“ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कथा” – श्रृंखलाबद्ध कहानी (भाग ३)

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गेलेक्सी हिंदी के जुलाई २०१४ के अंक में आपने पढ़ी थी हादी हुसैन की श्रृंखलाबद्ध कहानी “ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कथा” के पाँच कड़ियों की दूसरी कड़ी। प्रस्तुत है तीसरी कड़ी:

"ज़ीरो लाइन - एक पाक-भारत प्रेम कहानी", भाग ३।

“ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कहानी”, भाग ३

अगस्त का महीना भी शुरू हो गया है। गलियों बाज़ारों में झंडियां और बिल्ले खरीदने वालों की हड़बड़ी मची हुई है। कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि आया हम सब को वाक़ई पाकिस्तान बनने की इतनी ख़ुशी है, या यह भी बाक़ी सब त्यौहारों और क़ौमी दिनों की तरह फ़क़त यौम-ए-नुमाइश है जहाँ जज़बे से ज़्यादा दिखावे को तरजीह दी जाती है। जहाँ इंसानी जज़बात की नहीं, सियासी मुफ़ादात की जंग लड़ी जाती है। मैं अगर पाकिस्तान का झंडा घर की छत पर या गाडी-मोटरसाइकल पर लगा लूँ, फेसबुक पर प्रोफाइल तस्वीर बदल दूँ, मुँह पर हरा रंग चढ़ाकर लाहौर के मॉल रोड पर साइलेंसर निकाल कर चिंघारती हुई मोटरसाइकल पर नारे मारता निकल जाऊँ तो सब मुझे कितना मुहिब-ए-वतन समझेंगे। मगर अगर मैं इस आज़ादी के पस मंज़र में लाखों लाशों, इस्मत दरियों, क़ुर्बानियों और हिजरत की अज़ियतों का अगर ज़िक्र करूँ जिसका शिकार सरहद के दोनों तरफ के वासी हुए थे और अपने बुज़ुर्गों की सियासी समझ-बूझ पर सवाल उठाऊँ तो मुझे फौरन से पेहेले रॉ का एजेंट कहा जाएगा।

सोचता हूँ मेरी दादी आज ज़िंदा होतीं तो क्या उसे भी गद्दार-ए-वतन कहा जाता? वह औरत जिसने अपनी बेदखली को हिजरत समझ कर, जम्मू से लाहौर तक का तवील सफर अपने पैरों पर किया था। शायद पाकिस्तान की सर-ज़मीन पर क़दम रखते ही सजदा-ए-शुक्र भी अदा किया होगा। उस औरत को यह तक़सीम कुछ ज़यादा पसंद न थी। दादी की जम्मू में बड़ी सादा-सी ज़िन्दगी थी। जो नया मुल्क बन रहा था और सरहदों और दिलों का जो जोड़-तोड़ हो रहा था वह उस सब से ला-तालुक़-सी थी। उसे लगता था कि इन सियासी चीज़ों से उसे कोई फरक नहीं पड़ता क्यूंकि वह तो महज़ एक आम-सी, सादा-सी औरत थी।

बेचारी मेरी दादी! यह नहीं जानती थी कि आम आदमी ही बड़े लोगों की सियासत का शिकार होता है। जब अगस्त की एक  अँधेरी रात में, उसे गठरी में चंद कपड़े बाँधे, अपनी एक दूध-पीती बच्ची को सीने से लगाये अपना बसा-बसाया घर छोड़ना पड़ा, तब शायद उसे यह बात समझ आयी होगी। मुझे याद है दादी को मरते दम तक लगता था कि एक दिन वह अपने जम्मू वापस ज़रूर जाएगी जहाँ उसका घर, उसके खेत, उसके पहाड़, उसकी नदियाँ, उसके  चिनार सब उसके मुन्तज़िर  हो गए। बिलकुल वैसे ही जैसे वह उनको छोड़ कर चली गयीं थीं। वक़्त उसके लिए जैसे थम-सा गया था जम्मू मैं।

