श्री श्री रवि शंकर बनाम बाबा रामदेव

wp
Sri Sri Ravishankar and Baba Ramdev

श्री श्री रविशंकर और बाबा रामदेव [छाया: विकिपीडिया]

२ गुरुओं की समलैंगिकता पर परस्पर-विरोधी राय।

कई सालों से अनेक हिन्दू गुरुओं और तत्त्वज्ञों ने, अलग-अलग सन्दर्भों में, समलैंगिक रिश्तों के बारे में अपनी राय बतायी है। उनके बयानों की सूची इस फेसबुक पृष्ठ पर मिलेगी। २०१३ के उच्चतम न्यायलय के फैसले ने समलैंगिकता (खासकर २ पुरुषों के बीच) का लगभग पुनःअपराधीकरण किया। उसके तुरंत बाद, दो गुरुओं ने खुले-आम अपनी परस्पर-विरोधी राय बतायी।

आइये खोजें क्या हैं इन २ परस्पर-विरोधी मतों की सैद्धांतिक जड़ें। बाबा रामदेव ने समलैंगिक यौनिकता को ‘अप्राकृतिक’ कहा है। परन्तु अपने मत की पुष्टि करने की लिए वे किसी भी हिन्दू धर्मग्रंथ या स्रोत का उल्लेख मात्र नहीं करते। सच तो यह है, कि समलैंगिक यौनिकता का अप्राकृतिक होने का दावा बाइबल से विरासत में पाया गया है। संत पॉल ने ‘बुक ऑफ़ रोमन्स’ में ऐसी औरतों का ज़िक्र किया, जिनका यौन करने का तरीका ‘प्रकृति के खिलाफ’ था (किंग जेम्स संस्करण, १६११)। ज़रूरी नहीं कि संत पॉल यहाँ समलैंगिक यौन का ही हवाला दे रहे थे। लेकिन इसके ठीक बाद वे ज़िक्र करते है ऐसे मर्दों का, जो ‘औरतों का प्राकृतिक उपयोग’ छोड़कर, आपस में दुसरे मर्दों के साथ यौन करते हैं। यही ‘प्रकृति के विरुद्ध’ होने की बात दोहरायी संत ऑगस्टीन (३५४-४३० ई.) ने, जो चर्च के निहायती प्रभावी पादरी थे। वे हर प्रकार कॆ यौन को पापमय समझते थे। समलैंगिक यौन तो सबसे बुरा, क्योंकि उनके मुताबिक वह “प्रकृति के खिलाफ” था। संत ऑगस्टीन यह घोषणा करने से भी कतराए नहीं कि यद्यपि भिन्न देशों कि रीति-रिवाज अलग-अलग हो, और गैर-ईसाई मुल्कों में ‘ऐसे’ यौन का होना एक आम बात हो, तथापि समलैंगिक यौन को हमेशा और हर जगह ग़लत, और दंडनीय माना जाना चाहिए (कन्फेशंस, III:८)। संत ऑगस्टिन का यही मत ईसाईयत में हावी हुआ। इस वजह से हर तरह के यौन को सिर्फ पापमय ही नहीं, सोच से बाहर भयानक और सज़ा-ए-मौत से दंडनीय भी समझा गया।

‘अन-नैचरल’ इस अंग्रेजी शब्द का सीधा अनुवाद ‘अप्राकृतिक’ है। लेकिन हिंदू मत में प्रकृति की संकल्पना से इस ‘नेचर’ का बिलकुल भी सम्बंध नहीं है। प्रकृति सिद्धांत है – कार्य, ऊर्जा और गतिशील द्रव्यों का। पुरुष और प्रकृति ये हर जीवमात्र के दो आयाम (डाइमेंशंस) हैं। हिन्दू देव-देवियाँ अनेक रूप (मानव, पशु, चट्टान, नदी, इत्यादि) धारण करते हैं। इससे यह सूचित किया जाता है कि सबकुछ जो अस्तित्व में है, वह दिव्यता का (ब्रह्म का, आत्मन का) प्रकट रूप है। इसलिए गीता में श्रीकृष्ण स्वयं को हर जीव और कृति का उच्चतम स्वरूप (चाहे वह साँपगण हों, या ग्रहगण या मानवगण) कहलाते हैं। श्री कृष्ण तो कहते हैं, “छल करनेवालों में मैं हूँ जुआ” (गीता १०:३६)। अतः ख्रिस्ती शैतान से भिन्न असुरों को हमेशा के लिए नरकवास नहीं मिलता। रामायण के अंत में तो रावण राम के मुख में उड़कर प्रवेश करते हैं।

