Gender

कविता : गुड़िया

गुड़ियाएं मेरे हर राज़ की राज़दार थीकपड़े से बनी, मोटी आँखों वालीअनगढ़ अंगों वाली और हमेशा हँसने वालीजब से बड़ा हुआ, मैंने हर अपना दुख कह दिया इनसेअपनी हर खुशी ब... Read More...

जेंडर के ढाँचे से जूझता मेरा बचपन

मैं बचपन से ही बहुत ही नटखट, चुलबुला और थोड़ा अलग बच्चा था| मेरी माँ फिल्मों और गानों की बहुत शौक़ीन थी| माँ के दुपट्टे की साड़ी पहनना, नाचना-गाना, मेरे बचपन क... Read More...
man with nath

Poem: Nath

“Poetry Is Possible” is a new poetry book by Vikram Kolmannskog. It is coloured by Vikram’s identity as a gay, spiritual, Indian-Norwegian man.