एक पारलैंगिक वेशधारी: अपने समय के परे

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कुछ सात बरस की उमर रही होगी मेरी, जब पहली बार उन्हें देखा था| शायद मैं भी किसी अन्य मर्द/औरत की भाँति उस मुलाकात को अपने अचेत मन की खाई में धकेल सकता था, परंतु ना जाने क्यूँ मेरी अंतरात्मा ने वो दृश्य हमेशा उसी तरो-ताज़ा अंदाज़ में संभाले रखा|शायद इसलिए क्योंकि उस का अंत मेरे लिए कुछ और था, जो उस वक़्त आँखों के सामने तो था पर ज़हन में उतरने लायक समझ की कमी के कारण अभी तक अधूरा रहा| हालाँकि पर्वतीय-क्षेत्रों में पितृसत्तात्मक समाज का परिवेश कुछ उदारचरित होता है, परंतु होता पितृसत्तात्मक ही है| सात बरस की उमर मेरी, बिठाया गया बच्चों की टोली में| पुरुषों की टोली का अलग ठिकाना होता है| बच्चे हमेशा महिलाओं की संगत में थोप दिए जाते हैं| कोने पर जमा हुआ नानी, बुआ, दीदी, माँ, मौसी और उनकी बाकी महिला-मंडली में शामिल मेरी सभी दूर-दूर की महिला-रिश्तेदार का समूह| उन्हीं के बीच बैठी थी-बैठा था (कशमकश जो सालों कशमकश रही) या फिर बैठे थे वो| वो भुलाए नही भूलता, नज़र में साफ था क़ि मूँछे मुंडवाई गई है, दाढ़ी के बालों को बेहतरीन सफाई से हटाया गया है| घुटनों तक लंबे बाल, नाक पर लौंग, कानों में बाली, सिर पर ढाटू (सिर को ढकने के लिए एक तरह का वस्त्र), एक ज़नाना ढीली-कुर्ती और उतनी ही ढीली-सिलवाई गई सलवार| पहनावा जितना ज़नाना, चेहरे के नक्श उतने ही मर्दाना|

अब सोचता हूँ कि अच्छा किया जो उस वक़्त अपनी उस जिज्ञासा को उजागर ना कर मन में संजोए रखा| कहीं उस वक़्त उजागर किया होता तो वहीं मेरी सोच का दमन हो जाता और मैं भी अपने पिताजी, दादा-नाना और बाक़ी लोगों की तरह उस पितृसत्तात्मक समाज के परिवेश का शिकार हो जाता| शायद मैं भी मान लेता कि होगा कोई जो जुड़ा तो है मुझसे पर क्यूँ, वो सामाजिक तौर पर महत्वपूर्ण नहीं है| कुछ ऐसी ही दमनकारी परिकल्पना (रिप्रेसिव हाइपोथेसिस) की बात करते हैं मिशेल फूको (हिस्टरी ऑफ सेक्शुएलिटी; 1978), जब सत्ता और लैंगिकता का आमना-सामना होता है- एक पितृसत्तात्मक सामाजिक परिवेश में| फूको का मानना है कि किस प्रकार सत्ता ना सिर्फ़ एक ज़रिया है दमन का बल्कि क़ानूनन नियंत्रण और निषेध की सक्षमता भी रखती है| सत्ता में उपरी-स्थिति बनाए रखने के संघर्ष में जिस प्रकार लैंगिकता और अन्य यौन-संबंधी सामाजिक-गतिविधियों पर नियंत्रण और निषेध का प्रयोग होता है, वो दमनकारी परिकल्पना (रिप्रेसिव हाइपोथेसिस) का ही एक अंश है| अन्य शब्दों में कहा जाए तो थॉमस कुह्-न (दा स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक रेवोल्यूशन्स; 1962) की संकल्पना इस प्रक्रिया को सरल शब्दों में व्यक्त करती है, अर्थात्, सत्ता को बनाए रखने की जद्दोजहद में मौलिक नवीनता का दमन (सॅप्रेशन ऑफ फंडामेंटल नॉवेल्टीज़)| थॉमस कहते हैं कि समाज और समाज के नीति-नियमों के रक्षक, सामाजिक रिवायतों को नवीनता से दूर रखते है और अगर लाज़मी हो तो किसी भी कीमत पर नये विचारों का दमन करते हैं, चाहे वो कितनी भी क्रूर और अमानवीय क्यूँ ना हो|

