“ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कथा” – श्रृंखलाबद्ध कहानी भाग १

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प्रस्तुत है हादी हुसैन की श्रृंखलाबद्ध कहानी “ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कथा”  के पाँच कड़ियों की पहली कड़ी:

क़फ़स-ए-मुहब्बत...

क़फ़स-ए-मुहब्बत…

रात के तीन बज रहे हैं और मैं खिड़की के पास सोफे पर लेटा ढ़लती रात के चाँद को देख रहा हूँ। कमरे के दूसरे कोने में लैपटॉप पर श्रुति सडोलीकर राग देस में “आली जा तुम परदेस” गा रहीं हैं। और मुझे मुसलसल यह एहसास हो रहा है जैसे श्रुति, श्रुति नहीं; मैं हूँ। राग देस, राग देस नहीं; मेरे वजूद की आवाज़ है। और आली जा! वह तो तुम हो। बाक़ी बचा परदेस; तो वह यह चार सौ तेईस किलोमीटर का फासला है, जो लाहौर-दिल्ली के दरमियाँ सदियों की सी मुसाफात सा है। इस पहर सब कुछ इतना परसुकून, ख़ामोश और मुक़द्दस सा है कि दिल तुम से बेतक़ल्लुफ़ होना चाह रहा है। मेरा दिल चाह रहा है के तुम्हारे घुंगराले बालों की लटों को अपनी उँगलियों में लपेट कर तुम्हें अपने और भी क़रीब कर लूँ। और तुम्हारे नर्म होंठों पे अपनी मुहब्बत की मोहर सब्त कर दूँ। जिस के बाद अलफ़ाज़ के इस्तेमाल की कोई गुंजाइश ही न बचे। कितना आज़ाद, कितना खुदमुख्तार-सा लमहा है यह। ऐसा लगता है कि हमारे दरमियाँ जो सड़सठ साला पुरानी तक़सीम और उसके नतीजे में मारज़ वजूद में आनेवाला यह बॉर्डर, वागाह-अटारी बॉर्डर, जैसे मौजूद ही नहीं। तुम तक पहुँचने के सब रस्ते इस लमहे मुझे अपने इख़्तियार में मालूम होते हैं। पता नहीं क्यों मगर यह एहसास रात के बस इसी पहर महसूस होता है। शायद इसलिए कि इस पहर रब ज़्यादा नज़दीक आ जाता है या फिर हम उसके पास पहुँच जाते हैं। और यह क़ुर्बत का एहसास ही हमें अपने महबूब के यहाँ मक़बूल कर देता है। बाज़ लोग इस वक़्त उठकर नमाज़ पढ़ते हैं और बाज़ मेरी तरह किसी खिड़की में बैठे महबूब से वसल के इंतज़ार में होते हैं। और मुझे पता है की सरहद पार तुम भी ऐसे ही बेक़रार हो।

मीर ने भी क्या ख़ूब कहा है। सख़्त काफ़िर था जिसने पहले मीर मज़हब-ए-इश्क़ इख़्तियार किया। और वह रब जिसने खुद इश्क़ किया, आज उसी के बन्दे हमारी मुहब्बत की राह में काँटें बिछाये बैठे हैं। अगर कभी रब इंसान बनकर ज़मीन पर उतरा तो मैं उससे ज़रूर पूछूँगा, कि उसने आखिर हम दोनों को मिलवाया ही क्यों था अगर अलग करना मक़सूद था। हमारे दिलों में इस मुहब्बत नाम के जज़्बे का जनम हुआ ही क्यों, अगर नफरत और हिज्र के सायों में उसे जीना था। रब इंसान होता तो उसे पता चलता कि मुहब्बत करने वालों को मौत नहीं मारती, जुदाई मार देती है। और यही जुदाई शायद उसने हमारे मुक़द्दर में भी लिख दी थी। चलो यूँ करते हैं कि रब से लड़ते हैं। तुम अपनी मुहब्बत इकट्ठी करो, मैं अपनी मुहब्बत इकट्ठी करता हूँ। फिर देखते हैं कैसी हमारी मुहब्बत झुठलाई जाती है। मगर पता है क्या? हम मिलकर शायद रब से तो लड़ लेंगे। मगर उसके बनाये बन्दों के वज़ा किये हुए क़वानीन और उसूलों  से नहीं लड़ सकते। जिनके यहाँ हमसाया मुल्क से आनेवाली हवा भी जासूस समझी जाती है। इनके रहते रब भी हमें वीज़ा नहीं दिला सकता। कितनी अजीब बात है न… कि जिसके इख़्तियार में सब कुछ है वह भी इनके आगे बेबस है। क्या फायदा हुआ ऐसे रब का… है न?

