“ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कथा” – श्रृंखलाबद्ध कहानी (भाग ५/५)

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गेलेक्सी हिंदी के सितम्बर २०१४ के अंक में आपने पढ़ी थी हादी हुसैन की श्रृंखलाबद्ध कहानी “ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कथा” के पाँच कड़ियों की चौथी कड़ी। प्रस्तुत है पांचवी और आख़री कड़ी:

तुम्हारा इंतज़ार करूँगा...। तस्वीर: बृजेश सुकुमारन।

तुम्हारा इंतज़ार करूँगा…। तस्वीर: बृजेश सुकुमारन।

आज पूरे दो महीनें हो गयें हैं, मुझे वीज़ा के लिए अप्लाई किए हुए। मगर अभी तक कोई जवाब नहीं आया। और मेरे पास इस इंतज़ार के सिवाय और कुछ भी नहीं है। यह इंतज़ार भी कितना कठिन जसबा होता है। आप किसी सलीब पर चढ़े रहते हैं, जिसके एक पार जान-बक्षी की उम्मीद होती है और दूसरे पार मसलूफ किए जाने के अज़लीयत का खौफ। हर बार जब मैं वीज़ा के लिए दरख़्वास्त जमा करता हूँ, तो उसी वक़्त से गिनती शुरू हो जाती है। ‘वीज़ा एक्सेप्टेड’ या ‘वीज़ा रिजेक्टेड’ की कश्मकश एक अज़ाब बनकर दिन रात मेरे सर पर सँवार रहती है। जान देना शायद इससे ज़्यादा आसान काम है। मगर इस तक़लीफ़ से गुज़रना बड़ा मुश्किल काम। यूँ तो ज़िन्दगी का धारा चलता रहता है, रोज़ सुबह उठना, दफ्तर जाना, खाना-पीना, दोस्तों से मिलना-मिलाना, कुछ भी तो नहीं रुकता।

और फिर रात होती है। जब बिस्तर पर करवटें बदलते-बदलते न जाने कब ख़त्म हो जाती है। उन करवटों में कहीं एक दुःख, एक दर्द पिन्हा है, जिसकी वजह तुमसे दूरी है, जो सही नहीं जाती। कभी-कभी जी में आता है कि किसी दिन ऐसे ही वाहगा पहुँच जाऊँ। फ़ौजियों को कहूँ कि या तो मुझे गोली मार दो, या मुझे जाने दो। मगर मुझे यूँ इंतज़ार के कर्ब में मुब्तला मत रहने दो। मुझे मालूम है कि सरहद-पार इसी कैफ़ियत का शिकार तुम भी हो। अगर मैं इस जां-कनी की अज़ीयत में मुब्तला हूँ, तो तुम भी हर लम्हा क़तरा-क़तरा जीने के दर्द से आशना हो। कई बार जी में आता है कि वह मुश्किल फासला मैं खुद ही तय कर लूँ, जिसका हदशा हमेशा से हमारे दिलों मैं मौजूद है, मगर शायद हम पहल करने से हिचकिचाते हैं। तुम्हें आज़ाद कर दूँ, या यूँ कहो के खुद आज़ाद हो जाऊँ। फिर हमारा एक दूजे पर कोई हक़, कोई फ़र्ज़, कोई गुमाँ, कोई भ्रम, कुछ भी न रहे।  तुम अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ जाओ, और मैं अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ जाऊँ, और हम अपनी इस मुहब्बत को जिस पर समाज और हुकूमतों के पहरे हैं, को हमेशा के लिए खैरबाद कह दें। कभी भूले-बिसरे जो याद आए, तो बस एक हलकी-सी मुस्कुराहट बनकर रह जाए। वैसे भी हम दोनों अब उम्र के उस हिस्से में हैं, जहाँ शायद जसबाती होने से हक़ीक़त-पसंद होना ज़्यादा ज़रूरी है। यूँ एक-दूजे को बार-बार एक ना-ख़त्म होने वाली तक़लीफ़ में मुब्तला करना कहाँ की शराफत है?