अगर धरती पर मौजूद हर चीज़ प्रकृति का भाग है, तो वह अप्राकृतिक कैसे हो सकती है? श्री श्री रवि शंकर कहते हैं कि हर जीव में पुरुष और नारी ये दोनों तत्त्व हैं। कभी एक हावी होता है, तो कभी दूसरा। उनका मत हिन्दू मत के जिंस (जेंडर) की संकल्पना के अनुसार है। जेंडर एक निश्चित और अचल चीज़ नहीं है। यह एक जन्म से दूसरे जन्म तक बदल सकती है। एक जीवन काल में भी हर जीव में पुरुष और प्रकृति (यानि शक्ति / स्त्री) ये दोनों तत्त्व समाये हुए हैं। जिस तरह हर देवी-देवता की स्तुति माता, पिता और अपार ब्रह्म (यानि पुल्लिंग, स्त्रीलिंग या लिंग से पार रूप में) की जा सकती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में पौरुष और स्त्रीत्व ये दोनों प्रवृत्तियाँ होती हैं। उम्र, संदर्भ, भाव, और ज़िन्दगी के पड़ाव के मुताबिक इन प्रवृत्तियों का प्रभाव और उनकी अभिव्यक्ति बदलते हैं। कामशास्त्र भी एक धर्मशास्त्र है, क्योंकि काम जीवन के चार लक्ष्यों में से एक है। वात्स्यायन के काम-शास्त्र में पुरुष को चाहनेवाले पुरुष को “तृतीय प्रकृति” करार दिया गया है – तृतीय लिंग नहीं, बल्कि तृतीय प्रकृति। यानि उसका लिंग पुरुष है, परंतु उसकी प्रकृति अलग है। वह प्रकृति का भाग है। तृतीय प्रकृति को लेकर कामशास्त्र में एक पूरा अध्याय है, जिसमें मौखिक यौन का विस्तार से विवरण किया गया है। इसको कहीं अप्राकृतिक नहीं कहा गया है। धारा ३७७ में मौखिक यौन वर्जित है। कामशास्त्र के अनुसार यह पुरुष-स्त्री, पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच यौन करने का प्रचलित तरीका है।

अतः बाबा रामदेव की ‘प्राकृतिक’ और ‘अप्राकृतिक’ की व्याख्या हिंदु दर्शन से नहीं आती, वह बाइबल से आती है जहाँ समलैंगिकता को “प्रकृति के खिलाफ” समझा जाता है। यह व्याख्या अंग्रेजी से अनुवाद होकर भारत की अन्य भाषाओँ में आयी।

हाँ, हिन्दू दर्शन में एक कृति प्राकृतिक होकर भी अधार्मिक हो सकती है। बाबा रामदेव बिना कोई सबूत के यह दावा करते हैं कि समलैंगिकता भारत के परिवार व्यवस्था को नष्ट कर रही है। मगर साफ़ ज़ाहिर है कि समलैंगिकों के माँ-बाप और दादा-दादी ऐसा नहीं सोचते, जिन्होंने उच्चतम न्यायलय में एक याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने कहा कि धारा ३७७ कॆ ज़रिये उनके बच्चों का उत्पीड़न और परिवारों का नुक्सान हो रहा है। ऐसे काफी सारे समलैंगिक हैं जो अपने बूढ़े माँ-बाप का इकलौता सहारा हैं। ज़्यादातर समलैंगिक व्यक्ति अपने परिवारों के अटूट हिस्से हैं। वे अपने माँ-बाप और अपने भाई-बहनों से निकटतम रिश्ता रखते हैं। कइयों ने अपने समलैंगिक साथियों के साथ परिवार बसाया है और बच्चों की परवरिश भी कर रहे हैं।

एक प्रश्नोत्तरी में श्री श्री रविशंकर ने समलैंगिकों को पीड़ित करनेवाले अकेलेपन के बारे में कहा, “प्रेम स्त्री-पुरुष के भेद से ऊँचा है। प्रेम लिंग से परे है। आकर्षण केवल प्रेम का प्रतिबिम्ब है, उसका साया है। प्रेम तो दिव्य है”  (अंग्रेजी से अनूदित)। उसके बाद बात करते हुए वे यह सलाह देते हैं: “हमें भावनाओं को मन में मुक्त रूप से आने और जाने की इजाज़त देनी चाहिए। उन्हें न रोकें, न उनको बढ़ावा दें। लगातार आत्मा से योग बनाये रखें। आत्मा आनंद और प्रेम से ओत-प्रोत है, अकेलेपन पर आत्मा में लीन होकर क़ाबू पा सकते हैं। अन्यथा साथी और रिश्ता होने के बावजूद हम अकेलेपन के शिकार हो सकते हैं।”

यहाँ श्री श्री ने हर तरह की चाहत को एक समान माना है, परिणामतः यह मुमकिन है कि कोई भी किसी भी प्रकार की इच्छा अनुभव कर सकता है। इच्छा को मुद्दा बनाने के बजाय उसके क्षणिक स्वभाव को समझें। गौर करें कि वे अकेलेपन को समलैंगिक इच्छा का नतीजा नहीं मानते। सबको अकेलापन महसूस होता है। स्वामी बोधानंद सरस्वती ने २००४ में मुझे यही बात बताते हुए कहा कि किसी भी रिश्ते में वही समस्याओं का सामना करना पड़ता है, चाहें वे रिश्ते भिन्नलिंगी हो या समलिंगी।

