कहानी : रंगीली और उसकी मौत का रहस्य

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बचपन से ही लगता है कि या तो मैं पागल हूँ, या फिर मेरे आस पास जितने भी लोग है वो पागल हैं। अम्मा कहती थी थोड़ा अलग सा हूँ सबसे। बड़े हुए तो पता चला कि हम सबकी अम्मा हम सबसे यही कहती हैं। काफी वक्त ये सोचने में ज़ाया किया कि हम में औरों से क्या अलग है। आखिर हम सबकी अम्मा को अपने बच्चों में क्या दिखता है? जो भी दिखता हो लेकिन एक बात समझ मे आती है कि हर इंसान एक दूसरे से कभी ना समझ पाने की हद तक अलग है। ये जो अलगाव है इसकी काफी वज़हें हो सकती है। हम जहाँ पैदा हुए, जहाँ पले-बढ़े, जहाँ पढ़ाई की, कैसे लोगों से मिले, कैसे लोगों से नही मिले। दुनिया मे आये तो क्या देखा, क्या खाया, कहाँ रोये, किसको रुलाया, कब ये बात समझ मे आयी कि मौत हर इंसान की होती है, चाहे वो हमसे कितना भी अलग क्यों ना हो।

और इंसान क्या पेड़, पौधे, कुत्ते, बिल्लियां, सभी को मौत आती है।

मौत में कुछ नया क्या है?

रंगीली की मौत भी कोई नई बात नही थी। किसी के लिए भी। बस रंगीली की अम्मा बहुत रोई। रंगीली अपने घर का सबसे बड़ा और समझदार लड़का था, या पता नही क्या था। वैसे तो रमेश भैया सबसे बड़े थे और रंगीली दूसरे नम्बर पर था मग़र रंगीली ने अपने घर को जैसे सम्भाल रखा था वैसे शायद ही रमेश भैया कर पाएंगे।

रंगीली को डांस का बड़ा शौक़ था। उसने डांस की बाकायदा पढ़ाई की थी। शायद ग्रेजुएशन किया था डांस में उसने किसी दिल्ली के कॉलेज से। और यहाँ जमालपुर में वो हर स्कूल में बच्चों को डांस करना सिखाता था। स्कूल वाले उसे कभी उसके मन मुताबिक पैसे नही देते थे क्योंकि भाई डांस भी कोई करने की चीज़ है? और स्कूल के बच्चे उसे कभी भाव नही देते थे।

स्कूल के बच्चे रंगीली के पीठ पीछे उसे मउगा बुलाते थे। मउगा मतलब मर्द ही होता है लेकिन शब्दों की यही जालसाज़ी ही तो है जो हमे हम बनाती है। मउगी औरत को कहते है। और औरत का विलोम आदमी होता है, मर्द होता है। मउगा नही होता, नही हो सकता। क्योंकि ये जो पितृसत्ता है उसके अंहकार को ठेस पहुँचेगी।

तो रंगीली मउगा था। ये बात पूरे शहर को मालूम थी लेकिन खुद रंगीली को अपने बारे मे कुछ पता नही था।

हमारे स्कूल में एक डांस कंपीटिशन था और टैगोर हाउस वालों ने रंगीली को डांस सीखने के लिए बुलाया था। वो पहली बार था जब मैंने रंगीली को देखा। दिखने में तो आदमी जैसा था मगर उसकी आवाज़ थोड़ी अलग थी। बोलते वक़्त उसके हाथ इधर उधर खूब घूमते। हँसते वक़्त रंगीली अपना चेहरा सबसे छुपा लेता था। कुछ अलग तो पक्का था रंगीली। हम शाष्त्री हाउस वाले जब कंपीटिशन जीत गए तो रंगीली ने हम सबको आकर बधाइयाँ दी।

तस्वीर केवल प्रतिनिधित्व के लिए (तस्वीर सौजन्य : मिहिर महेर / क्यूग्राफ़ी)

पूरे हफ्ते हम लड़के उसे परेशान करते रहे और ये बंदा हमे हमारी औकात दिखा कर चला गया। उस शाम हम सब दोस्त रंगीली के घर गए थे। बियर की पार्टी माँगने। कुछ दोस्तों से सुन रखा था कि रंगीली बहुत देनदार आदमी है। तो पहुँच गए हम लोग उसके घर के बाहर। वो हाफ पैंट में बाहर आया। उसके पैरों में जैसे अमेज़न का जंगल उग आया था।

