दुविधा (एक कविता)

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जलते कोयले पर जमी राख की परत को
मिली है तुम्हारे स्पर्श से हवा
अब इस सुलगी आग का क्या करूँ मैं?

छोड़ दूँ गर इसे अपने नतीजे पे
तो प्रश्न अस्तित्त्व का है
बुझा भी दूँ किसी की मदद से
तो सवाल है नीती-अनीती का…

इस दुविधा में मुझे फँसाकर
यूँ मुँह मोड़ लेना
कहीं यह तुम्हारा नया खेल तो नहीं?

संदेश कुडतरकर

संदेश कुडतरकर

Sandesh is working in an IT company as a team lead and is a poet and writer at heart

संदेश कुडतरकर एक आय. टी. प्रोफेशनल है और खुद को अभिव्यक्त करने के लिए लिखते हैं । हिंदी और मराठी फिल्में देखने का और गाने सुनने का इन्हें शौक है ।
संदेश कुडतरकर

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