देखती रह गयी। उसे समझ न आता था कि जब ये लड़की किसी लड़के को चाहती नहीं तो फिर शादी करने को तैयार क्यों नहीं होती? आखिर जब कोई बात ही नहीं तो ये लड़की शादी से इतना भागती क्यों है?

 मनीषा अपने कमरे में जा बैड पर ओंधे मुँह लेट गयी। उसे समझ न आता था कि अपने मन की बात वो अपने माँ बाप को कैसे बताये? कैसे कहे कि उसे किसी भी लड़के से शादी नहीं करनी। उसे लड़के अच्छे ही नहीं लगते। फिर शादी क्यों कर ले उनसे? उसे तो सिर्फ लड़कियाँ अच्छी लगतीं हैं, और वो शादी भी उन्हीं से करना चाहती है।

 मनीषा कुछ और सोचती उससे पहले ही उसकी माँ कमरे में आ पहुँची। उन्होंने औंधी पड़ी अपनी मासूम बेटी के सिर पर हाथ फेरा और प्यार से बोलीं, ‘‘मनीषा, बेटा कुछ बता तो सही। अगर बतायेगी नहीं तो हम समझेंगे कैसे? अगर किसी और लड़के से तू शादी करना चाहती है तो बता दे। मैं तेरे पापा को इस बात पर मना लूंगी।”

 मनीषा को इस बार इतनी झुंझलाहट आयी कि वो उस बात को अपनी माँ से बोल बैठी जो सालों से छुपाये बैठी थी, ‘‘माँ मेरा मन लड़कों से शादी करने का नहीं करता है, मैं तो किसी लड़की से शादी करना चाहती हूँ।” मनीषा ने ये बात अपना पूरा साहस बटोरकर कही थी, जबकि उसकी बात सुन माँ को जोरदार हँसी आ गयी।

 वो हँसते हुए बोली, ‘‘छोरी मुझसे ही मसखरी करने को मिली है तुझे। हम तुझे अपना लड़का समझ प्यार करते हैं और तू अपने आप को लड़का ही समझ बैठी।” माँ जिस बात को मसखरी समझ रही थी उसे कहने में मनीषा को अपने आप से कितना संघर्ष करना पड़ा था। कितनी शर्मोहया का त्याग करना पड़ा  था।

 मनीषा माँ को हँसते देख दृढ़ निश्चयी स्वर में बोल पड़ी, ‘‘माँ मैं एकदम सच कह रही हूँ, मेरा मन ऐसा ही करने को कहता है। मैं तुम्हारी क़सम खाकर कहती हूँ माँ, मैं एकदम सच बोल रही हूँ। भला मैं ऐसी बात पर तुमसे मजाक क्यों करूँगी?”

 मनीषा की दृढ निश्चयी बात और क़सम ने सामने बैठी माँ को अन्दर तक झकझोर दिया। उसकी समझ ये न आया कि ये किस तरह का पागलपन उनकी लड़की का? हैरत से आँखें फाड़ बोली, ‘‘तू पागल तो नहीं हो गयी लड़की, अरे पता भी है तू क्या कह रही है? भला कोई लड़की किसी लड़की से शादी कैसे कर सकती है? अपना दिमाग ठीक कर चुप हो शादी कर ले, मैं इससे ज्यादा कुछ भी नहीं सुनना चाहती।”

 मनीषा रूहांसी हुई बोल पड़ी, ‘‘माँ मैं ऐसा नहीं कर सकती, मेरा मन ही…।” मनीषा अपनी बात पूरी करती उससे पहले ही माँ ने उसके गाल पर एक जोरदार चांटा जड दिया। मनीषा इस अचानक हुई प्रतिक्रिया से एकदम सहम गयी। ये पहली दफा था जब उसके होश संभालने के बाद माँ ने उसके ऊपर हाथ उठाया था।

 मनीषा ने अपने गाल पर हाथ रख भीगी आँखों से माँ की तरफ देखा। माँ की आँखों में आग के शोले थे। वो थोड़ी देर तो इसी तरह मनीषा को देखती रही लेकिन फिर एकदम उसके कमरे से निकल कर बाहर चली गयी। माँ के जाने के बाद मनीषा फफक फफक कर रोयी। वो अपनी जिंदगी को काँटों पर पड़ा पा रही थी। उसे भगवान से भी सैंकड़ों शिकायतें थीं।

 कहानी की दूसरी किश्त यहाँ पढ़ें

Dharmendra Rajmangal

धर्मेन्द्र कहानियां लिखते हैं। अब तक उनकी १७० कहानियां और एक उपन्यास 'मंगल बाज़ार' प्रकाशित हुए हैं। कक्षा ६ से उन्होंने लिखने की शुरुआत की और आज तक लिखते आ रहे हैं। वे अलीगढ़ शहर में रहते हैं।