छोटे शहरों में बातें ना घरों में होती है ना क्लब्स में। सड़क पर चल पड़ते है लोग जब तक बातें खत्म ना हो जाये। मग़र बातों का भी कुछ ऐसा है ना कि सड़क कम पड़ जाए मग़र बातें कम ना हो करने को।

हम भी कुल 8 लोग निकल पड़े सड़क पर। डांस की बातें हुईं। उसने बताया कि वो डांस इंडिया डांस को ऑडिशन देने गया था। फाइनल राउंड तक सिलेक्शन भी हुआ। टीवी पे भी दिखाया गया। एक दोस्त उसी समय कह गया, “आपने झूठ क्यों बोला कि जब आपसे जज गीता ने पूछा कि आप कहाँ से हो। आपने क्यों बोला आप ओरिसा से हो?”

रंगीली आश्चर्य चकित था। उसे भरोसा नही हो रहा था कि किसी ने उसे टीवी पे देखा। फिर उसने कहा, “हम बिहार वाले ऐसे ही बदनाम हैं। और मेरा सिलेक्शन ही किया उन लोगों ने ताकि पूरा देश 2 सेकंड को हँस सके मुझपे, की देखो कैसे-कैसे नमूने भी उठ कर चले आते हैं। लोग मुझ पर हँसे ठीक है। लेकिन मेरे गाँव, घर, परिवार पे हँसे ये अच्छा नही लगता। लेकिन मुझे इस बात की सबसे ज़्यादा खुशी है तुम लोगों ने मुझे देखा।”

हम लोग चुप हो गए। शायद किसी के पास कुछ भी नही था कहने को।

थोड़े देर बाद रंगीली ने एक कहानी सुनानी शुरू कर दी।

“मैं K.V में था दस सालों तक। स्कूल में काफी मन लगता था। बाबा धोबी थे मगर उनकी मौत के बाद कुछ समझ नही आया कि क्या किया जाए। स्कूल में फिर भी मन लगता था तो मैं स्कूल हर रोज़ जाता था। स्कूल के लड़के मुझे मारते थे क्योंकि मैं पतला दुबला सा था। मेरे दोस्त भी नही थे जो मुझे बचा सकते। ये जो लड़के मुझे मारते मैंने उन्ही से दोस्ती कर ली। लेकिन वो फिर भी मुझे मारते थे। पता नही क्यों। शायद मैं तुम सबसे अलग हूँ इसलिए। अपने दोस्तों से मार खा-खाकर भी मैं नही सुधर रहा था। दोस्ती में तो सब चलता है ना। स्कूल ट्रिप पे 2 दिनों के लिए नवादा जाना था। मैं भी चला गया। उन दो दिनों में मेरे दोस्तों ने मेरा बारी-बारी से बलात्कार किया। उन दोस्तों में वो टीचर भी थे जो हमें नवादा लेकर गए थे।”

“उस दिन से पहले मुझे लगता था कि बलात्कार सिर्फ लड़कियों का होता है। मुझे उल्टियाँ होती थी। ऐसा लगता था जैसे अब बस मौत ही बाकी हो। किसी भी वक़्त आ जाये।”

“किसी तरह स्कूल खत्म हुआ। उन सबसे फिर कभी नही मिला मैं। लेकिन अजीब सा गुस्सा था। जो तुम सबपे आता है। क्यों ऐसे करते हो मेरे साथ जैसे मैं तुम सबके दोस्ती के लायक ही नही हूँ?”

