एक मुलाक़ात: सागर गुप्ता

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सागर गुप्ता, डायरेक्टर ऑफ़ प्रोग्रामिंग, 'कशिश' मुंबई अंतर्राष्ट्रीय क्वियर फिल्म फेस्टिवल

सागर गुप्ता, डायरेक्टर ऑफ़ प्रोग्रामिंग, ‘कशिश’ मुंबई अंतर्राष्ट्रीय क्वियर फिल्म फेस्टिवल।

सागर गुप्ता ‘दरमियान’ जैसी फिल्मों और ‘रिश्ते’, ‘गुब्बारे’, लेफ्ट राईट लेफ्ट’, जस्सी जैसी कोई नहीं’, ‘राधा की बेटियाँ’ जैसे धारावाहिकों के जाने-माने लेखक हैं। वे श्रीधर रंगायन की फिल्म ‘आ मुस्कुरा’ के संवाद लेखक, फिल्म ‘६८ पेजेस’ के गीतकार और ‘सहाय हेल्पलाइन’ के लघुफिल्मों के लेखक हैं। अपने जीवनसाथी और बिज़नेस पार्टनर श्रीधर रंगायन के साथ ‘द पिंक मिरर’, ‘योर्स इमोशनली’ और हाल ही में बनी फिल्म ‘पर्पल स्काइज़’ के सहनिर्माता रहे हैं। उन्होंने ‘बाल चित्र समिति, भारत’ के साथ काम करते हुए ‘द गोल्डन एलिफैंट’ अंतर्राष्ट्रीय बाल फिल्म महोत्सव,भारत का दो बार समायोजन किया है। वे शुरुआत से कशिश मुंबई अंतर्राष्ट्रीय क्वीयर फिल्म महोत्सव के क्यूरेटर और डायरेक्टर ऑफ़ प्रोग्रामिंग हैं। आइये मुलाक़ात करते हैं प्रतिभाशाली सागर गुप्ता से:

१) बतौर ‘कशिश’ के डायरेक्टर ऑफ़ प्रोग्रैमिंग, आपकी क्या ज़िम्मेदारियाँ रहीं?

यह साल ‘कशिश’ का पाँचवा साल था इसलिए पहले से बेहतर और कुछ नया करने की ज़िम्मेदारी तो थी ही। अपने दर्शकों को ज़्यादा से ज़्यादा, किस्म-किस्म की यादगार अंतरराष्ट्रीय फिल्में दिखाने की कोशिश तो हर साल ही रहती है पर इस बार फेस्टिवल के थीम – ‘डेयर टू ड्रीम’ को ध्यान में रखते हुए हमारा प्रयास था कि हम ऐसी फिल्में दिखायें जिनमें इस थीम की गूँज हो, साथ ही जिनसे हमारी एल.जी.बी.टी. कम्युनिटी अपने को जोड़ सके।

‘कशिश’ के साथ-साथ ‘कशिश’ के दर्शकों का फिल्में देखने, परखने का नज़रिया भी परिपक्व होता जा रहा है इसलिए फिल्मों के कंटेंट पर, उनकी क्वालिटी, तकनीकी कौशल पर बहुत बारीकी से ध्यान दिया गया। इसके अलावा हिन्दी और विभिन्न भारतीय भाषाओं में बनी ज़्यादा से ज़्यादा फिल्मों को शामिल करने की भी एक ख़ास कोशिश थी। मुझे ख़ुशी है कि हम इस में कामयाब भी रहे। इस साल (२०१४ में) हमने २८ भारतीय फिल्में दिखाईं, जो ‘कशिश’ में अब तक एक रिकॉर्ड है।

पर मुझे इससे भी बड़ी ख़ुशी इस बात की है कि इस बार ‘कशिश’ से कोई भी फिल्म देखे बिना वापस नहीं गया। काफी लोग पहले के मुकाबले इस साल ज़्यादा फिल्मों देख सके। हर साल, लम्बी कतारों में इंतज़ार करने के बाद भी थिएटर में सीट नहीं होने के कारण जब लोग मायूस होकर जाते थे तो अच्छा नहीं लगता था। आखिर ये फिल्में लाने-जुटाने की सारी मशक्कत हम अपने दर्शकों को दिखाने के लिये ही तो करते हैं! ‘कशिश’ को लिबर्टी सिनेमा में लाने का निर्णय बिल्कुल सही साबित हुआ।

२) फिल्मों का चयन करने का आपका अनुभव कैसा रहा?

