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संघर्ष: धीमा, मगर निरंतर

संघर्ष: धीमा, मगर निरंतर ! तस्वीर: चैतन्य चापेकर; सौजन्य: QGraphy

२ फरवरी २०१६ को भारतीय उच्चतम न्यायलय ने नाज़ फ़ौंडेशन व अन्य प्रार्थाकों द्वारा पेश की गई उपचारात्मक याचिका (क्युरेटिव पेटीशन) को ५ न्यायाधीशों के संवैधानिक पीठ (बेंच) के सामने प्रस्तुत करने का निर्देश दिया । प्रथमदृष्टया यह अपने आप में कोई बड़ी बात नहीं प्रतीत होती । लेकिन जैसे कि मीडिया में इस सप्ताह दिखाई देता है, भारत भर के लैंगिकता और जिन्सी अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों में मानो एक खुशी की लहर दौड़ रही है । क्या वजह है, कि महज़ याचिका की स्वीकृति से एल.जी.बी.टी. समुदाय को एक विजय की अनुभूति हो रही है? इसका जवाब पाने के लिए पिछले दशक का इतिहास जानना ज़रूरी है । २ जुलाई २००९ को जब दिल्ली उच्च न्यायलय ने ‘नाज़ बनाम कौशल’ मामले में समलैंगिकता के निरापराधिकरण का अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया, तब दशकों से दबी हुई सेक्शुअल माइनॉरिटीज़ की आवाज़ ने उक्ति पाई । इसका असर न सिर्फ सामाजिक बल्कि निजी स्तर पर भी हुआ । एक तरफ बड़े-छोटे शहरों में समुदाय-आधारित संगठन पनपने लगे और स्वाभिमान जुलूसों (प्राईड परेड) का आयोजन होने लगा; तो दूसरी तरफ परिवारों के भीतर गे, लेस्बियन, बाइसेक्शुअल और ट्रांसजेंडर व्यक्ति अपने रुझान का सत्य प्रियजनों के सामने  बताने लगे । सब्र के बाँध फूटे और तद्पश्चात बहने लगे स्वत्माभिव्यक्ति के सैलाब की रोकथाम नामुमकिन हुई ।

उसी दौरान समलैंगिक अधिकार के विरोधकों ने मामला सुप्रीम कोर्ट में लाया । ११ दिसंबर २०१३ को अपने फैसले द्वारा उच्चतम न्यायलय ने समुदाय का पुनरपराधिकरण किया । दुनिया में एल.जी.बी.टी. राईट्स संघर्षों के इतिहास में यह विडम्बना पहली बार हुई, कि किसी देश ने अपने समलैंगिक नागरिकों के गुनहगारी के कलंक को पहले मिटाकर, उन्हें दोबारा अपराधी घोषित किया हो । कम्युनिटी के लिए यह एक जोर का और अनापेक्षित झटका था । २८ जनवरी २०१४ को पुनर्विचार याचिका के अस्वीकार की खबर इस ताज़े घाव पर नमक छिड़कने जैसी थी । २००९ के बाद के उल्हास और आशा के वातावरण में खेदजनक तब्दीली आई । समुदाय ने अपने सकारात्मक रवैय्ये को नहीं खोने के लिए ‘संघर्ष जारी है’, ‘पीछे नहीं हटेंगे’, ‘३७७ भारत छोडो’ के नारे लगाए । मगर बीते १४ महीने समुदाय के लिए बड़े मुश्किल रहे । उलझन थी, ‘करें तो करें क्या?’ । उच्चतम न्यायलय ने मानो अपने बुनियादी कर्तव्य – सभी नागरिकों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा – से हाथ धो लिए थे । समुदाय के अपराधीकरण का सबसे बड़ा अपराधी भारतीय दंड संहिता का कलम ३७७ है । उसके विरुद्ध पेश किए गए सबूत के पहाड़ को कोर्ट ने जैसे नज़रंदाज़ ही किया था ।

'मैं हूँ' (तस्वीर: कार्तिक शर्मा, सौजन्य: QGraphy)

‘मैं हूँ’ (तस्वीर: कार्तिक शर्मा, सौजन्य: QGraphy)

