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बचपन में देखा था पहली बार।
मानो पुरुष ने किया नारी सा श्रृंगार।।
पूछा मैंने माँ से ,यह कौन खड़े हैं द्वारे?
माँ बोली पूर्व जन्म के पापों से,
किन्नर है यह सारे।
हर जन्म पे जो बधाई बजाते,
क्यों माँ हम उन्हें नहीं अपनाते?

जब ईश्वर पूर्ण सदा कहलाए।
तो उसकी रचना अधूरी क्यों मानी जाए?
सुन समाज कहता डंके की चोट पर,
हाँ सत्य सत्य है मेरा हर एक अक्षर।।
यदि पूर्ण है तेरा जगदीश्वर।
तो पूर्ण हैं यह अर्धनारीश्वर।।

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रितिक चक्रवर्ती (Ritwik Chakravarty)

रितिक चक्रवर्ती लखनऊ के रहने वाले हैं और पिछले 4 सालों से एलजीबीटी समाज के मुद्दों पर काम कर रहें हैं l लखनऊ के अवध क्वीर कम्युनिटी के साथ सुचारू रूप से काम करते हुए मुख्यधारा के लोगों को एलजीबीटी मुद्दों पे अपने कविता लेखों के माध्यम से जागरूक करते रहते हैं l इसी के साथ वे माइथॉलजिस्ट की भूमिका में भारतीय अध्यात्म संस्कृति में क्वीर समुदाय की पहचान को प्रकाशित करते हैं l
रितिक चक्रवर्ती (Ritwik Chakravarty)

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