यह हर साल एक नया और मज़ेदार अनुभव होता है। क्योंकि सबमिशन्स कॉल ओपन करते वक़्त हमें कोई अंदाज़ा नहीं होता कि इस बार ‘कशिश’ में किन-किन देशों से फिल्में आयेंगीं? कैसी फिल्में आयेंगीं? किन विषयों पर आयेंगीं? जैसे इस बार हमें स्पेन से करीब ६० शार्ट फिल्म्स मिलीं, पर फाइनल लाइन-अप में उनमें से सिर्फ १८ ही शामिल हो सकीं। इसका नतीजा अच्छा ही रहा – स्पेनिश शार्ट फिल्म ‘नेकेड’ ने न सिर्फ दर्शकों का दिल छुआ बल्कि वो इस साल की सर्वोत्कृष्ट अंतर्राष्ट्रीय नैरेटिव लघुफिल्म पुरस्कार विजेता भी बनी।

हाँ, अपनी भारतीय फिल्मों के बारे में यह स्तिथि अभी भी उतनी उत्साहजनक नहीं है। हमारे यहाँ टैलेंट या नॉलेज की कोई कमी नहीं है, फिर भी किसी वजह से काफी भारतीय क्वीर फिल्में अपनी छाप छोड़ने में असफल रही हैं। वैसे इस बार पहले के मुकाबले अच्छी भारतीय फिल्मों की गिनती बढ़ी है पर मुझे इंतज़ार है उस दिन का जब ‘कशिश’ में भेजी गयी हर भारतीय क्वीर फिल्म हर पहलू से इतनी सटीक हो कि हम उसे ‘कशिश’ के दर्शकों को दिखा सकें।

इस साल ‘कशिश’ में लगभग ३५० एंट्रीज़ आई थीं। उन सब से १५४ फिल्में चुनना और वो भी बेहतरीन और बेमिसाल फिल्में, यह हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। इसके लिए मैं हमारे प्रीव्यू पैनल के दस सदस्यों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ जिन्होंने बड़े धीरज और समझ के साथ फिल्मों के चयन में मेरा साथ दिया।

३) फिल्मों को चुनने में आपने क्या मापदंड लगाए?

कंटेंट और गुणवत्ता – यानि फिल्म क्या कह रही है? और किस तरह से कह रही है? साथ ही फिल्म में एल.जी.बी.टी. किरदारों को किस तरह से, कितनी संवेदनशीलता से पेश किया गया है? हर साल की तरह इस साल भी फिल्मों के चयन में इन बातों पर ख़ास ध्यान दिया गया।

एल.जी.बी.टी. समुदाय के बारे में हमारे समाज में जो एक गलत धारणा बन चुकी है कि इन लोगों के दिलों-दिमाग पर हर समय सेक्स ही छाया रहता है, ‘कशिश’ के मँच से हम उस धारणा को सही करना चाहते हैं। ज़िन्दगी में बेशक सेक्स की ज़रुरत है पर सेक्स ही ज़िन्दगी तो नहीं है ना। समाज के बाकी लोगों की तरह हमें भी अपनी रोजी-रोटी कमाने की, ज़िन्दगी में अपना मुकाम बनाने की ज़रुरत है और हम ऐसा कर भी रहे हैं। इसलिए फिल्मों के चयन में भी हमारी यही कोशिश थी कि हम ऐसी फिल्मों को प्राथमिकता दें जिनमें आपसी रिश्तों या ज़िन्दगी में कुछ पाने, कुछ कर दिखाने जैसी भावनाओं का समावेश हो और जो मनोरंजक भी हों।

४) दर्शकों की प्रतिक्रियाएं कैसी रहीं? कुछ ख़ास अनुभव, कोई रोचक कहानी या घटना?

