संपादकीय ९ (३० सितम्बर, २०१४)

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तस्वीर: बृजेश सुकुमारन।

तस्वीर: बृजेश सुकुमारन।

इस अंक का विषय है ‘क्षणभंगुरता’।

लैंगिकता समानाधिकारों के लिए लड़नेवाले, और गुजरात प्राईड के सह-सर्जक स्वागत शाह कल ही कालवश हुए। उन्हें श्रद्धांजलि अर्पण करते हैं अहमदाबाद के धवल शाह, ‘कैसे कहें ‘स्वागत’ को ‘अलविदा’?’ में।

इस बार हम एक नया सदर शुरू कर रहे हैं, जिसका नाम है “इस रात की सुबह है”‘इट गेट्स बेटर’ ऑनलाइन प्रोजेक्ट के ढाँचे पर बनाई गई इस लेखमाला में यशस्वी, वयस्क समलैंगिक सीधे बात करते हैं एल.जी.बी.टी. नौजवानों, किशोरों और बच्चों से। ‘भले ही आज उन्हें स्कूलों और घरों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा हो; अपनी जान लेना या व्यसनों का शिकार होना इसका उत्तर नहीं है। आगे चलकर ज़िन्दगी में आपको समर्थन और साथी मिलेंगे। दुःख की अँधेरी रात का अंत होगा, अपने आप को पाने और अपना अस्तित्व क़ायम करने के उषःकाल के साथ। आज आपको लग रहा होगा कि कठिनाइयों की इस रात की कोई सुबह नहीं. लेकिन हमारी ज़िंदगियाँ इस बात का जीता-जागता सबूत हैं, कि इस रात की सुबह है. और हम चाहते हैं की उस सुबह तक आप इस अँधेरी रात से झूंझे, आप हार न मानें। यह इस सदर का सन्देश है। पहली कड़ी में ‘मिस्टर गे इंडिया’ सुशांत दिवगीकर अपनी जीवन गाथा बयाँ करके इस बात की गवाही देते हैं। इस सन्दर्भ में ‘खोने’ का सकारात्मक मतितार्थ है: डर, विवशता क्षणभंगुर हैं; उन्हें खोकर अपना आत्मविश्वास पाएँ।

इत्तफ़ाकन इसी जज़्बे का इज़हार हुआ है लाहौर निवासी हादी हुसैन की कहानी ‘ज़ीरो लाइन’ – एक पाक-भारत प्रेम कथा ‘ की चौथी कड़ी में। बचपन को याद करते हुए वे कहते हैं, काश तब अगर हमें यह मालूम होता कि हम इस दुनिया में अकेले नहीं थे। बल्कि हमारे इर्द-गिर्द हम जैसे कहीं लोग मौजूद हैं, हर दौर में रहे हैं। फ़क़त उनकी कहानियाँ, उनकी जिद्दो-जहद हम तक पहुँच नहीं पायी। अगर ऐसा होता तो कितना हौसला मिलता हमें। इतने साल जो हमने खुद से लड़ते, अपने रब से लड़ते गुज़ारे हैं, वह शायद उसी की बंदगी और अपनी ज़ात की तकमील में सर्फ़ हो जाते।

“प्रतिनिधित्त्व या अभिव्यक्ति?” में अक्षत शर्मा जायज़ा लेते हैं, बिगबॉस में सुशांत दिवगीकर को लेकर समलैंगिक समुदाय के कुछ हिस्सों में अशांति के माहौल का। मिस्टर गे इंडिया का ख़िताब जीतनेवाला जब कोई व्यक्ति बिग बॉस जैसी किसी स्पर्धा में हिस्सा लेने के लिए चुना जाता है, क्या वह उस समुदाय का प्रतिनिधित्त्व कर रहा होता है, या निजी तौर पर शरीक होता है? अगर वह प्रतिनिधित्व कर भी रहा हो, तो क्या यह उसका दायित्व है  कि वह अपना बर्ताव उस समुदाय के सभी लोगों की अपेक्षा अनुसार रखे? कुछ पलों के टी.वी. पर देखे जाने वाले बर्ताव से किसी की ज़िन्दगी पर कितना प्रभाव पड़ता है, यह आज के मीडिया माध्यमों की ताक़त की निशानी है। जिन्सी अभिव्यक्ति, प्रकटीकरण और अदृश्य रहने के निर्णयों के साथ जुड़े परिणाम… इन सब बातों पर बड़ी बहस हो रही है आज-कल। पढ़ें लेखक की राय।

बांग्लादेश के छायाचित्रकार नफीस अहमद गाज़ी के ‘कुदरती शनाख्त – एक तस्वीरी मज़मून’ की आखरी कड़ी भी इस अंक में है। ढलता सूरज, ट्रेन का इंतज़ार, अस्तित्व का सामना – चंद लम्हों को क़ैद करते हैं अपने कैमरे में नफीस।

पढ़िए प्रशांत जोशी की मनमोहक कविता बारिश’। कवि कहते हैं: वर्षा की राहत भी, आखिरकार, क्षणभंगुर ही है! ‘हो सके तो छुपा लेना मुट्ठी में दो बुँदे, क्या पता कल ये कही और बरसेगी?’।

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आपका विनम्र,
सचिन जैन
संपादक, गेलेक्सी हिंदी