हिन्दू दर्शन में धर्म सामाजिक भी है और व्यक्तिगत भी। निजी धर्म व्यक्ति की अपनी सारी प्रवृत्तियाँ हैं, जो पिछले जन्मों के कर्मों और लगावों का फल हैं। इनमें यौनिक (समलैंगिक या विषमलैंगिक) प्रवृत्तियाँ भी सम्मिलित हैं। उन्हें दबाना या उनका “इलाज” करना (जैसे बाबा रामदेव का दावा है) धर्म की दार्शनिक समझ के विरुद्ध है। दूसरी ओर, सामाजिक धर्म की व्याख्या बदलती रहती है। यह बदलाव अक्सर व्यक्तिगत धर्म से टकराने की वजह से होता है। उदाहरण के तौर पर, ज़्यादातर माना गया है, कि सामाजिक धर्म का मतलब है अपने संप्रदाय के भीतर शादी-ब्याह रचाना। लेकिन इसके बावजूद अगर २ भिन्न समुदाय के लोगों में प्यार हो जाए, तो यह प्रेम उनके पिछले जन्म के अनुराग का नतीजा माना जाता है। तब सामाजिक धर्म को हटकर व्यक्तिगत धर्म के लिए जगह बनानी पड़ती है।

अंत में, ग़ौर करिये अपराधीकरण के प्रश्न पर। बाबा रामदेव कहते हैं कि समलैंगिक व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार हैं। लेकिन बाबा रामदेव इन बीमार व्यक्तियों को अपराधी ठहराकर कानूनन सज़ा भी दिलवाना चाहते हैं जो सज़ा धारा ३७७ के तहत १० साल से आजीवन कारावास तक की हो सकती है। ऐसा कौनसा हिंदु ग्रन्थ है, जो बीमारों को अपराधियों की तरह सज़ा देने के पक्ष में है? बाबा रामदेव की ये परस्पर-विरोधी मान्यताएँ किसी धर्मग्रंथ से नहीं, बल्कि कुछ पश्चिमी विचारों से आती हैं, जिनका उन्होंने एक तर्कहीन और विसंगत मिश्रण बनाया है। मध्ययुगीन यूरोप में समलैंगिक यौन-क्रियाओं को धार्मिक प्रायश्चित और तपस्या से क्षम्य पाप समझा जाता था। न कि एक अपराध जिसकी सज़ा शासक दें। सोलहवी सदी में, हेनरी अष्टम ने पहली बार समलैंगिक यौन-कृत्यों को दंडनीय अपराध बनाया। अंग्रेज़ों द्वारा १८६१ में घोषित धारा ३७७ इसी हेनरी अष्टम के क़ानून की विरासत है। मगर १९ वीं सदी के अंत से २० वीं सदी के मध्य तक, यूरोपीय और अमरीकी डॉक्टरों और मनोचिकित्सकों ने तय किया कि समलैंगिकता एक रोग है। इस नयी राय से समलैंगिकता के निरपराधिकरण का रास्ता आसान हुआ, क्योंकि रोगी जुर्मी नहीं होते। अब, पश्चिमी डॉक्टरों और मनोचिकित्सकों में यह सहमति है कि समलैंगिकता एक नैसर्गिक प्रवृत्ति है, और यह न जुर्म है, न बीमारी। परिणामस्वरूप दुनिया कॆ काफी सारे लोकतांत्रिक देशों में एल.जी.बी.टी.आई. लोगों को पूर्ण और समान नागरिक अधिकार दिए जाने लगे हैं।

समलैंगिकों को रोगी और गुनहगार मानने कॆ बाबा रामदेव कॆ प्रस्ताव का किसी हिन्दू सिद्धांत या ग्रंथ से सम्बंध नहीं है। उनका ताल्लुक़ पुराने पश्चिमी विचारों से है, जिनको खुद पश्चिमी सभ्यता ने त्याग दिया है। श्री श्री रवि शंकर ने ११ दिसंबर २०१३ (वह तारीख़ जिसे ११.१२.१३ से जाना जाता है) को उच्चतम न्यायालय कॆ फैसले कॆ ठीक बाद ट्वीट किया, “किसी व्यक्ति के साथ, उसकी यौनिक प्रवृत्तियों कि वजह से भेदभाव नहीं होना चाहिए। इसके लिए किसी को अपराधी ठहराना बिलकुल बेतुका है।” (अंग्रेजी से अनूदित)

सचमुच, हम बेतुकेपन का ही सामना कर रहे हैं। लेकिन जैसे कि काफ्का को पढ़नेवालों को मालूम है, बेतुकापन एक बेहद शक्तिशाली ताक़त बन सकती है।

Ruth Vanita

Ruth Vanita is Professor in the Department of Liberal Studies at the University of Montana (USA), former Reader at Delhi University and founding co-editor of India's first nationwide feminist magazine, 'Manushi' (1978-1990). She is the author of several books, including 'Love's Rite: Same-sex Marriage in India and the West'; 'Gandhi's Tiger and Sita's Smile: Essays on sexuality, gender and culture'; 'Same-sex love and the English literary Imagination'; 'A Play of Light: Selected Poems' and 'Gender, Sex andthe City - Urdu Rekhti Poetry 1780-1870'. She has published widely on Shakespeare, and translated many works of fiction, including most recently 'The Co-wife and other Stories' by Premchand.