अठारह साल गुज़र गए इस वाक़ए को हुए| अब दुनिया के उन तौर-तरीके से तो वाक़िफ़ हो चुका था परंतु कुछ शंकाएँ हैं जो हमेशा से बजती रहती हैं| पिछले साल घर लौटते वक़्त, मैं और माँ साथ सफ़र कर रहे थे तो मैंने हिम्मत जुटा कर पूछा, ”माँ, तुम्हे याद है? बचपन में नाना जी के घर एक बुजुर्ग आया करते थे, जो शक्ल से तो पुरुष, पर पहनावे से स्त्री लगते थे?” माँ बस की खिड़की से नज़र हटा मेरी ओर मुड़ी| चेहरे पर हल्की सी शिकन, आँखो में उत्सुकता, और ज़ुबान पर कहने को जैसे कोई शब्द नहीं| मैंने थोड़ा और संकेत देने की चेष्टा की| मैंने कहा कि वो अक्सर महिलाओं के साथ ही बैठते थे और उनके जैसे ही बर्ताव करते थे| माँ ने नज़र हटा कर कहा कि वो उनके सौतेले चाचा थे| उनसे वार्तालाप करने की अपनी इच्छा ज़ाहिर करने पर मालूम हुआ कि गत वर्ष उनका देहांत हो चुका है| मेरे चेहरे की उत्सुकता हताशा में बदल गई परंतु शंका उसी चोट पर, उतनी ही तेज़ी से बजती रही, जिसे मैं पिछले अठारह सालों से संजोया हुआ था| बस राहत ये रही कि अब मेरी सोच का दमन होना थोड़ा मुश्किल था| ना अब पितृसत्तात्मक प्रभुत्व का डर रहा और ना ही समाज की रिवायतों का| तो जब अपने पुरखों के बारे, अपने पुरखों से पूछताछ की तो मालूम पड़ा कि, उनका जन्म 1940 में हिमाचल के एक छोटे से गाँव में एक दलित परिवार में हुआ और संयोगवश वो मेरे दादी के हम-उम्र हुए| बचपन अभी आया ही था कि माँ-बाप चल बसे, तो घर की सारी ज़िम्मेदारी दो भाइयों के कंधों पर| उम्र कुछ 13 बरस की हुई जब उन्होंने पहली दफ़ा सामाजिक रिवायतों के खिलाफ जाकर लिंग-आधारित व्यक्तिगत भूमिकाओं को नकारा और पारलैंगिक वेशधारी (क्रॉस-ड्रेसर) को स्वीकारा| वे अक्सर अपने लिए एक ढीली कुरती और ढीली सलवार सिलवाया करते थे| परंतु उन्हें भी राहत ये रही कि उनका पितृसत्तात्मक समाज इतना रूढ़िवादी नहीं था जो उन्हें बगरी एक्ट (1533) जैसे क़ानूनों से सामना करना पड़ता| उनकी एकमात्र कठिनाई रही तो उनके अपने भाई| वही एकमात्र इंसान रहे जो ताउम्र उनकी इस विचित्रता (क्वियरनेस) से महरूम रहे| वे उनकी इस विचित्र (क्वियर) वेशभूषा और मानसिक सोच का विरोध करते रहे| अक्सर उनके सामूहिक उत्सवों पर शामिल होने पर भी पाबंदी लगाई गई| शुरुआती दिनों में तो उन्हें जबरन पारलैंगिक वेश करने से भी रोका गया, परंतु वे अब वो समझ गए थे जो आधे से ज़्यादा समाज 70 साल बाद भी नहीं समझ सका है|

उम्र कुछ 13 बरस की हुई जब उन्होंने पहली दफ़ा सामाजिक रिवायतों के खिलाफ जाकर लिंग-आधारित व्यक्तिगत भूमिकाओं को नकारा और पारलैंगिक वेशधारी (क्रॉस-ड्रेसर) को स्वीकारा

