“ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कथा” – श्रृंखलाबद्ध कहानी (भाग ४/५)

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गेलेक्सी हिंदी के अगस्त २०१४ के अंक में आपने पढ़ी थी हादी हुसैन की श्रृंखलाबद्ध कहानी “ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कथा” के पाँच कड़ियों की तीसरी कड़ी। प्रस्तुत है चौथी कड़ी:

पाक-भारत

पाक-भारत

मुहब्बत पर कभी किसी का भी ज़ोर नहीं चलता। यह तो खुद-ब-खुद, आप ही आप ज़ात के हर हिस्से को अपनी रौशनी से मुनव्वर कर देती है। इस की खलावत जीने का मक़सद बन कर रगों मैं दौड़ने लगती है और इंसान ऐसा महसूस करता है जैसे कि उसमें पहाड़ों से टकराने की ताक़त पैदा हो गयी है। या वह तूफानों का रुख मोड़ सकता है। ऐसा ही असर हुआ था मुझ पर तुम्हारी क़ुरबत का। मेरे अंदर-बाहर की फ़िज़ा ही बदल गयी थी।

कितनी हसीं सुबह थी वह भी। धुंद छट चुकी थी और सूरज की मद्धम-मद्धम रौशनी गई रात के नशे की मानिंद धीरे-धीरे चहारसु फैल रही थी। वह मदहोश -सी धुप तुम्हारे दोनों शानों पर यूँ विराजमान थी, गोया अपने गरम बोसो से तुम्हें सुबह-बखैर कह रही हो। उन अनगिनत बोसो में एक बोस मेरा भी था। जिस में वाबस्तगी का वह राज़ पिन्हा था जिस की गहराई को में उस वक़्त समझने से क़ासिर था। तुम्हारे उलझे बिखरे बालों से कुछ इश्क़ सा हो गया था मुझे। और जब में उनको सहलाने लगा तो तुमने मुस्कुराते हुए थोड़ी देर को अपनी आँखें खोलीं और मुझे अपने सीने से यूं चिमटा लिया जैसे कोई छोटा बच्चा अपने किसी पसंदीदा स्टफ्ड टॉय को बाहों में भर लेता है। यूँ किसी चाहने वाले की बाहों में, बे हिजाब, बे लिबास, रात के नशे में मधग़म, मेरे दिल का कोई ठिकाना न था। होठों पर मुस्कान भी थी और आँखों में नमी भी। उस लम्हे जी में आया के बस आँखें मूँद लूँ, उन गुज़रते पलों को थाम लूँ और उस होनी को टाल दूँ जो जुदाई बन कर हमारी राह तक रही थी।

तुम्हें शायद अंदाज़ा नहीं है कि यह तुम्हारी क़ुरबत का एहसास ही है जो मेरे जीने की सब वजूहात में अफज़ल तरीन है। और यह भी मत समझना कि यह एहसास महज़ जिस्मानी संजोग का नतीजा है। यह तो उन ला-तादाद बातों, मुलाक़ातों, कहानियों, आंसूँओं और कहकहों की बदौलत है जिस में हम दोनों ने एक दूजे को मुक़म्मल दयानतदारी और खलूस से चाहा था। इतनी ईमानदारी कि हम एक दूजे के सामने बिलकुल औरयाँ थे और हमारे माबैन मुश्तरका एतमाद और भरोसे की वह शफाफ चादर तनी हुई थी। जिस के आर-पार किसी अमावस की रात में भी देखा जा सकता था। किसी से मोहबत हो तो आप दिल बाँट लेते हैं, जज़बात बाँट लेते हैं, रूह की भी तक़सीम हो जाया करती है। मगर तुम ने तो मेरा पागलपन भी बाँट लिया था। तुम से मिल कर एहसास हुआ कि मैं मुख़्तलिफ़ नहीं हूँ, मेरे सारे ताज़ाद, मेरे सब फ़र्क़ यूँ हवा हो गए जैसे कभी मौजूद थे ही नहीं।

