शृंखलाबद्ध कहानी ‘आदित्य’ भाग ३

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“आदित्य और मैं, मैं और आदित्य”; तस्वीर: बृजेश सुकुमारन

“आदित्य और मैं, मैं और आदित्य”; तस्वीर: बृजेश सुकुमारन

मैं आदित्य से अभिन्न हूं। हम दो शरीर एक जान हैं।

पढ़िए कहानी की पहली  और दूसरी कड़ी। पेश है तीसरी कड़ी:

जबतक हम सभी खाना खा रहे थे उसने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा, हाँ वह पापा मम्मी और विजय की तरफ कभी-कभी जरुर देख रहा था। खाना खा कर वह बिल्कुल भी हमारे घर पर नहीं रुका और अपने घर चला गया। अगले दिन आदित्य के मम्मी पापा भी गाँव से आ गये। उस घटना के घटने के बाद तीन महीने तक आदित्य और मेरे बीच कभी कोई बात नहीं हुई। और न तो वह मेरे घर पर ही आता था। कभी कभार अगर राह चलते मैं उसके सामने आ भी जाता था तो वो हमेशा अपनी नजरों को झुका लेता था। मुझे लगता था जैसे वह मेरे सामने अपने आप को लज्जित महसूस करता था। उन्हीं दिनों अखबार में समलैंगिता के विषय पर एक विस्तृत लेख प्रकाशित हुआ, उस लेख को पढ कर मुझे मेरी गलती का अहसास हुआ क्योंकि भावनाओं का उफान दिलों में पैदा होता है, उसे कोई जानबूझ कर बनाता नहीं है। उस लेख को पढने के बाद मुझे आदित्य से सहानुभूति हुई क्योंकि अब मुझे यह जानकारी थी कि वह प्राकृतिक तौर पर स्वभाव से वैसा था, जानबूझ कर नहीं। अब मुझे उसकी उस आदत का भी कुछ कुछ आभास होने लगा था,जो वह मुझे मेरे पास बैठ कर लगातार देखा करता था। मैं अपने विचारों द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वह अपने स्वभाव के कारण मेरी तरफ आकर्षण महसूस करता था ( अब यह आकर्षण शारीरिक था या कुछ और यह तो वही जानता था।

एक दिन सवेरे सवेरे मैं अपनी छत पर खडा सूर्य दर्शन कर रहा था कि तभी सामने की छत पर खडे हुए मुझे आदित्य दिखाई दिया, शायद वह मुझे ही देख रहा था, मेरी उस पर नजर पडते ही उसने अपने चेहरे को दूसरी तरफ मोड लिया जैसे वह मुझे देखना ही न चाहता हो, उसकी इस हरकत पर मुझे काफी हँसी आई और मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट के भाव छा गये। मैं वही कुर्सी लाकर छत पर ही आदित्य की तरफ मुँह करके बैठ गया। कुछ देर बाद यह सोचते हुए कि शायद मै अब नीचे चला गया हूँ, फिर से मेरी तरफ देखा और जैसे ही इस बार उसने मेरी तरफ देखा मैंने उसको देखकर बनावटी हँसी या मुस्कुराहट दिखाई और हाथ से इशारा किया अपनी छत पर आने के लिए, पहले तो वो मेरे इस इशारे से उसके हाव-भाव देखकर ऐसा लगा कि वह कन्फूज हो गया है लेकिन बाद में मैंने उसे आवाज लगाकर कहा “आदित्य यहाँ आओ” वह बिना कुछ कहे नीचे चला गया। मैं सोचता और इन्तजार करता रहा कि शायद वह अब आयेगा लेकिन वह नहीं आया। काफि समय बीतने पर मैं भी दिनचर्या के कामों मे लग गया। दोपहर के समय जब मैं सोने की कोशिश कर रहा था तभी मुझे आदित्य की आवाज आई। विजय, भईया कहाँ है? उसने कहा अपने कमरे में होंगे। कुछ देर विजय के पास बैठकर वह मेरे कमरे में आया। मुझे जैसे ही यह अहसास हुआ कि आदित्य आ रहा है, मैंने सोने का नाटक किया। मुझे सोता हुआ देखकर वह वापस जाने लगा, उसे वापस जाता देख कर मैंने उसे आवाज दी “ आदित्य कोई काम है क्या? उसने नहीं में सिर हिलाया। मैंने फिर कहा एक तो घर पर आना बन्द कर दिया है, नाराज हो, क्या हमसे? यहाँ आये भी, तो बिना मिले ही चले जा रहे थे। यह बात मैंने उसकी आँखों में देखते हुए गंभीरता के साथ कही। उस समय

मैं आदित्य के चेहरे के भावों को देख रहा था, उसके चेहरे पर संतोष के भाव थे और शायद मेरी कही उन बातों के कारण उसकी आँखों में चमक बढ गई थी, जैसे वे आँखें हँसना चाह रही हों। इन सब भावों के तुरन्त बाद उसके शब्द मेरे कानों में गये, वह शब्द करुणा व रुदन का गंभीर भाव लिए हुए थे। उसने कहा मुझे आपसे कुछ कहना है लेकिन मैं शायद ही कह पाऊँ, इसलिए इस लैटर को आप पढ लेना, मैंने वह सब बातें लिख दी हैं जो कहना चाह रहा हूँ। इतना कहकर वह अपने साथ लाया 2 पेज का एक लैटर, जिसे उसने लिखा था मुझे देकर चला गया। मैंने पत्र के पहले पेज पर नजर डाली, जो कुछ लिखा गया था वह इस तरह था।

