जीतू बगर्ती

कविता: एक सिमटती हुई पहचान

मिल गई हमें सांवैधानिक सौगात, तीसरे दर्जे के रूप में, आखिर कब मिलेंगे बुनियादी अधिकार, भारतीय नागरिक के स्वरूप में?

समलैंगिक और समाज

ये आज़ादी तो बस नाम की जो सलाखो से बचाती है, पर समलैंगिको को तो घरो में कैद हर बार किया जाता है..

जीतू बगर्ती

My self Zeetu Bagarty . Am a college students. Am from Odisha . I like writting poem and story so m here and I support to LGBT community. And I like cooking . My insta id- aarish_a_7