कहानी तो कोई नहीं है पर अँधेरे थिएटर में, ७० एम.एम. परदे पर चल रही फिल्म के किरदारों के साथ जब दर्शक हँसते या रोते हैं तो उससे खरी और सच्ची प्रतिक्रिया कोई और नहीं हो सकती। और इस बार मेरा यह अनुभव ९८% सच रहा है। २% मैं कम गिन रहा हूँ क्योंकि कोई फिल्म जो आपको बहुत अच्छी लगी, हो सकता है वो किसी दूसरे को थोड़ी कम अच्छी या बिलकुल फालतू लगी हो।

ऋतुपर्णो घोष की श्रद्धांजलि के लिए जब हमने ‘मेमोरीज़ इन मार्च’ चुनी तो मन में एक आशंका थी कि यह फिल्म तो कई लोग पहले ही देख चुके है – क्योंकि कुछ साल पहले यह फिल्म थिएटर्स में भी रिलीज़ हुई थी और अब इसकी डी.वी.डी. भी बाज़ार में मिल रही है। फिर भी ‘कशिश’ में इस फिल्म को देखने के लिए काफी दर्शक आये थे, वो भी रात के साढ़े दस बजे के शो में! मतलब अच्छी फिल्म हो तो उसके लिए दर्शक कितनी बार भी , कभी भी तैयार रहते हैं – इस घटना से मेरा यह विश्वास और भी पक्का हो गया है। इसके साथ-साथ मैं शुक्रगुज़ार हूँ अपने तमाम दर्शकों का जिन्होंने साल-दर-साल हमारी प्रोग्रामिंग को सराहा है। उम्मीद है आने वाले सालों में हमारा यह रिश्ता और पुख्ता होगा और ‘कशिश’ को उनका प्यार और साथ इसी तरह मिलता रहेगा।

सागर गुप्ता (फ्रंट सेंटर), कशिश २०१४ में।

सागर गुप्ता (फ्रंट सेंटर), कशिश २०१४ में।

५) कशिश में क्वियर फिल्में दिखाने का आपका उद्देश्य क्या है? इस तरह सरे-आम फेस्टिवल करने से समलैंगिक अधिकारों की लड़ाई में क्या योगदान होता है? कैसे?

उद्देश्य है हमारे समाज में एल.जी.बी.टी. समुदाय के प्रति लोगों की धारणा में सही परिवर्तन लाना। ‘कशिश’ के दर्शकों में हर साल करीब ३०% नॉन क्वीर लोग आते हैं – कुछ जिज्ञासा से, कुछ अपने किसी एल.जी.बी.टी. दोस्त या रिश्तेदार, भाई-बहन या बेटे-बेटी के समर्थन में। जैसा कि फीडबैक फॉर्म्स में दिए उनके कमेंट्स से ज़ाहिर होता है कि ‘कशिश’ में आने के बाद, एल.जी.बी.टी. समुदाय के लिए उनके नज़रिये में सकारात्मक बदलाव आया है – और यह बदलाव मेहरबानी करने के नज़रिये से नहीं बल्कि खुले दिल और दिमाग से एल.जी.बी.टी. लोगों को अपनाने की भावना से है।

६) कशिश में फिल्म चुने जाने और दिखाए जानेपर निर्देशकों और निर्माताओं की क्या प्रतिक्रिया होती है? पुरस्कार विजेताओं की प्रतिक्रिया कैसी थी?

एक भारतीय और ‘कशिश’ कोर टीम का एक सदस्य होने के नाते मुझे गर्व है कि थोड़े-ही समय में ‘कशिश मुंबई इंटरनेशनल क्वीर फिल्म फेस्टिवल’ साउथ एशिया के सबसे बड़े और महत्त्वपूर्ण क्वीर फिल्म फेस्टिवल के रूप में दुनिया भर में पहचाना जा रहा है। इसलिए किसी भी फिल्ममेकर के लिए उसकी फिल्म का ‘कशिश’ में चुना जाना बहुत ख़ुशी और सम्मान की बात होती है। कई जानी-मानी अमेरिकन और यूरोपियन डिस्ट्रीब्यूशन कंपनीज़ भी फक्र के साथ ‘कशिश’ से जुडी हुई हैं।