गो के बेवतनी के सिवा कोई और सोहबत उन्होंने नहीं झेली थी मगर फिर भी अगस्त उन्हें हमेशा उदास कर दिया करता था। मुझे याद है बहुत साल पहले जब मैं छोटा-सा था और दादी हमेशा की तरह मुझे जम्मू और श्रीनगर के क़िस्से-कहानियाँ बड़ी रखबत से सुना रहीं थीं। तो अचानक बोली, “बाबे ने वंड पाकर चंगा नहीं कीता” (जिन्नाह ने तक़सीम करवा कर अच्छा काम नहीं किया)। मुझे उनकी वह बात बिलकुल भी पसंद नहीं आयीं थीं। क्यूंकि हमें तो स्कूल में यही पढ़ाया जाता था कि १९४७ में जो कुछ हुआ वह मुसलमानों के लिए बेहतर था। और यह भी के जिन्नाह हम सब के क़ाइद हैं जिन से कोई भी ग़लती नही हो सकती। मुझे समझ नहीं आ रही थी कि दादी जिन्नाह के मुतालिक ऐसा कैसे कह सकती हैं।

जब मैं ने इस बात पर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया तो वह चुप-सी  हो गईं। नज़रें आसमान की तरफ यूँ उठा लीं जैसे कोई दुआ कर रहीं हों। फिर उन्होंने अपने चेहरे पर हलकी सी मुस्कराहट लाते हुए मेरी जानिब देखा तो मुझे अंदाज़ा हुआ के उनकी आँखों में आँसू थे। और उन आंसुओं में बेबसी, बेवतनी और बे सरो-सामानी का वह क़र्ब था जो अगर किसी पहाड़ पर पड़ता तो वह शायद रेज़ा-रेज़ा हो जाता। दादी ने जम्मू तो छोड़ दिया था, मगर जम्मू ने  दादी को नहीं छोड़ा था। आज पीछे मुड़कर जब इस वाक़िए के बारे में सोचता हूँ तो समझ आती है कि यह महज़ सरहदों की तक़सीम नहीं थी बल्कि इंसानी वजूद की तक़सीम थी। जिस-जिस इंसान ने सरहद की दुसरे पार सफर किया वह अपने वजूद का एक हिस्सा वहाँ पीछे छोड़ आया। कभी-कभी मुझे लगता है कि दादी की रूह अभी भी कहीं जम्मू के गली-कूचों में भटक रही होगी।

सोच रहा हूँ इस साल १४ अगस्त को दादी की क़ब्र पर जाऊँ और जाकर पूछूँ कि हम जहाँ सी आए थे आखिर वहाँ वापसी के रास्ते हम पर क्यों बंद कर दिए गए? हम वहां रह जाते तो क्या होता और अब जो आ गए हैं तो क्या हुआ है? क्या यह वाक़ई में “पाक लोगों की सरज़मीन’ है? क्या यहाँ बग़ैर किसी क़िस्म के तफ़रक़े के हर इंसान को जीने और ज़िन्दगी गुज़ारने का यकसां हक़ हासिल है? यहाँ रंग-ओ-नस्ल की बुनियाद पर लोगों का क़त्ल-ए-आम नहीं होता? कितने सारे सवाल हैं जो मैं दादी से पूछना चाहता हूँ मगर वह कैसे इनका जवाब दे पायेगी? वह तो मनो-मट्टी तले अब्दी नींद सो रही है और मुझे यक़ीन है कि अगर आज वह ज़िंदा होती तो शायद इस मुल्क के हालात देख कर एक बार फिर मर जाती।

मुझे लगता है हमारी मोहबत भी मेरी दादी की ना-आसूदा ख्वाइशों का नतीजा है। जो काम वह १९४७ के बाद इस सरहद को पार करके नहीं कर पायी, वह अब, उसका पोता करेगा, तुम्हारे लिए।

गेलेक्सी हिंदी के सितम्बर २०१४ के अंक में पढ़िए हादी हुसैन की श्रृंखलाबद्ध कहानी “ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कथा”  के पाँच कड़ियों की चौथी कड़ी।