तस्वीर सौजन्य : राज पांडेय / क्यूग्राफ़ी

“फिर ज़िन्दगी में डांस आया। म्यूजिक के साथ अपने आप को महसूस करना कुछ अलग सा था। ज़िन्दगी में पहली दफे लगा कि आज़ादी चखी हो। आज़ादी अपने आप से। आज़ादी खुद को महसूस करने की।”

“मैं जानता हूँ कि मैं तुम सब जैसा लड़का नही हूँ। मैं लड़का भी नही हूँ शायद। मुझे नही पता मैं क्या हूँ। लेकिन मुझे लड़के तो बिल्कुल पसंद नही। लड़कियां पसंद है। मतलब मेरी एक गर्लफ्रैंड है लेकिन दिक्कत ये है कि मैं भी खुद को एक लड़के से ज्यादा एक लड़की मानता हूँ। पता नही ये बात सबको इतना क्यों परेशान करती है। सब मुझसे ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे मैने कितना बड़ा पाप किया है पैदा होकर। मुझे मेरे लड़की होना बिल्कुल बुरा नही लगता। अच्छा लगता है सच बताऊँ तो। सच्चा लगता हूँ खुद को। और एक झूठे की तरह जीने से बेहतर है सच को पकड़ के मर जाऊँ।”

उस दिन रंगीली एक आदर्शवादी इंसान था हमारे लिए। उसका नाम रंगीली भी हम लोगों ने ही रख दिया उस रात। पहले तो उसे ये नाम पसंद नही आया फिर उसने जब हम सबसे हमारे खुद के लिए तय किये हुए नाम पूछे तो वो मुस्कुरा दिया और उस दिन से रंगीली और हम सब दोस्त बन गए।

लेकिन दिल ही दिल मे मुझे रंगीली के लड़की होने से डर लगता था। वो डर जो मुझे हिजड़ों से भी लगता था। ये बात रंगीली को मैं बता नही पाता था और जब रंगीली मुझसे थोड़ा भी चिपकता था मैं उसे दूर भगा देता था। मुझे कतई पसंद नही है कि कोई मुझे छुए। एकदम नही।

एक दिन जब पानी सर से ऊपर चला गया तो मैंने उससे बैठ के बात की इस डर के बारे में। उसने बोला, “तुम फट्टू हो जो मुझसे डरते हो। मुझे दोस्त कहते हो और मुझसे डरते भी हो। अपने बाकी दोस्तों से डरते हो क्या? या फिर मैं दोस्त बस कहने के लिए हूँ?”

उसके सवाल आज भी ज़हन में ज़िंदा हैं।

रंगीली बस कहने के लिए मेरा दोस्त नही था। उसने मुझे मेरा पहला काम दिलाया था। एक छोटे बच्चे को पढ़ाने का काम।

रंगीली भी बच्चों को पढ़ाता था। वो और भी कुछ करता था जिसका मुझे अंदाज़ा भी नही है। पूरे शहर में कोई भी प्रोग्राम बिना रंगीली की मौजूदगी के हो ही नही सकता था। मजिस्ट्रेट तक पहुँच थी बंदे की।

लेकिन वो हरामी मजिस्ट्रेट भी मेरे दोस्त को बचा नही पाया।

रंगीली की मौत संदिगद्ध हालातों में हुई। नगर प्रशासन को पता नही क्या हड़बड़ी थी उन्होंने घण्टो भीतर ही रंगीली को गंगा किनारे भिजवा दिया।

ये उस समय की बात है जब बिहार में दारू बैन नही हुआ था। यूँ तो रंगीली पीता नही था मगर उड़ती हवाओं में ऐसी खबर थी कि उस दिन उसने इतनी शराब पी की वो बेहोश हो गया। बाद में पता चला कि शराब ज़हरीली थी। और वो बेहोश नही था बल्कि मर चुका था।

मग़र बाकी पियक्कड़ क्यों नही मरे फिर जिन्होंने रंगीली के साथ बैठकर शराब पी?

मैं बताऊँ वो सच जिसे आप सुन नही पाते हैं?

रंगीली को कमरे में बंद किया गया। उसे नंगा किया गया। और उसे नंगा करने वालों में एक वो मा***द मजिस्ट्रेट भी था।

लोग कुछ भी कहें, समाज कुछ भी सोचे हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि सच को ज़िंदा रखें। वो सच जो हमें हम बनाता है। वो सच जो हमे औरों से अलग करता है। वो सच जो हमारे आज और बीते हुए कल में है। वो सच जो हमारी कहानियों में है।

हमे ज़िंदा रहना है सच के साथ। और सच बस इतना सा है कि,

“में रंग कोई एक नही, ना मैं कोई काला बादल हूँ
मैं इंसान हूँ अपनी मर्ज़ी का,  मालिक हूँ अपनी कश्ती का।”

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