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#BreakTheSilence : टीवी देखने के लिए अक्सर ये करना पड़ता

जी!! बचपन की बात है जब मैं क्लास 4th या 5th में था, तो मै अपने नाना के साथ रहता था| नाना एक टीचर थे और रूम लेकर रहते थे| वँहा हमारे पास टीवी नही थी, तो अक्सर मै बगल वाले पडोसी के यंहा टीवी में शक्तिमान देखने जाता था| वँहा जिसके घर जाते थे तो उसका लड़... Read More...
'संगिनी' - एक कहानी (भाग ५/५) | छाया: भावेश कतीरा | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी |

‘संगिनी’ (श्रृंखलाबद्ध कहानी भाग ५/५)

कहानी की पिछली कड़ियाँ यहाँ पढ़ें: भाग १ | भाग २ | भाग ३ | भाग ४ | प्रस्तुत है कथा का पाँचवा और आखरी भाग: मनीषा को कौन सा इस बात का जवाब पता था लेकिन मनीषा की वकालत करने का वीणा डॉक्टर सीमा ने उठा रखा था। डॉक्टर सीमा ने श्याम और मनीषा को शांत कर बैठन... Read More...
“बुज़ुर्ग हैं, क्षीण नहीं” | छाया: राज पाण्डेय | सौजन्य: क्यूग्राफी |

“बुज़ुर्ग हैं, क्षीण नहीं” – “सीनेजर्स” वयस्क सम/उभय/अ लैंगिक पुरुषों का प्रेरणादायक संगठन

मुंबई के बांद्रा इलाके में थडोमल शहाणी अभियन्त्रिक महाविद्यालय में २१ जनवरी २०१८ को शाम ४ से ७ बजे तक एक अनोखा कार्यक्रम हुआ। “सीनेजर्स” (अंग्रेजी शब्द ‘टीनेजर्स’ से उपांतरित, ‘ज़माना देखे हुए लोग’; ईमेल: mumbai.seenagers@gmail.com, फेसबुक) संगठन २०१७... Read More...
'संगिनी' - एक कहानी (भाग ४/५) | छाया: भूपेश कौरा | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी |

‘संगिनी’ (श्रृंखलाबद्ध कहानी भाग ४/५)

कहानी की पिछली कड़ियाँ यहाँ पढ़ें: भाग १ | भाग २ | भाग ३ | डॉक्टर सीमा की बात सुन श्याम ने हैरत से मनीषा की तरफ देखा। उसे इस बात पर आश्चर्य हुआ। मनीषा ने शर्म से नजरें झुका लीं। श्याम ने मुडकर डॉक्टर सीमा की तरफ देखा और बैचेन हो बोला, ‘‘तो डॉक्टर सीमास... Read More...
'संगिनी' - एक कहानी (भाग ३/५) | छाया: श्रेयांस जाधव | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी |

‘संगिनी’ (श्रृंखलाबद्ध कहानी भाग ३/५)

धर्मेन्द्र राजमंगल की कहानी ‘संगिनी’के पिछले २ भाग यहाँ पढ़ें: | भाग १ | भाग २ | प्रस्तुत है भाग ३: श्याम इस इशारे को समझ गया था। उसने बेड से उठते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं, मैं यहाँ सोफे पर सो जाऊँगा। तुम बेड पर आराम से सो जाओ।” इतना कह श्याम सोफे पर... Read More...
'संगिनी' - एक कहानी (भाग १/५) | छाया: पीनल देसाई| सौजन्य: क्यूग्राफ़ी |

‘संगिनी’ (श्रृंखलाबद्ध कहानी भाग २/५)

