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प्रस्तुत है कथा का पाँचवा और आखरी भाग:

मनीषा को कौन सा इस बात का जवाब पता था लेकिन मनीषा की वकालत करने का वीणा डॉक्टर सीमा ने उठा रखा था। डॉक्टर सीमा ने श्याम और मनीषा को शांत कर बैठने का इशारा कर इस मुश्किल का हल निकाला शुरू किया, बोलीं, ‘‘देखो श्याम ये धैर्य से काम लेने समय है। तुम्हें हकीकत को समझना होगा। मनीषा तुम्हारे साथ नहीं रह सकेगी। तुम अगर सच में इसका भला चाहते हो तो इसे अपने मनपसंद व्यक्ति के साथ रहने दो। इससे तुम और मनीषा दोनों ही खुशहाल जिंदगी बिता सकोगे।

श्याम हताशा-भरे स्वर में बोला, ‘‘डॉक्टर, मैं तो मान जाऊँगा लेकिन घरवालों को कैसे समझाऊँगा? वे लोग तो इसे अपनी इज्जत से जोड़कर देखते हैं। दो दिन में शादी होकर टूट जायेगी तो आप खुद सोचो क्या होगा?” श्याम जो बात कह रहा था वो बात डॉक्टर सीमा को भी सही लग रही थी। लेकिन कोई तो उपाय खोजना ही था। डॉक्टर सीमा ने सोचते हुए कहा, ‘‘श्याम क्या तुम्हारे पास कोई ऐसी तरकीब नहीं जिससे यह समस्या बड़े आराम से हल हो सके।

'संगिनी' - एक कहानी (भाग ५/५) | छाया: अमान अलताफ़ | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी|

‘संगिनी’ – एक कहानी (भाग ५/५) | छाया: अमान अलताफ़ | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी|

श्याम का दिमाग तो इस वक्त काम ही नहीं कर रहा था। लेकिन थोड़ा सोचने पर उसे कुछ याद आया तो बोल पड़ा, ‘‘डॉक्टर, ये हो तो सकता है लेकिन मुझे कुछ चाहिये। मैं अपनी नौकरी से बीस दिन की छुट्टी लेकर आया था। अभी उसमें कई दिन बाकी हैं, अगर मैं जल्दी भी जाना चाहूँ तो घरवाले मुझे इतनी जल्दी नहीं जाने देंगे। अगर मुझे आप दो-चार दिन का टाइम और दें तो मैं नौकरी पर जाते समय घरवालों से मनीषा को साथ ले जाने की बात कह दूँगा। फिर मनीषा का मन जहाँ भी जाने का हो, वो जाये। मैं जैसे-तैसे अपने घरवालों को समझा दूँगा, लेकिन उसके घरवालों को मनीषा को खुद ही बताना पड़ेगा।

सीमा ने मनीषा की तरफ देखा, उसे इस बात से कोई परेशानी नहीं थी। वो तो मन ही मन श्याम का शुक्रिया अदा कर रही थी कि वो इतनी जल्दी उसकी बात मान गया। अभी कोई और बात होती उससे पहले ही एक औरत डॉक्टर सीमा के केबिन में आ पहुँची। डॉक्टर सीमा ने उसे देखते ही पहचान लिया और मनीषा और श्याम की ओर देख बोलीं, ‘‘इनसे मिलो, ये रूपा हैं। जिनके बारे में थोड़ी देर पहले मैंने आप लोगों को बताया था। और रूपा ये मनीषा और श्याम।

'संगिनी' - एक कहानी (भाग ५/५) | छाया: अमान अलताफ़ | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी|

‘संगिनी’ – एक कहानी (भाग ५/५) | छाया: अमान अलताफ़ | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी|

रूपा ने श्याम और मनीषा से बारी-बारी से हाथ मिलाया। रूपा दिखने में ठीक-ठाक थी। काफी देर बातें होती रहीं तो पता पड़ा रूपा एक बड़ी कम्पनी में काम करती थी और उसके पास किसी चीज़ की कमी नहीं थी: सिवाय एक साथी के। जब मनीषा और श्याम सीमा से विदा ले चल दिये तो रूपा ने मनीषा को गले से लगाकर उसका मुख चूमा था। ये सब मनीषा को बड़ा अच्छा लगा था।

घर आ श्याम ने एकदम सामान्य रहने की खूब कोशिश की थी। लेकिन जो ज्वाला मन में जल रही थी वो उसे चैन से न रहने दे रही थी। मनीषा के दिल में रूपा से मिलने की खुशी थी और श्याम को मनीषा से बिछड़ने का दुःख। श्याम को तो यह सब सपने-जैसा लग रहा था। जागते में भी उसे यकीन न होता था कि ये सब सच है।