मिस्टर जय,
आपको क्या कह कर पुकारुं नहीं जानता, बस इतना जरुर जानता हूँ कि रिश्ते शब्दों से नहीं दिल से जुडते हैं। ऊपरी तौर पर मैं समाज के कारण भले ही सभी के सामने आपको भईया बुलाता था या हूँ लेकिन मैंने दिल से कभी भी आपको उस नजर से न तो देखा है और न ही बडा भाई माना। उस रात जो कुछ हुआ मुझे पता है उसमें सारी गलती मेरी ही है और मैं स्वयं को इस अपराध के लिए दोषी मानता हूँ। अब आपके हाथ में है कि आप मुझे क्या दण्ड या सजा देते हैं लेकिन अपनी तरफ से मैंने अपने लिए एक सजा तैयार की है और वह, यह है कि, उस रात मैंने आपकी आँखों में अपने लिए घृणा के और दुश्मनी के भाव देखे इसलिए मैंने निश्चय किया है कि मैं अब आपकी परछाई से भी दूर रहुँगा। मेरे लिए शायद यही सजा ठीक रहेगी और पिछले 3 महीनों से मैं उसी सजा का ही तो अनुसरण कर रहा हूँ। इसीलिए मैं न चाहते हुए भी यह कहने को विवश हुँ कि मुझे आपसे नफरत है। आई हेट यू। मैं सदा ही आपको प्यार की दृष्टि से ही देखा है। मैं खुद नहीं जानता कि कब आप आँखों के जरिये दिल में उतर गये। मुझे पता है समाज में इस तरह की बातें सोचना वह भी एक ही तरह के लोगों के लिए पाप है। पर मैं क्या करूँ मुझे भगवान ने ही ऐसा बनाया है, मैंने स्वयं को बहुत बदलने की कोशिश की लेकिन शायद मैं स्वयं को नहीं बदल सकता। मैं यह भी नहीं चाहता कि मेरी वजह से आपको कोई तकलीफ हो या आप को कुछ भी बुरा लगे क्योंकि मैं आपको दुखी नहीं देख सकता। मुझे आपकी नफरत स्वीकार है, लेकिन आपका दुखि होना नहीं। मैं कभी भी नहीं चाहुँगा कि मेरी वजह से आपको समाज में कोई बदनामी झेलनी पडे। मैंने कई बार कोशिश की आपसे अपने दिल की बात कहने की। लेकिन हर बार शर्म, संकोच से कुछ नहीं कह पाया और अब तो आप मेरे बारे में सब कुछ जानते ही हैं। आपने एक बार मुझ से पूछा था कि क्या मैंने कभी किसी को चाहा या प्यार किया है तो आज भगवान की कसम खाकर कह रहा हूँ। हाँ हमने प्यार किया है बस आपसे। उस दिन सवेरे जब आपने आई लव यू के शब्द सुने थे वह भी मैं आप से ही कह रहा था। दिल में जो कुछ आ रहा था लिख रहा हूँ, अगर अब भी कुछ शेष रह गया है तो वह आप स्वयं समझ लेना और मेरे कुकृत्य, जिसे मैंने अपने प्यार को इजहार करने का एक तरीका समझा, के लिए मुझे माफ कर देना।
शायद नाम लिखने की जरूरत नहीं है।

आदित्य का यह पत्र पढ कर मुझे दिल में कहीं पर चोट सी महसूस हुई तथा उसकी मासूमियत पर हंसी आई। मैं स्वयं एक भावना प्रधान व्यक्ति था इसीलिए मुझे यह निर्णय लेने में अधिक वक्त नहीं लगा कि प्यार तो किसी को भी, किसी से भी हो सकता है। लोग भगवान से प्रेम करते हैं, अपने कुत्ते, बिल्लियों से प्रेम करते हैं, बहुत से लोग प्रकृति और प्रकृति कि सुन्दरता से प्रेम करते हैं, तो फिर एक इंसान का दूसरे इंसान से केवल इस आधार पर प्रेम करना गुनाह क्यों है? कि वे दोनों एक जैसे हैं। जहाँ पर प्रेम होता हैं, वहाँ पर और कुछ नहीं होता, इन्हीं दिनों मैंने करीना की एक फिल्म ‘चमेली’ देखी थी उसका एक संवाद मुझे अभी तक याद है “बस प्यार होना चाहिए” मुझे एक गाने के बोल भी याद आ रहे थे – ‘न उम्र की सीमा हो, न जन्म (जिस्म) का हो बन्धन, जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन्’।

और फिर प्रेम और प्यार तो वह अनुभूति होती है जो कुछ भाग्यशाली लोगों को ही मिलती है। एक गाना भी तो है “हर किसी को नहीं मिलता यहाँ प्यार जिन्दगी में” इन्हीं सब बातों को सोचते हुए मैंने आदित्य को उसके पत्र का जवाब देने का निश्च्य किया। मेरे लिए यह एक अजीब स्थिति थी क्योंकि यहाँ पर प्रश्न यह नहीं था कि मैं उसे चाहता हूँ या नहीं, या मेरे मन में भी उसके लिए कुछ भावनायें है या नहीं। मेरे लिए यहाँ पर जो सबसे बडा प्रश्न था वह था उन भावनाओं को समझने का और उन्हें सम्मान देने का जो किसी के दिल में मेरे लिए थीं। मैं स्वयं नहीं जानता था कि इस तरह के संबन्धों का भारत जैसे देश में क्या अन्त होगा या होना चाहिये।

आदित्य के पत्र  का कैसे देंगे जय जवाब? पढ़िए कहानी की चौथी कड़ी अगले अंक में।