रही संसद की बात, तो उनसे अपेक्षा रखना तूफ़ान में दिया जलाने जैसा प्रतीत हुआ । हर पाँच साल के कार्यकाल के बाद बदलने वाली संसद क्या लैंगिकता अल्पसंखकों के लिए कुछ कर पाती? वोट-बैंक पोलिटिक्स और जातिवाद के समीकरणों में निमग्न सांसद क्या इस अदृश्य, अनसुने समुदाय के ख़िलाफ़ होनेवाले भेदभाव और हिंसा की क़दर करते? १७ दिसंबर २०१५ को सांसद शशि थरूर के निजी सदस्य विधेयक (प्राइवेट मेम्बर्स बिल) को शोर-शराबे के ज़रिये पेश होने से ही रोका गया । न सिर्फ इतना, बल्कि यह साहस करने की जुर्रत करनेवाले शशी थरूर के निजी रुझान पर कुछ सांसदों द्वारा हुई व्यंग्योक्ति से यह साफ़ ज़ाहिर हुआ, कि हमारे वे सांसद अपने कर्तव्यों का पालन करने की सक्षमता, मुद्दे कि गहराई, और समस्या के पुर्जों पर गौर फरमाने की काबिलियत रखते ही नहीं । ऐसे सांसदों से समलैंगिकता के निरपराधिकरण का धनुष्य उठाने की अपेक्षा करना “अंधों के सामने रोएं, और अपने नैन खोएं” जैसा होगा । एक्टिविस्ट कम्युनिटी हैरान थी कि अब हमारा पालनहार बनेगा कौन? सिर्फ एक आशा की किरण दिख रही थी: न्यायिक प्रक्रिया में बचा हुआ एकमात्र उपाय – उपचारात्मक याचिका । परन्तु इसे भी घने बादलों ने घेरा हुआ है: २००२ से स्थापित इस नई प्रक्रिया में पूर्व निर्णय के उलटाव, यानि सफलता के अनुपात, नगण्य हैं – ३% से भी कम । इस मुश्किल के अलावा, सवाल यह है कि ‘अगर फिरसे सुनवाई होती है, तो ऐसी कौनसी नयी दलीलें पेश की जा सकतीं हैं, जो कोर्ट की राय जड़ मूल से बदले? जब जस्टिस शाह के संवैधानिक नैतिकता के तर्क में बख्तरबंद प्रगतिशील फैसले पर रोक लगाई गई, तब इस आखरी, निराशांध प्रयास का भला क्या अंजाम होगा?’ अतः इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि क्वीयर भारतीय सहमे हुए थे, और फिरसे अपनी आज़ादी के सपने संजोने की तुलना में वास्तव का सामना करने और अपेक्षाओं को सीमित रखने के पक्ष में अधिक थे ।

जब २ फरवरी २०१६ की तारीख आई, तो कम्युनिटी के लोग ३ दिसंबर २०१३ के अपमान, आँसू और विश्वासघात की भावना को भूले नहीं थे । ख़ुदा-ना-खास्ता, अगर फिरसे याचिका बर्खास्त की जाती, तो यह आशा की आखरी किरण भी लुप्त हो जाती, और पुनः एक नई केस लाकर सारी न्यायिक प्रक्रिया का प्रारम्भ करना पड़ता । १९९८ से २०१६ तक इस सिलसिले में हुए प्रयासों पर पानी फेरा जाता । शुक्र है, ऐसा नहीं हुआ । उपचारात्मक याचिका प्रस्तुत हुई, और समाज के कई हिस्सों में मौजूद रूढ़ीवाद और भेदभाव के बावजूद ३७७ को हराने की संभावना अभी भी बरक़रार है ।

"३७७ के गमन की आशा" (तस्वीर: राज पाण्डेय; सौजन्य: QGgraphy)

“३७७ के गमन की आशा” (तस्वीर: राज पाण्डेय; सौजन्य: QGgraphy)

लेकिन इस सब से परे, इन ७ सालों की मुश्किल घड़ियों में क्वियर कम्युनिटी के अन्दर एक सुन्दर प्रक्रिया देखने को मिली: कम्युनिटी के एकत्रित आने, परिपक्व होने और अपने अधिकारों की लड़ाई के पथ पर टिके रहने का दृढ संकल्प लेने की प्रक्रिया । रविवार, ३१ जनवरी २०१६ को कई शहरों में कम्युनिटी ने मौके की संजीदगी दर्शाने के लिए सार्वजनिक कार्यक्रम किए । मुंबई के मरीन ड्राइव के इस कार्यक्रम में समुन्दर से जोर की हवाएं चल रहीं थी, और मार्च में सहभागी सदस्य अपनी मोमबत्तियों को दर्जनों बार पुनः सुलगाने को थक नहीं रहे थे, बल्कि इससे उनका एक और परस्पर स्नेह और बढ़ रहा था । चारों तरफ बेखबर लोगों की चहल-पहल, गाड़ियों की आवाजाही के बीच ‘रानी के रत्नहार’ जैसे मरीन ड्राइव पर एल.जी.बी.टी.आई.क्यू. कम्युनिटी ने यह सिद्ध किया, कि भले ही सुप्रीम कोर्ट २ दिन पश्चात याचिका खारिज करता, पर कार्यकर्ताओं में पुनः लड़ाई लड़ने का जोश और साहस व्यापक रूप से मौजूद था । कल ६ फरवरी को, भारत के सबसे बड़े प्राइड ‘क्वीयर आजादी मुंबई’ में वही लोग इस छोटी-सी जीत के बाद अपनी उत्साहपूर्ण प्रतिभागिता से इस कायाकल्प का प्रमाण देंगे ।

दुःख की बात तब होती जब क्युरेटिव पेटीशन को नामंजूर करने से यह लड़ाई और भी लम्बी खिंची जाती और परिणामस्वरूप, लैंगिकता और जिंसी अल्पसंखकों की एक और पीढी गुनहगारी का कलंक अपने माथे पर लेकर जीने पर मजबूर होती । इसलिए २ फरवरी २०१६ को उच्चतम न्यायलय द्वारा उपचारात्मक याचिका का मंजूर होना स्वागतार्ह है । ऐसे लग रहा है कि ७ वर्ष बाद, हवाओं का रुख फिरसे हमारे पक्ष में मुड़ गया है। आशा है, बदलाव की हवाएँ ज़ोर पकडेंगी और लैंगिकता और जिन्सी अल्पसंखकों को उनके बुनियादी संवैधानिक अधिकार जल्दी मिलेंगे ।