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आजकल विदेशों के साथ-साथ हमारे भारतवर्ष में भी LGBTQ अर्थात् क्वीर कम्यूनिटी का विषय एक ज्वलंत विषय के रूप में चर्चा में है। उन अनेक समाचारों के अंतर्गत अत्यंत प्रसिद्ध समाचारपत्र  नवभारत टाइम्स जून 2019 के अंक में  क्वीर कम्यूनिटी के अवि पटेल(चैन्ने) की ख़ुदकुशी का समाचार पढ़कर मन को दुःख हुआ। इससे भी अधिक दुःख उसके द्वारा ख़ुदकुशी से पहले लिखी गयी एक पोस्ट को पढ़कर हुआ, जिसमें उसने स्वयं की ही नहीं बल्कि पूरी क्वीर कम्यूनिटी की खौफनाक ज़िन्दगी बयाँ की है कि कैसे बचपन से बड़े होने तक हिजड़ा, छक्का जैसे कष्टदायक जुमलों से मज़ाक बनाकर, चिड़ाकर और हँसी उड़ाकर उनकी ज़िन्दगी के हर दिन को दर्द से भरकर तबाह किया जाता है। आज तक ऐसे ना जाने कितने अवि इस दुःख से अपनी कीमती ज़िन्दगी का सर्वनाश कर चुके हैं । इस कम्यूनिटी से जुड़े अनेक युवा चेहरों का इस सड़ी-गली और संकीर्ण मानसिकता वाले समाज से एक ही प्रश्न है कि क्यों यह समाज एक क्रिमिनल की तरह उनसे बर्ताव कर रहा है?

इस दुखद प्रसंग ने मेरे मन को झकझोर कर रख दिया और इस विषय पर लिखने को बाध्य कर दिया। मेरी इच्छा हुई कि क्यों न मैं इस LGBTQ अर्थात् क्वीर कम्यूनिटी के विषय में हज़ारों साल पुराने जैनदर्शन के प्रामाणिक पक्ष को समाज के समक्ष प्रस्तुत करूँ, जिससे इस कम्युनिटी के प्रति किये जा रहे भेदभाव के व्यवहार में कमी आजाये और धीरे-धीरे  इनको भी समान रूप से देखा जाने लगे। मेरा ऐसा विश्वास है कि यह शोधालेख इस विषय में खुलकर सोचने पर विवश करने वाला सिद्ध होगा।

गोम्मटसार(दसवीं शताब्दी)  और धवला जैसे अनेक प्राचीन और प्रामाणिक ग्रन्थों में इस विषय में मुझे जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामग्री प्राप्त हुई उससे यहाँ अवगत कराया जा रहा है।

जैनदर्शन में जीव जिस प्रकार देखे जाते हैं या खोजे जाते हैं उनको आचार्यों ने चौदह मार्गणाओं का नाम दिया है। इन चौदह मार्गणाओं में से एक वेद मार्गणा को भी जीवों को खोजने के चिह्न के रूप में स्वीकार किया है। यहाँ ‘वेद’ और लिंग’ शब्द एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। नेमिचन्द्राचार्य ने गोम्मटसार ग्रंथ (जीवकांड, गाथा 271-276) में वेद मार्गणा नाम के दसवें अध्याय में इस विषय को भली प्रकार से स्पष्ट किया है। यहाँ वेद तीन प्रकार के बताये गये हैं- स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद। इस प्रकार नपुंसक वेद की घोषणा करते हुए जैनाचार्य मूल वेद के दो भेदों के रूप में द्रव्य वेद और भाव वेद को बताते हुए इस विषय की और बारीकी में चले गये हैं| इस प्रकार से स्त्री वेद, पुरुष वेद और नपुंसक वेद- ये तीनों ही वेद द्रव्य और भाव की अपेक्षा से दो-दो प्रकार के होते हैं। जीव पुरुषवेद, स्त्रीवेद, और नपुंसकवेद कर्म के उदय से भावपुरुषवेदी, भावस्त्रीवेदी,और भावनपुंसकवेदी होता है। अंगोपांग नामकर्म के उदय से द्रव्यपुरुषवेदी, द्रव्यस्त्रीवेदी, और द्रव्यनपुंसकवेदी होता है अर्थात् शरीर में विशेष अंग-उपांगों के होने से स्त्री, पुरुष या नपुंसक होने का ठप्पा मिल जाता है। इस प्रकार से शरीर में स्त्री या पुरुष के योनि, लिंग आदि चिह्न की रचना होने को द्रव्यवेद कहा गया है। द्रव्यवेद तो शरीर के साथ रहता है, शरीर में विशेष अंगों के रूप में जैसे चिह्न देखने में आते हैं वैसा ही स्त्री, पुरुषादि वेद कहा जाता है।

