विश्वविद्यालय में ट्रांसजेंडर होना

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धनञ्जय चौहान

जब से मैंने होश सम्भाला तब से मैं अपनी असली पहचान की खोज में बटकता रहा। जीवन में ऐसे कई मोड़ आये जब कुछ समझ नहीं आता था कि मेरी असली पहचान क्या है। लेकिन मैंने कभी शिक्षा का  दामन  नहीं छोड़ा।

मैं  हमेशा यह महसूस करता था कि मेरे अंदर कोई औरत मौजूद है। मैं हमेशा अपने आप को एक औरत मानता था। आज जब मैंने अपनी पहचान बदल कर ट्रांसजेंडर पहचान बना ली  है, चूँकि  मैं औरत नहीं बन सकता, तब भी मुझे ख़ुशी हैं कि जो मैं चाहता था वो मैंने कर डाला। इसमें मेरे परिवार ने बहुत साथ दिया। खासकर मेरी पत्नी (सांसारिक रूप से) जो मेरे हर सुख और दुःख में सहभागी बनी रही। हालाँकि जब से मैंने समाज में खुलकर अपनी असली यौनिकता या लैंगिक पहचान को स्वीकार किया है, उससे कई साल पहले से ही हम दोनों के बीच शारीरिक समबन्ध नहीं रहे। और हमारे बीच शारीरिक सम्बन्ध भी मेरे न चाहते हुए  नाममात्र का ही बना था जिससे हमारे दो बच्चे हुए।

यूँ तो मुझे पढ़ाई छोड़े तक़रीबन चौबीस वर्ष हो गए हैं। मैंने अपनी पढ़ाई राजकीय महाविद्यालय, सेक्टर ४६, चंडीगढ़ से १९९३ में पूरी  की थी। लेकिन आगे पढ़ने और विश्वविद्यालय में नियमित विद्यार्थी बनकर पढ़ाई का सपना कभी पूरा नहीं हुआ। फिर भी, १९९३ से २०१५ तक मैं पढ़ाई से, किसी न किसी कोर्स से जुड़ा रहा और स्नाकोत्तर तक की शिक्षा हासिल की।

आज मुझे गर्व हैं कि मैं पंजाब विश्वविद्यालय का पहला ट्रांसजेंडर विद्यार्थी हूँ, जो सभी विद्यार्थियों  के साथ मिल कर अपनी विद्या अर्जित करेगा। हालाँकि मैं पहले से चंडीगढ़ और पंजाब  विश्वविद्यालय में अपने कार्यों से प्रसिद्ध हूँ। आज जब मैंने एक ट्रांसजेंडर पहचान के साथ  पंजाब विश्वविद्यालय के मानव अधिकार विभाग में स्नातकोत्तर के लिए प्रवेश लिया है तो लगता है सारा विश्विद्यालय मेरे स्वागत के लिए खड़ा हो गया है। विश्वविद्यालय के क्या विद्यार्थी क्या अध्यापक, सब लोग मेरे विश्वविद्यालय में प्रवेश से बहुत उत्साहित हैं। मुझे लगता है कि यह बदलाव की बयार है। कई अध्यापक बोलते पाए गए कि असली बदलाव तब आएगा जब उनकी कक्षा में भी ट्रांसजेंडर लोग पढ़ते नज़र आएंगे। मुझे आशा है कि वह दिन जरूर आएगा जब विश्वविद्याल और शहर के तमाम महाविद्यालय में भी एल.जी.बी.टी. समुदाय के लोग बिना भय के सब के साथ मिल कर पढ़ेंगे और आगे बढ़ेंगे और भारत के विकास में अपना खुलकर और ज्यादा योगदान देंगे।

भले ही मेरा चहुँ ओर से काफी स्वागत हो रहा है, अब आगे देखना होगा कि ट्रांसजेंडर लोगों के लिए विश्वविद्यालय अपने परिसर में किस तरह का बदलाव लाने वाली हैं। यह सच है कि मेरे पास बदलाव के लिए कई सुझाव हैं। समय समय पर प्रशाशन को उन सुझावों से अवगत करवाता रहूँगा। विश्वविद्यालय में प्रवेश के बाद मेरी जिम्मेवारी एल.जी.बी.टी. समाज के लिए और भी बढ़ जाएगी। मुझे अभी से कई विद्यार्थी संगठन और छात्र समुदाय अपने साथ मिल जाने के लिए संपर्क करने लगे हैं, जो कि अच्छा संकेत हैं।

लेकिन विद्यार्थियों का और समाज का कुछ असमाजिक तपका यह भी नहीं चाहते हैं कि हम जैसे लोग आगे बढे और उनकी बराबरी करें। मुझे ऐसे लोगों का भी सामना करना पड़ेगा। कक्षाएं शुरू होने के बाद मुझे यह भी देखना होगा कि मेरे साथ किसी भी तरह का भेदभाव और आपत्तिजनक टिप्पणियां न कसी जाएँ। उसके लिए ट्रांसजेंडर के लिए ‘ईवटीजिंग’ कमेटी का गठन करवाना भी मुद्दा रहेगा। इसी तरह के बहुत से मुद्दे हैं जो मैं धीरे-धीरे प्रशाशन से बताता रहूँगा और उनको पूरा करने के लिए दबाब बनता रहूँगा। हालाँकि ऐसी बहुत-सी सुविधाएँ हैं जो  प्रशाशन ने पहले से ही पूरी करने के बारे में बोल दिया है।
मैं आशा और कामना करता हूँ कि समाज का हर वर्ग इस बदलाव को स्वीकार करेगा।

(मैं पाठकों से अनुरोध करूँगा कि वह ‘ता’ या ‘ती’ के लैंगिक भेद से ऊपर उठ कर सोचें! मैंने इस लेख में हर जगह ‘ता’ (पुरुषवाचक ) का प्रयोग किया है )