और इनाम पाने की ख़ुशी तो सभी को एक-सी होती है। चाहे वो ‘सर्वोत्कृष्ट अभिनेता – मुख्य किरदार’ की पुरस्कार विजेता केट ट्रॉटर हो या अपने अभिनय के लिए सराही गयी ‘मित्रा’ की वीणा जमकर, या फिर कैनेडियन फीचर फिल्म ‘ट्रू लव’ की डायरेक्टर जोड़ी – केट जोंस्टन और शौना मैकडोनाल्ड, सभी ने ‘कशिश’ में उनको पुरस्कार मिलने पर दिल से अपनी ख़ुशी और कृतज्ञता जताई है।

७) नए निर्देशकों, खासकर एल.जी.बी.टी. समाज से उभरने वाले निर्देशकों के लिए कशिश साझा मंच क्यों है?

एक मुकम्मल फिल्म वितरण संस्था के अभाव में हमारे यहाँ शार्ट फिल्म्स की उम्र सच में काफी शार्ट होती है। और शार्ट फिल्म का विषय अगर एल.जी.बी.टी. से सम्बंधित हो तो उसके कहीं देखने- दिखाने की उम्मीद और भी कम हो जाती है। ‘कशिश’ इस कमी को पूरा करने के लिए प्रयासरत है। ‘कशिश’ ने शुरुआत से ही नये, उभरते निर्देशकों द्वारा एल.जी.बी.टी. विषयों पर बनायी योग्य फिल्मों को दुनिया के सामने लाने का काम किया है – चाहे वो वाडिया मूवीटोन के साथ मिलकर ‘रियाद वाडिया पुरस्कार’ की शुरुआत के ज़रिये हो या ‘इंडियन मसाला मिक्स’ शार्ट फिल्म्स पैकेज के रूप में – जहाँ हर साल नये, उभरते भारतीय इंडिपेंडेंट या स्टूडेंट फिल्ममेकर्स की फिल्में प्रदर्शित की जाती हैं या फिर ‘कशिश’ के पार्टनर फिल्म फेस्टिवल्स जैसे आयरिस पुरस्कार, कार्डिफ और अन्य अंतरराष्ट्रीय एल.जी.बी.टी. फिल्म फेस्टिवल्स के द्वारा जहाँ ‘कशिश’ से हर साल की पुरस्कृत और चुनिंदा भारतीय एल.जी.बी.टी. फिल्में भेजी जाती हैं।

भारतीय निर्देशकों को अच्छी एल.जी.बी.टी. फिल्में बनाने के लिये प्रेरित करने के इस प्रयास में हिंदी फिल्मों के जाने-माने अभिनेता श्री अनुपम खेर भी हमारे साथ जुड़े हैं और २०१३ से ‘कशिश’ के ‘सर्वोत्तम भारतीय लघु नैरेटिव’ पुरस्कार विजेता को ‘अनुपम खेर्स् एक्टर प्रीपेयर्स – द स्कूल फॉर एक्टर्स’ की ओर से २०,००० रूपये की धनराशि दी जा रही है – जो किसी भी उभरते निर्देशक के लिये अपने आप में उत्तम प्रोत्साहन है।

अगर कहूँ कि यह रिश्ता ‘कशिश’ और उभरते निर्देशकों के बीच एक आपसी साझेदारी जैसा है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। वो पूरी लगन से बेहतरीन फिल्में बनाने में जुटे हैं और ‘कशिश’ पूरी लगन से उन्हें दुनिया के सामने लाने में!

८) भविष्य में आपका कशिश के लिए क्या सपना है?

हर बीज बोनेवाले का सपना यही होता है कि उसका बोया बीज एक दिन एक बड़ा पेड़ बने – जिसकी छाया में लोग सकून पा सकें, जिसकी डालियों पर पंछी अपना बसेरा बनाके चहचहायें। ‘कशिश’ के रूप में हमने भी अपनी भारतीय एल.जी.बी.टी. फिल्मों के लिए एक ऐसे ही पेड़ का बीज बोया है। अँकुर से निकले इस नन्हें पौधे को बस अब एक बड़ा पेड़ बनते देखने का सपना है!