कितनी अजीब बात है न कि जिस मोहबत का वजूद अज़ल से मौजूद था, उसे हर ज़माने में नज़र अंदाज़ ही किया गया। क़ुर्बत के तालुक के लाज़मी शर्त अफ़ज़ाइयिश-ए-नसल को ठहराया गया और यूँ मर्द और औरत के संजोग को ही मोहबत का नाम देकर, कभी हीर-राँझा, कभी सस्सी-पुन्नो; कभी सोहणी-महिवाल और कभी लैला-मजनू कह कर इंसानी तारीख का हिस्सा बना दिया गया। जब भी मोहबत की पाकीज़गी और सच्चाई की बात होती तो इन्हीं को मिसाल बनाकर पेश किया जाता। आखिर इन सब में हम दोनों कहाँ थे? बल्कि हम ‘जैसे’ कहाँ थे! ऐसा लगता है जैसे हमारी मुहब्बतें किसी ना-मालूम खित्ते में वाक़े गुमनाम जज़ीरों की सी हैं जिन्हें तारीख़ के एटलस पर ज़ाहिर करना कभी ज़रूरी ही नहीं समझा गया। और अगर कभी कहीं ग़लती से भी ऐसे कोई दो नाम जुड़ते, कहीं किसी रूमी का किसी शम्स के साथ; किसी शाह हुसैन का किसी माधो लाल के साथ। जब भी इनका ज़िक्र आता तो उसे इश्क़-ए-हक़ीक़ी के खाते में डालकर ऐसी न जाने कितनी मोहब्बतों का निशाँ ही मिटा दिया जाता।

तुम्हें याद है न जब हम छोटे थे तो कितना डरते थे। न सिर्फ अपने आप से बल्कि अपनी हक़ीक़त के किसी दुसरे पर ज़ाहिर होने से भी। हर वक़्त ख़ौफ़ज़दा रहते थे। हर वक़्त यह धड़का लगा रहता था कि कहीं किसी को पता न चल जाए। कहीं सब हमें दुत्कार न दें। तब अगर हमें यह मालूम होता कि हम इस दुनिया में अकेले नहीं थे बल्कि हमारे इर्द-गिर्द हम जैसे कहीं लोग मौजूद हैं। हर दौर में रहे हैं। फ़क़त उनकी कहानियाँ, उनकी जिद्दो-जहद हम तक पहुँच नहीं पायी, तो कितना हौसला मिलता। इतने साल जो हमने खुद से लड़ते, अपने रब से लड़ते गुज़ारे हैं, वह शायद उसी की बंदगी और अपनी ज़ात की तकमील में सर्फ़ हो जाते। इसीलिए मैंने यह फैसला किया है कि हम अपनी कहानी ज़रूर लिखेंगे।

इस मोहबत को समाज के डर से कोई गुनाह समझ कर छुपाएँगे नहीं, बल्कि इस रौशनी को चहारसु बिखेर देंगे। ताकि फिर किसी को यह ना लगे की मुहब्बत करना जुर्म है। सरहदें पार करना गैर कानूनी है। और समाजी रिवायात की दीवार को गिराना गुनाह है। वह क्या खूब कहा था न बुल्ले शाह ने भी, “मसजिद ढा दे मंदिर ढा दे , ढा दे ढैनदा जो कुछ ढा दे, एक बन्दे दा दिल ना ढावी, रब दिलां विच रेह्न्दा” [मसजिद तोड़ दो मंदिर तोड़ दो तोड़ दो जो कुछ भी टूट सकता है। बस किसी इंसान का दिल ना तोडना क्योंकि रब दिलों में रहता है।] बस अगर इतनी सी बात लोगों को समझ आ जाये तो इस दुनिआ से कई फसाद, कई दंगे, क्यी जंगें खत्म हो जाएँगीं।

गेलेक्सी हिंदी के अक्तूबर २०१४ के अंक में पढ़िए हादी हुसैन की श्रृंखलाबद्ध कहानी “ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कथा”  के पाँच कड़ियों की पाँचवी और आख़री कड़ी।

Hadi Hussain

Hadi Hussain is a social researcher, writer and activist who is continuously struggling to resist, exist, indigenize and decolonize. His interests include intersectional politics, feminism, South Asian LGBT discourse, body politics, cultural anthropology, peace initiatives, decolonization studies and transnational indigenous social movements