अस्तग़फ़ार! अब कहीं ऐसा न हो मेरी इस नादानी को मुश्रिकाना हरकत समझकर रब हमें सज़ा देने के खातिर उस सावन ऋतु को रोक ले जिसकी बूंदों में हम एक दुसरे को ढूँढ लिया करते हैं। कहीं उस क़ौस-ए-क़ज़ा की सतरंगी कुमान को ख़त्म न कर दे, जिसे पुल बनाकर हम बग़ैर किसी विज़े के एक दूसरे तक आन पहुँचते हैं। ये सब बातें कितनी ड्रामाई-सी लगती हैं न? हमारा यूँ अचानक से एक दिन घूमते-घुमाते आमने-सामने आन खड़ा होना. सोचता हूँ अगर उस दिन ऐन उस वक़्त मैं जंतर-मंतर न होता, कहीं और होता; अगर मैं वहाँ तुम्हारे जाने के बाद आता या तुम्हारे आने से पहले निकल गया होता, बस एक उस मख़्सूस लमहे में न होता तो आज हमारी ज़िंदगियाँ कितनी मुख़्तलिफ़ होतीं। मेरे कल्चरल एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत दिल्ली आना और तुम्हारा यूँ उस जगह आ जाना महज़ इत्तफ़ाक़-सा लगता है। मुझे याद है, कैसे भूरे रंग के कुरते में तुम चिल्ला-चिल्लाकर नारे लगा रहे थे. “कौनसा कानून सबसे बदतर? तीन सौ सतत्तर, तीन सौ सतत्तर!”

एहतजाज के बाद जब तुम उस घने पीपल के साये में आँखें मूँदे बैठे थे, तो कितने मुक़द्दस लग रहे थे। मुझे उस वक़्त यूँ लगा जैसे सिद्धार्थ निर्वाण हासिल करने के लिए अपने भीतर की गुथलियाँ सुलझा रहा है। और उस सब में जैसे मेरे अपने वजूद की गिरहें खुलती जा रही हैं। मैं तुम्हारे तिलिस्म में मबहुत खड़ा तुम्हें तके जा रहा था। जब एकदम तुमने आँखें खोल दी और मेरी जानिब देखा, तब मुझे यूँ लगा जैसे मैं पत्थर का बन गया हूँ। और इस मुंजमिद बुत में सिर्फ तुम ही जान डाल सकते हो। तुम्हें पता है मेरी आँखें भर आयीं थी उस वक़्त। तुम्हारी नज़र में शनासाई और क़ुर्बत का वह एहसास था जिसके सहारे तमाम उम्र काटी जा सकती थी। उस पल मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं तुम्हें बहुत पहले से जानता हूँ। जैसे हम बनाये ही उस लमहे में इकट्ठे होने के लिए गए थे। एक अजब सा जुनून तारी था उस लमहे मुझ पर। जी चाह रहा था दिलो जान से तुम पर निसार हो जाऊँ। तुम्हें अपनी रूह के उस निगाहखाने में छुपा लून जहां से कोई तुम्हे मुझसे छीन न ले। हल्का-सा ख़ौफ़ भी था, की कहीं उस पल जो कुछ मुझ पर गुज़र रही है, कहीं उस कैफियत का तुम्हे अंदाजा न हो जाए, और मैं हमेशा के लिए उस लमहे में क़ैद न हो जाऊँ। तभी तुम्हारे चेहरे की मुशाक़ मुस्कान ने मुझे मेरा जवाब दे दिया, और मैं क़फ़स-ए-यार में अटक गया।

गेलेक्सी हिंदी के जुलाई २०१४ के अंक में पढ़िए हादी हुसैन की श्रृंखलाबद्ध कहानी “ज़ीरो लाइन – एक पाक-भारत प्रेम कथा”  के पाँच कड़ियों की दूसरी कड़ी

Hadi Hussain

Hadi Hussain is a social researcher, writer and activist who is continuously struggling to resist, exist, indigenize and decolonize. His interests include intersectional politics, feminism, South Asian LGBT discourse, body politics, cultural anthropology, peace initiatives, decolonization studies and transnational indigenous social movements