श्याम और मनीषा एक कमरे में तो सो रहे थे लेकिन न तो दोनों में कोई ज़्यादा बात होती थी, न हि एक साथ सोना होता था। करीबन चार दिन बाद श्याम ने घरवालों को अपने जाने और साथ में मनीषा को ले जाने के बारे में बता दिया। पूरा घर श्याम की इस बात से नाराज़ हो रहा था। सब कहते थे कि शादी के बाद इतनी जल्दी घर से जाना ठीक नहीं। ऊपर से श्याम इस घर की नई बहू को भी तो साथ लेकर जा रहा था।

'संगिनी' - एक कहानी (भाग ५/५) | छाया: हृषिकेश पेटवे | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी|

‘संगिनी’ – एक कहानी (भाग ५/५) | छाया: हृषिकेश पेटवे | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी|

बड़ी मुश्किल से श्याम मनीषा को ले घर से निकल पाया। घरवालों ने अपनी बहू के लिये काफी सामान रख दिया था। कहते थे बहू को कोई परेशानी नहीं आनी चाहिये। साथ में जल्दी ही छुट्टी लेकर बहू को घर लेकर आने की कई नसीहतें श्याम को मिल चुकी थीं। श्याम मनीषा को लेकर सीधा डॉक्टर सीमा के क्लिनिक पर जा पहुँचा।

वहाँ डॉक्टर सीमा के साथ-साथ रूपा भी मौजूद थी, जो अपनी जीवन की संगीनी मनीषा को लेने आयी थी। थोड़ी देर बातचीत होने के बाद श्याम उठकर खड़ा हुआ और रूपा से बोला, ‘‘बहिन जी, मनीषा का ख्याल रखना, अब ये आपकी ज़िम्मेदारी है।रूपा ने हाँ में सिर हिला दिया। फिर श्याम ने मनीषा की तरफ देखा और बोला, ‘‘मनीषा अपने घर जरूर खबर कर देना, और अपना ख्याल रखना। अच्छा अब मैं चलता हूँ।

इतना कह श्याम मुड़ने को हुआ लेकिन मनीषा भावुक हो उसके पैरों में गिर पड़ी और बोली, ‘‘मुझे माफ कर देना, मेरी वजह से आपको बहुत परेशानी उठानी पड़ी। आप आदमी नही देवता हैं।इतना कहते-कहते मनीषा का गला भर आया।

'संगिनी' - एक कहानी (भाग ५/५) | छाया: मुरली रमण | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी|

‘संगिनी’ – एक कहानी (भाग ५/५) | छाया: मुरली रमण | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी|

भावुक तो श्याम भी हो रहा था, लेकिन वो इस वक्त संभल कर रहा और मनीषा को अपने पैरों से अलग कर उसका कंधा थपथपाया फिर बोला, ‘‘ऐसा कुछ नहीं है, और इस सब में तुम्हारी गलती भी नहीं। कौन सा यह सब तुमने जान-बूझ कर किया? जो भगवान ने तुम्हें बनाया तुम वैसी ही हो सकती हो न।इतना कह श्याम अपना बैग उठा बाहर निकल गया।

सारे लोग उसे विदा करने बाहर तक आये। मनीषा की आँखें गीली थीं। श्याम ने एक भी बार पलट कर नहीं देखा। शायद अपनी आँखों में आये आंसुओं को किसी को दिखाना नहीं चाहता था। सीधा गाड़ी में बैठा और चला गया। मनीषा और रूपा भी डॉक्टर सीमा से विदा ले अपनी जगह चल दिये। मनीषा ने पहले डॉक्टर सीमा के पैर छूये फिर गले से लिपट गयी थी।

उसके लिये डॉक्टर सीमा किसी देवी से कम नहीं थी। डॉक्टर ने भी मनीषा की आगे की जिन्दगी की खुशी के लिये आर्शीवाद दिया। रूपा मनीषा की बाहों में बाहें डाले अपने घर ले गयी। आज मनीषा को अपनी शादी होने जैसा अनुभव हो रहा, और आज की रात अपनी सुहाग रात।

(समाप्त)

Dharmendra Rajmangal

धर्मेन्द्र कहानियां लिखते हैं। अब तक उनकी १७० कहानियां और एक उपन्यास 'मंगल बाज़ार' प्रकाशित हुए हैं। कक्षा ६ से उन्होंने लिखने की शुरुआत की और आज तक लिखते आ रहे हैं। वे अलीगढ़ शहर में रहते हैं।