साठ-सत्तर का दशक था| अब कहने को तो आज़ादी मिल गई थी, पर किसे और किन पहलुओं से, वो तय होने की प्रक्रिया जारी थी, और शायद अभी भी है| जात-पात, भेदभाव, धर्म-कांड इत्यादि का वही हाल था जो आज समलैंगिकता का है, अर्थात्, संविधान में तो है, परंतु सामाजिक तौर पर अमल से बरसों दूर| 25-30 की उम्र में उन्होंने जब दाई के पेशे को अपनाया तो उनका पारलैंगिक वेश स्थायी हो गया था| दाई के काम से ही आमदनी भी हो जाती थी| लोग वेतन के तौर पर कुछ पैसे और एक-जोड़ी लायक वस्त्र दान किया करते थे| वो हमेशा दान में ज़नाना-वस्त्रों की माँग करते थे| यहाँ तक कि वे लोगों से आग्रह किया करते कि उन्हें उनके मर्दाना नाम से नहीं, बल्कि ज़नाना-रूप से संबोधित किया किया करें| पारिवारिक जीवन कुछ ऐसा था कि ताउम्र कुंवारे रहे पर कहने को बहुपतित्व प्रथा (पॉलिएंड्री) के तहत शादी-शुदा हुए, अर्थात् उनके बड़े भाई की पत्नी ही उनकी पत्नी हुई| यूँ कहा जाए तो बड़े भाई की ज़िद पर उन्होंने ये रिश्ता अपनाया| दाई के पेशे में, प्रसव दौरान जो ज़नाना-वस्त्र मिलते, वो अक्सर अपनी बीवी को दे जाते और कभी-कभार अपने लिए वही ढीली-कुरती और सलवार सिलवा लिए करते|

तस्वीर सौजन्य : मिहिर महेर / क्यूग्राफ़ी

पर्वतीय क्षेत्रों में जात-पात, ऊँच-नीच जैसी सामाजिक कुरीतियाँ बहुत ही कम सुनने को मिलती है या फिर यूँ कहना उचित रहेगा कि उन्हें इतने अव्यक्त रूप से अभ्यासरत रखा जाता है कि वे हमेशा प्रच्छन्न रूप से सक्रिय रहें| अचंभित हूँ और विडंबना में भी| एक पितृसत्तात्मक समाज, जहाँ जात-पात, ऊँच-नीच का प्रामुख्य हो; कौन सी स्थिति ज़्यादा दयनीय होगी – एक दलित होना, एक दलित मर्द का पारलैंगिक वेशधारी होना, या फिर एक दलित पारलैंगिक वेशधारी मर्द का दाई होना? ऐसी सामाजिक प्रक्रिया को ही किम्बर्ले विलियम क्रेनशॉ (1989) ने इंटेरसेक्शनेलिटी कहा है| जब कोई एक जन विभिन्न आधारों (जैसे लिंग, धर्म, जाति, वर्ग, रंग या फिर कोई सांस्कृतिक-पहचान) पर भेदभाव और दमन का शिकार होता है| हालाँकि अक्सर देखा गया है कि जब बात संकटमय स्थिति की हो तो सभी भेदभाव सूक्ष्म पड़ जाते हैं, और प्रसव, रक्त-दान, या फिर अंग-दान ऐसे ही कुछ उदाहरण है जहाँ जात-पात, धर्म, वर्ग, रंग इत्यादि की तरज़ीह करना स्वयम् के लिए ही हानिकारक हो जाता है| जानकारी के अनुसार ऐसा कोई वाक़्या सामने तो नहीं आया जहाँ उन्हें उनकी सामाजिक पहचान के कारण कोई कठिनाई उठानी पड़ी हो, परंतु इतना ज़ाहिर हुआ कि आमतौर पर जो रीति-रिवाज़ है उन्हें ज़रूर निभाना पड़ता है- जैसे अपनी थाली-गिलास को अपने आप धोना, अलग स्थान पर भोजन परोसा जाना इत्यादि| एक दलित दाई से प्रसव करवाना कोई अचंभे की बात नहीं है, क्यूंकि प्रसव अवस्था में पूरे परिवार और सदस्य को अपवित्र माना जाता है, जो कि एक ओर सामाजिक संकल्पना पर आधारित है- पवित्रता और मालिन्य की संकल्पना (कॉन्सेप्ट ऑफ प्यूरिटी एंड पोल्यूशन)|