कहानी की पहली कड़ी यहाँ पढ़ें। सोचती थी कि भगवान ने उसका मन ऐसा क्यों बनाया जो लड़की होकर भी एक लड़की को चाहने का मन करता है। क्यों ऐसी भावनायें उसके अन्दर भर दीं जिससे उसका मन प्रकृति के खिलाफ हो उठा। सवाल पर सवाल और दुखी मन। मन की मरती इच्छा और समाज क... Read More...
'संगिनी' - एक कहानी (भाग १/५) | छाया: अविजित चक्रवर्ती | सौजन्य: क्यूग्राफ़ी |

‘संगिनी’ (श्रृंखलाबद्ध कहानी भाग १/५)

जब से मनीषा की शादी तय हुई तभी से उसकी बेचैनी सातवें आसमान पर थी। उसने सपने में भी शादी के बारे में नहीं सोचा था। वो तो शादी करना ही नहीं चाहती थी। उसने सीधे अपनी माँ से जाकर बात करने का मन बनाया। शर्म तो आती थी लेकिन शर्म करते रहने से उसकी जिंदगी खत... Read More...
'दो पहलू' - एक कविता | तस्वीर: अभिषेक गौर | सौजन्य: क्यूग्राफी |

“दो पहलू” – एक कविता

एक रात एक सपना आता है, जिसके दो पहेलू होते हैं। एक में तो हम सोते हैं, दूसरे में अन्दर से रोते हैं। एक पहेलू में होती खुशियाँ सारी , जहाँ ख़्वाबों की होती परियाँ सारी। इस मन में न कोई इख्तियार, एक पल लगता, कहीं हुई हार। सुई की नोंक पर रखीं चाह... Read More...
'उन्होंने कुछ नहीं कहा' - एक कविता | तस्वीर: सेंतिल वासन | सौजन्य: क्यूग्राफी |

“उन्होंने कुछ नहीं कहा” – स्वगत कथन

प्रस्तुत है इस स्वगत-कथन की उत्तर-कृति: वह चुपचाप होने वाली बातें जो होकर रह गयी हैं: वक़्त के तले में अब भी चिपकी हुई हैं। वो कुछ न कह सके हम कुछ न कह सके; कभी हिम्मत न थी: कभी कहने को मौका न था; कभी कहने को कुछ बचा न था। १ वह पूरे रस्ते चिपककर बै... Read More...
'अर्धनारीश्वर' - एक कविता | चित्रकार: उदित नारायण मेष |

‘अर्धनारीश्वर’ – एक कविता

पहनो जो तुम पहनना चाहते हो करो जो तुम्हारा दिल कहे ज़माने की बंदिशों को परवरदिगार न समझ अनासिर बुत न समझ मुझे मैं भी उतना ही खुदा हूँ जितना है तू  घुंगरू तो मुझसे पूछते नहीं, "आखिर तेरी ज़ात क्या है?" न जाने किसने देख ली क्रूरता में मर्दानगी... Read More...
'दुविधा' एक कविता | छाया: कार्तिक शर्मा | सौजन्य: क्यूग्राफी |

दुविधा (एक कविता)

जलते कोयले पर जमी राख की परत को मिली है तुम्हारे स्पर्श से हवा अब इस सुलगी आग का क्या करूँ मैं? छोड़ दूँ गर इसे अपने नतीजे पे तो प्रश्न अस्तित्त्व का है बुझा भी दूँ किसी की मदद से तो सवाल है नीती-अनीती का… इस दुविधा में मुझे फँसाकर यूँ मुँ... Read More...
क्रॉसड्रेसर - एक कविता | तस्वीर: वेंकट रामदास | सौजन्य: क्यूग्राफी |

क्रॉसड्रेसर – एक कविता

 कुछ काम मैंने औरतों की तरह किए कुछ नहीं, कई और फिर धीरे-धीरे, सारे   सबसे आखिर में जब मैं लिखने बैठा मैंने कमर सीधी खड़ी करके पंजों और ऐड़ियों को सीध में रखकर बैठना सीखा इससे कूल्हों को जगह मिली और पेट को आराम उसने बाहर... Read More...