या फिर यूँ करते हैं, कि कहीं दूर भाग जाते हैं, किसी ऐसे देश जहाँ पर एक पाकिस्तानी और एक हिन्दुस्तानी आज़ादी से साथ-साथ रह सकते हों। जहाँ समाज, मज़हब, क़ौमी शनाख्त, और सियासत की कोई मौहर दरकार न हो। जहाँ रहने से हमारा मुश्तरका माज़ी किसी डरावने ख़्वाब के मानिंद, हवा हो जाए और हमारा मुस्तक़बिल ख़ुशी का पयम्बर बन कर हमें अपनी आग़ोश में ले ले। अलबत्ता क्या यह सब मुमकिन है? क्या तुम ऐसा चाहते हो? क्या मैं ऐसा चाहता हूँ? क्या हमारी मुहब्बत में इस इम्तेहान को भी इम्तियाज़ी नंबरों से पास करने की हिम्मत और ताक़त मौजूद है? इन सवालों के जवाब हमें मिलकर ढूँढने हैं। हमें अपने इस तालुक को कहाँ तक लेकर जाना है, जाना भी है या नहीं, इसका फैसला करना बहुत ज़रूरी है।

गो के यह सब लिखने में जितना आसान नज़र आ रहा है, इसपर अमल करना उतना ही मुश्किल काम है। तुमसे दूरी ही एक अज़ाब सी लगती है अगर तुम्हें खो दिया तो पता नहीं फिर जीया जाएगा भी के नहीं। पता है कल रात मैं दाता दरबार चला गया। एक अजीब-सी बेचैनी थी और जी में आया कि बस वहाँ जाकर ही सुकून मिल सकता है। पता नहीं कितने सालों बाद मैं वहाँ गया था। आधी रात का वक़्त था मगर इसके बावजूद अक़ीदतमंदों का एक जम-इ-ग़फ़ीर था, जो हाथ जोड़े, सर झुकाए, आँसू बहाए, बस दुआएँ माँगे जा रहा था। मैं कोने में एक सतून से लगकर बैठ गया और चाहनेवालों के इस हजूम को देखने लगा। सबकी शक्लें अलग थी, पहनावा मुख़तलिफ़ था, और यक़ीनन दुआएँ भी मुनफ़रिद क़िस्म की होंगी मगर उनकी अक़ीदत और यक़ीन-इ-कामिल के उनकी मुरादें ज़रूर भर आएँगी। उन सब के चेहरों से यकसाँ तौर पर झलक रहा था। फ़िज़ा गुलाब के पंखुड़ियों और अगरबत्तियों की खुश्बू सी मुअत्तर थी। मंज़र में धीमे-धीमे क़ुरआन की तिलावत करने वालों की आवाज़ें भी समरूप हो रहीं थीं। बड़ा अजीब सा लम्हा था वह। यूँ लगा के क़बूलियत की घड़ी हैं। जैसे इस लमहे रब ज़्यादा नज़दीक आ गया है और पूछ रहा है, ‘क्या चाहते हो?’। मैंने तुम्हें माँग लिया। सही किया न?

देखो ज़रा! तुम से बातें करते-करते वक़्त गुज़रने का पता भी नहीं चला, और दिन चढ़ आया है। सोच रहा हूँ, इस ख़त को ख़त्म करके लिफ़ाफ़े में डालकर अपनी मेज़ पर रख दूँ और फिर वाहगा-अटारी बॉर्डर के सिमट निकल जाऊँ। वहाँ दोनों सरहदों के दरमियाँ एक छोटा-सा क़ता है जिसे सब ‘नो मैन्स लैंड’ कहते हैं, जिसके बीचो-बीच, दोनों मुल्कों की आखरी सरहद, जीरो-लाइन, पास होती है। पता है, वहाँ जाने के लिए, किसी पासपोर्ट, किसी विज़े, किसी मौहर की ज़रूरत दरकार नहीं होती। बस दिल-भर मुहब्बत चाहिए होती है। तुम वहाँ आ जाना। मैं इन सरहदों के पार उस खित्ते में तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।

फ़क़त तुम्हारा,
हादी

Hadi Hussain

Hadi Hussain is a social researcher, writer and activist who is continuously struggling to resist, exist, indigenize and decolonize. His interests include intersectional politics, feminism, South Asian LGBT discourse, body politics, cultural anthropology, peace initiatives, decolonization studies and transnational indigenous social movements