ऊँची जात के लोग, निचली जात को अपनी बराबरी का नहीं मानते और यहाँ सभी ऊँची-नीची जात के लोग मिलकर इन विचित्र (क्वियरनेस) मानसिक सोच को अपनी मानसिक सोच से तुच्छ और बीमारी समान समझते हैं

30-35 वर्ष के इस पेशे में उन्होंने सैंकड़ों प्रसव को सफलतापूर्वक अंजाम दिया और कार्य में निपुणता ऐसी कि सरकारी अस्पताल से नौकरी के प्रस्ताव अलग| उन्होंने कभी अस्पताल का प्रस्ताव स्वीकार तो नहीं किया परंतु एक दफ़ा शुरुआती दौर पर प्रशिक्षण-संबंधी कार्यशाला में ज़रूर भाग लिया| कहा जाता है कि उनके हाथों का प्रसव इतना मशहूर हुआ कि लोग मीलों चलकर उन्हें ले जाने आते| नामवर इस क़दर के हुए कि एक समय बाद उन्होंने आस-पास के गाँव में निःशुल्क प्रसव करना शुरू कर दिया| ग़नीमत ये रही कि वो ऊँचे तबके से नहीं थे, जिसके कारण उन्हें सम्मान-रक्षा जैसी परीक्षाओं का सामना ना करना पड़ा| समाज में चलन यह है कि निचली तबके में जो जैसा मर्ज़ी हो (विकलांग, क्वियर, ट्रांस-जेंडर, दलित, चरीत्रहीन, हत्यारा इत्यादि), वो किसी समाज के प्रतिनिधित्व का प्रतीक नहीं होता, क्यूंकि उसकी सामाजिक पहचान का वर्चस्व छोटा माना जाता है| मुद्दा हर जगह वही है, वहाँ ऊँची जात के लोग, निचली जात को अपनी बराबरी का नहीं मानते और यहाँ सभी ऊँची-नीची जात के लोग मिलकर इन विचित्र (क्वियरनेस) मानसिक सोच को अपनी मानसिक सोच से तुच्छ और बीमारी समान समझते हैं|

सच कहूँ तो मेरे पास अंत अभी भी नहीं है| मैं अभी भी उसी सात बरस की उमर में रुका पड़ा हूँ| शायद इंतज़ार है कालचक्र में फँसी उस ललक को पूरा करने का| शायद मैं उठ पड़ूँ, वो झिझक छोड़, जा बैठूं उस महिला-मंडली के बीच, और पूछूँ उनसे हर उस शंका का कारण जो पैदा हुई है शक्ति-संचय की प्रक्रिया के दौरान, अर्थात् पितृसत्तात्मक समाज में लैंगिकता-नियंत्रण| साल अभी एक ही हुआ है, क़ानून ने तो अपनाया है, अब बारी समाज की है| संविधान की तो मान्यता है, उम्मीद है कि इस-तरह के आंतरिक वर्चस्व को सामाजिक मान्यता भी मिले| वार्तालाप का सारांश यूँ है कि सभी (विभिन्न) प्रकार की सामाजिक-पहचानें मौजूद है क्यूंकि यहीं इनका अस्तित्व है, वर्चस्व है| यह भी उतनी ही स्वाभाविक और वास्तविक है जितनी सुबह और शाम| अगर किसी और ग्रह साजिश होती तो और ग्रह पर वापिस भेज भी देते, परंतु जो हमारा है, उन्हें हम नहीं अपनाएँगे तो वो ओर जाएँ भी तो कहाँ?

होता मुनासिब तो छोड़ चुके होते सोहबत अह्ल-ए-जहाँ की |
जो अब नहीं है तो क्यों ठुकराता है अयाज़ मुहब्बत मेरी ||

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अमित कुमार (Amit Kumar)

अमित कुमार वर्तमान में पीएचडी स्कॉलर है, जेंडर स्टडीज यूनिट, इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन, चंडीगढ़ में। उन्होंने जेएनयू, नई दिल्ली से भूगोल में पोस्ट-ग्रेजुएशन किया है।

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