जीव में स्त्री, पुरुष या नपुंसक अथवा तीनों में से किसी भी वेद का किसी भी वेद के साथ रमण करने की भावना का नाम भाववेद कहा गया है। किसी को स्त्रीवेद होने पर भी उसका पुरुषों के लिए आकर्षण हो सकता है और पुरुषवेद होते हुए भी उसका स्त्रियों के लिए आकर्षण का भाव हो सकता है, तथा उनके साथ रमण करने की भावना भी उनकी हो सकती है। जैनदर्शन के अनुसार यह ज़रूरी नहीं है कि स्त्री का पुरुष के प्रति और पुरुष का स्त्री के प्रति ही आकर्षण होगा। द्रव्य और भाव ये दोनों वेद प्रायः सम (सदृश) होते हैं परन्तु कहीं पर विषम भी हो सकते हैं। कर्मभूमिज मनुष्य व तिर्यंचो में विषम भी हो जाते हैं। अर्थात् जैनाचार्यों ने मनुष्यों और पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़े आदि में द्रव्य से पुरुषवेद किन्तु भाव से स्त्री या नपुंसक वेद होना, द्रव्य से स्त्रीवेद किन्तु भाव से पुरुषवेद या नपुंसकवेद और द्रव्य से नपुंसकवेद भाव से स्त्री या पुरुषवेद- ऐसी भिन्न वेदों के पाये जाने की सम्भावना को स्वीकार किया है। इस प्रकार से तीनों प्रकार के द्रव्य वेदों में प्रत्येक के साथ दो विभिन्न भाववेदों के होने की सम्भावना मानते हुए जीवों की लिंग सम्बन्धी छह विभिन्न स्थितियों को यहाँ दर्शाया गया है।   

जैनदर्शन के अनुसार यह ज़रूरी नहीं है कि स्त्री का पुरुष के प्रति और पुरुष का स्त्री के प्रति ही आकर्षण होगा                     

 जैनदर्शन में चार गतियाँ – देवगति, मनुष्यगति, तिर्यंचगति (कीड़े-मकोड़े और पशु-पक्षी) और नरकगति मानी गयी हैं। इन चारों गतियों में से देवगति में केवल स्त्रीलिंग और पुल्लिंग ही होता है जिससे वहाँ मनुष्यों की तरह किसी भी जीव को हँसी का पात्र बनने के दर्दनाक अनुभव से नहीं गुज़रना पड़ता । नरक में तो सभी जीवों का एक समान रूप से नपुंसकलिंग होने के कारण मनुष्यों के समान किसी को भी एक-दूसरे की हँसी उड़ाये जाने का कष्ट सहन नहीं करना पड़ता है। अतः इस लेख के माध्यम से जैनाचार्यों के विशेष रूप से नपुंसकलिंग सम्बन्धी व्यापक दृष्टिकोण का पता चलता है।

मेरा सरकार और समाज से विनम्र निवेदन है कि वह क्वीर कम्युनिटी के प्रति उदारवादी रवैय्या अपनाते हुए डॉ. अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली के समान अन्य विभिन्न विश्वविद्यालयों में LGBTQ से सम्बंधित मुद्दों और अधिकारों की विशेष जानकारी को एक विषय के रूप में कोर्स में लगाकर आज के युवा वर्ग को जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है। ट्रांसजेंडर बिल 2019 पास हो चुका है और नवंबर 2019 में आयोजित 12 वीं दिल्ली क्वीर प्राइड परेड में सम्मिलित हुए इस कम्युनिटी के 1000 से ज्यादा युवा और समर्थकों ने सेक्सुअल डायवर्सिटी को बड़े उत्साह के साथ सेलिब्रेट करते हुए मांग की – ‘हर जेंडर को उसका क़ानूनी हक मिले’। परेड में शामिल युवाओं ने ट्रांसजेंडर बिल 2019 का विरोध करते हुए कहा कि कानून तो बदला है लेकिन अभी समाज में इस कम्युनिटी को खुले दिल से स्वीकारा जाना बाकी है। इन्हें भी अपनी पहचान के साथ खुले दिल से जीने का अधिकार है। जिसप्रकार से आजकल महिलाओं के अधिकारों के विषय में सरकार की ओर से मीडिया के माध्यम से भी जन-जन तक बात पहुँचाने की कोशिश हो रही है, वैसे ही ट्रांसजेंडर से सम्बंधित जेंडर स्टडीज को कोर्स में लगाने से भी इसके प्रति हो रहे भेदभाव को दूर किया जा सकता है और किसी दूसरे अवि के प्रति होने वाले अन्याय को रोका जा सकता है।   

नीतू जैन (Nitu Jain)
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